'बेघर महिला जैसे जानवरों के बीच मांस का टुकड़ा'

बेघर महिलाएं
Image caption दिल्ली में बेघर महिलाओं के लिए आयोजित जनसुनवाई.

दिल्ली में बेघर महिलाओं की संख्या दस हज़ार से भी ज़्यादा बताई जाती है और इनमें से ज़्यादातर ऐसी हैं जो फ़ुटपाथ पर रहने को मजबूर हैं.

इन बेघर महिलाओं को ज़िंदगी के हर मोड़ पर शोषण का शिकार होना पड़ता है.

विडम्बना है कि अपने साथ हो रहे शोषण का ना तो ये प्रतिरोध कर सकती हैं और ना ही इसकी शिकायत.

ऐसी बेघर महिलाओं की जनसुनवाई दिल्ली के एक फ़ुटपाथ पर हुई.

पढ़ें पूरी रिपोर्ट

Image caption बेघर महिला प्रांजला.

प्रांजला ने वैसे तो एमए पास किया है और अब वो दिल्ली के बंगला साहिब गुरुद्वारे के पास स्थित रैन बसेरे में रहती हैं.

उन्होंने अपने परिवार से किनारा कर लिया है और अब साठ साल की उम्र में उन्होंने रैन बसेरे में ही रहना बेहतर समझा.

मेरी मुलाक़ात उनसे 'सेंटर फॉर हॉलिस्टिक डेवलपमेंट' द्वारा दिल्ली की बेघर महिलाओं के लिए की गई जनसुनवाई के दौरान हुई.

वो बताती हैं, "अब मेरी बाक़ी ज़िन्दगी इसी फ़ुटपाथ के किनारे स्थित रैन बसेरे में गुज़रेगी. अब यही मेरी दुनिया है."

"मेरे परिवारवालों ने मुझे छोड़ दिया और मैंने उन्हें छोड़ दिया. मगर फ़ुटपाथ पर एक बेघर महिला की ज़िंदगी नरक से बदतर है. वो रोज़ जीती है और रोज़ मरती है. वो भी घुट घुट के."

कड़वे अनुभव

Image caption बेघर महिला कमला.

प्रांजला की तरह यहाँ कमला भी रहती हैं जो रैन बसेरे में आने से पहले तक फ़ुटपाथ पर ही गुज़ारा करती थीं.

65 वर्षीय कमला भी पढ़ी लिखी हैं मगर अब उन की उम्र जवाब दे रही है. रहने के लिए सरकारी रैन बसेरा तो ज़िंदा रहने के लिए गुरुद्वारे का लंगर.

बस इसी तरह उनकी ज़िन्दगी कट रही है. फ़ुटपाथ पर रहने की वजह से उनके अनुभव बड़े कड़वे हैं.

वो बताती हैं, "फ़ुटपाथ पर महिला ऐसे है मानो कुछ जंगली जानवरों के बीच एक मांस का टुकड़ा."

किरण तिवारी अपने चार बच्चों के साथ तब सड़क पर तब आ गईं जब उनके पति ने उन्हें और बच्चों को घर से निकाल दिया.

किरन प्रांजला और कमला की तरह पढ़ी लिखी नहीं हैं. उनके लिए रैन बसेरे में ना जगह है और ना ही उनके पास रोज़गार का कोई ज़रिया.

शोषण

Image caption किरन.

मज़दूरी करके किसी तरह अपना और बच्चों का पेट पालने को मज़बूर किरन कहती हैं कि जब भी किसी ने उनकी मदद करने की कोशिश की तो उसने उसके एवज़ में शारीरिक शोषण ही किया.

सेंटर फॉर हॉलिस्टिक डेवलपमेंट के सुनील कहते हैं कि सड़क पर बेसहारा महिलाओं को एक आसान शिकार माना जाता है.

वो कहते हैं कि दिल्ली शहर में ऐसी बेघर महिलाओं की तादाद दस हज़ार से भी ज़्यादा है.

जनसुनवाई में मौजूद शहरी अधिकार मंच के इंदु प्रकाश सिंह का कहना है कि बेघर महिलाओं के लिए पूरे भारत में दिल्ली सबसे बदतर जगह है और यहाँ हालात बद से बदतर ही होते जा रहे हैं.

इतना तो तय है कि दिल्ली की सड़कों पर रहने वाली यह बेघर महिलाएं वो हैं जिन्हे अपनों ने ही ठुकरा दिया है.

और अब इनके सामने ज़िंदगी जीने की एक बड़ी चुनौती है. अब बहुत कुछ सरकारों पर निर्भर करता है कि वो इन्हें इतनी सुरक्षा तो मुहैया करा दे जिससे ये इज़्ज़त के साथ अपना पेट पाल सकें.

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