आम हड़ताल का मोदी सरकार पर क्या असर हुआ?

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इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में भारत बंद कितना सफल हो सकता है?

हड़ताल के आयोजकों को अगर आम जनता का सहयोग चाहिए तो इस माध्यम का वो अपने मक़सद को हासिल करने के लिए भरपूर इस्तेमाल कर सकते हैं.

वहीं, अगर आम जनता हड़ताल के असर से बचना चाहे तो इंटरनेट का सहारा ले सकती है जिससे हड़ताल बेअसर हो सकती है.

दो सितम्बर के भारत बंद का आयोजन दस ट्रेड यूनियनों ने मिलकर किया था, जिनमें बैंक, यातायात और दूसरी ज़रूरी सुविधाएं देने वाले संगठन शामिल थे.

जिन लोगों को इंटरनेट बैंकिंग की सुविधा हासिल है, उन लोगों पर हड़ताल का असर नहीं हुआ.

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इसी तरह से अगर आपको हड़ताल करने वाली काली-पीली टैक्सी सड़कों पर नज़र नहीं आई तो आपने स्मार्टफ़ोन पर ओला और उबर जैसी निजी टैक्सी कंपनियों की सेवा हासिल की.

जिनके पास स्मार्टफ़ोन नहीं है उन्होंने इन निजी टैक्सी कंपनियों की वेबसाइट पर जाकर या इन्हें फ़ोन करके उनकी सेवा हासिल की.

कहने का मतलब ये है कि आज के दौर में आम हड़ताल उतनी प्रभावशाली नहीं हो सकती जितना 20-25 साल पहले तक होती थी और इसका ज़िम्मेदार है इंटरनेट और सोशल मीडिया.

कामयाब हड़तालों से हमारी आम समझ ये है कि आम ज़िंदगी पूरी तरह से ठप हो जाए, सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध न हों और चक्का जाम हो जाए.

लेकिन कल क्या आम ज़िंदगी पर इसका पूरा प्रभाव पड़ा?

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के महासचिव गुरुदास दासगुप्ता ने दावा किया कि उनकी हड़ताल शानदार रही, यानी क़ामयाब रही.

हिंसा की कुछ वारदातें ज़रूर हुईं. कुछ सेवाएं ठप ज़रूर पड़ गईं. यातायात पर असर भी पड़ा.

कई लोगों को असुविधा ज़रूर हुई, लेकिन आम ज़िंदगी पूरी तरह से ठप नहीं हुई.

पुराना दौर

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भारत में सालों से ट्रेड यूनियन का असर कम होता जा रहा है. पूरी तरह से कामयाब हड़तालों का दौर अब नहीं रहा.

हालांकि गांधी जी किसी ट्रेड यूनियन से नहीं जुड़े थे, लेकिन जब भी वो आम हड़ताल बुलाते थे तो पूरा देश शामिल हो जाता था. आम ज़िंदगी बिल्कुल रुक जाती थी.

वो ज़माना गया जब मुंबई में दत्ता सामंत की पुकार पर कपड़े की सभी मिलें एक साल तक बंद हो जाती थीं.

जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में 1974 की रेल हड़ताल ने इंदिरा गांधी की सरकार को हिला दिया था और उन्हें इसमें जनता का भरपूर समर्थन हासिल था.

उस समय ट्रेड यूनियन की ताक़त अपने शबाब पर थी.

उसी ज़माने में इंग्लैंड में पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के पहले ट्रेड यूनियनें जब चाहे हड़ताल कराने में सफल रहती थीं.

लेकिन मार्गरेट थैचर ने ट्रेड यूनियन को बेअसर कर दिया. भारत में इंदिरा गांधी ने भी ऐसी कोशिश की और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के ख़िलाफ़ भी ऐसे ही आरोप लगाए जा रहे हैं.

क्या बुधवार की हड़ताल के बाद मोदी सरकार हिल गई?

ट्रेड यूनियन की 12 मांगें थीं. एक मांग थी कि प्रति महीने न्यूनतम सैलरी 15,000 रुपए हो.

इससे भी बड़ी मांगें थीं सरकारी कंपनियों के निजीकरण पर रोक और नए प्रस्तावित श्रम क़ानून वापस लेना.

जनता का समर्थन

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ये मांगें अपनी जगह पर अहम हैं और ये जायज़ भी हो सकती हैं.

लेकिन संकेत इस बात के पूरे हैं कि मोदी सरकार को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. ट्रेड यूनियन की किसी मांग को स्वीकार नहीं किया गया.

हड़ताल की कामयाबी के लिए जनता की सहानुभूति या समर्थन ज़रूरी है.

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जब अन्ना हज़ारे ने आंदोलन छेड़ा तो जनता उनके साथ थी.

लेकिन आम हड़ताल पर आम लोगों की प्रतिक्रियाएं हड़ताल करने वालों के ख़िलाफ़ थीं.

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