'किसी को मणिपुर की चिंता नहीं है'

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मणिपुर में इनर लाइन परमिट (आईएलपी) को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के कारण कई हफ़्तों से पूर्वोत्तर के इस छोटे से राज्य में कामकाज ठप है.

इनर लाइन परमिट की व्यवस्था अंग्रेज़ों ने इसलिए बनाई थी ताकि बाहरी लोगों को इन इलाक़ों में ज़मीन ख़रीदने या यहां बसने से रोक कर आदिवासियों को सुरक्षा दी जाए.

यह व्यवस्था पूर्वोत्तर के तीन राज्यों अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और नगालैंड में अब भी मौजूद है लेकिन मणिपुर में नहीं है.

यहां बहुसंख्यक मैती समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल नहीं किया गया है.

लेकिन अब मैती लोग भी अपने राज्य में बाहरी लोगों को आने से रोकने के लिए आईएलपी लागू करवाना चाहते हैं.

जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि 2001 और 2011 के बीच यहां बाहरी लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है.

इन विरोध प्रदर्शनों की वजह से स्कूल हफ़्तों बंद रहे, ज़रूरी चीज़ों की क़ीमतें आसमान छूने लगीं और जब तब सड़कों पर हिंसा भड़क उठी.

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पिछले सप्ताह मणिपुर की विधानसभा ने तीन विधेयक पास किया- प्रोटेक्शन ऑफ़ मणिपुर पीपुल्स बिल, 2015, मणिपुर लैंड रेवेन्यू एंड लैंड रिफ़ार्म्स (सातवां संशोधन) बिल, 2015 और मणिपुर शॉप्स एंड इस्टैब्लिशमेंट (दूसरा संशोधन) बिल 2015.

पड़ोसी राज्यों और पड़ोसी देशों से आने वाले बाहरी प्रवासियों की बढ़ती संख्या से मैती लोगों का ग़ुस्सा इन विधेयकों के पारित होने से कुछ हद तक शांत हुआ.

लेकिन इससे नगा और कुकी जनजातियां नाराज़ हो गईं और इन जनजातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले छात्र संगठनों ने पूरे राज्य में आम हड़ताल का आह्वान कर दिया.

कुकी बहुल दक्षिणी ज़िले चूड़ाचंदपुर में हुई हिंसा में आठ लोग मारे जा चुके हैं.

ऑल नगा स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ़ मणिपुर (एएनएसएएम), कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन (केएसओ) और ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ मणिपुर (एटीएसयूएम) ने राज्यपाल पर दबाव बनाने के लिए ये हड़ताल बुलाई थी, ताकि वो इन विधेयकों को अपनी मंजूरी न दें.

अब सवाल पैदा होता है कि आदिवासी समूह इन तीन विधेयकों से असंतुष्ट क्यों हैं, जिन्हें कांग्रेस सरकार ने पारित किया है?

बेदख़ल होने की चिंता

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जनजातीय छात्र संगठनों का दावा है कि प्रोटेक्शन ऑफ़ मणिपुर पीपुल्स बिल और अन्य दो संशोधन विधेयक राज्य के उन पहाड़ी ज़िलों में ज़मीन की ख़रीद और बिक्री की इजाज़त देते हैं जहां नगा और कुकी रहते हैं.

उनका कहना है कि ये विधेयक संविधान के अनुच्छेद 371सी और मणिपुर हिल पीपुल एडमिनिस्ट्रेशन रेग्युलेशन एक्ट 1947 के उलट हैं, जिनके तहत राज्य के पहाड़ी ज़िलों को विशेष क्षेत्र का दर्जा मिला है यानी गैर अनुसूचित जातियां यहां ज़मीन नहीं ख़रीद सकतीं.

बाहरी लोगों के आने के कारण कुल आबादी में मूल निवासियों की तेज़ी से घटती संख्या की वजह से इन्हें अपनी पुश्तैनी जगह से बेदख़ल होने का डर पैदा हो गया है.

मणिपुर के मानवाधिकार कार्यकर्ता बब्लू लोइटोंगबैम कहते हैं कि आदिवासियों की सुरक्षा और उन्हें नुक़सान पहुंचने के लिहाज़ से इन विधेयकों का कोई लेना देना नहीं.

डर का माहौल

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उनके मुताबिक़, “इसकी बजाय, नए क़ानूनों के तहत बाहरी लोगों द्वारा यहां ज़मीन ख़रीदने की प्रक्रिया को सरकार और कड़ा बना रही है.”

वो कहते हैं, “असल में ये बहुत अच्छी तरह से समझाया नहीं गया कि इससे जनजातीय हितों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. पहाड़ों पर रहने वाली जनजातियों और इम्फ़ाल घाटी में रहने वाले मैती लोगों के बीच संबंध हमेशा ही तनावपूर्ण रहे हैं."

"इसलिए सरकार को इन विधेयकों के बारे विस्तृत जानकारी देनी चाहिए थी. यही कारण है कि स्थानीय विधायकों को लोगों ने निशाना बनाया.”

लोइटोंगबैम ने बीबीसी को बताया, “इससे पहले ज़मीन ख़रीदने के लिए कैबिनेट के एक हिस्से या उसकी समिति की इजाज़त मांगनी पड़ती थी लेकिन अब तो किसी बाहरी के लिए पूरी कैबिनेट से इजाज़त मांगनी होगी. इसलिए अनुसूचित इलाक़ा होने के नाते जनजातीय इलाक़े सुरक्षित बने रहेंगे और नए संशोधनों से उनके दर्ज़े पर कोई असर नहीं पड़ेगा.”

इन तीनों विधेयकों में साल 1951 की समय सीमा ने जनजातियों में डर का एक माहौल पैदा कर दिया कि इस तारीख़ के बाद राज्य में आने वाले नगा और कुकी जनजातियों को अपनी जगह जमीन छोड़नी पड़ेगी.

'किसी को चिंता नहीं'

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Image caption मणिपुर के सीएम ओकराम इबोबी सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

महिला अधिकारों के काम करने वाली बीनालक्ष्मी नेफ़्राम का आरोप है कि केंद्र ने इस अशांति से निपटने में कोई हस्तक्षेप नहीं किया, पहले आईएलपी प्रदर्शनों को लेकर और अब विधेयकों के ख़िलाफ़ जनजातीय गुस्से को लेकर.

वो कहती हैं, “किसी को मणिपुर की चिंता नहीं है, राज्य लगातार अशांत हैं और ऐसा लगता है कि यह भारत के नक्शे से फिसलता जा रहा है.”

इस हिंसा के पीछे ज़मीन की किल्लत को वो कारण मानती हैं.

वो कहती हैं, “मणिपुर की 60 प्रतिशत आबादी राज्य के 10 प्रतिशत ज़मीन पर मैदानी भाग में रहती है. इसलिए ज़मीन एक संवेदनशील मुद्दा है.”

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