सीएम बनाया गया तो मना नहीं करेंगे: मांझी

  • 6 सितंबर 2015
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बिहार में जीतनराम मांझी कभी नीतीश कुमार की 'कठपुतली' माने जाते थे, लेकिन आज वो उनके एक दबंग राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कहे जा रहे हैं.

जीतनराम मांझी हाल तक बिहार के एक गुमनाम नेता थे.

नीतीश कुमार ने पिछले साल आम चुनाव में हार के बाद उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनाया था.

मांझी स्वीकार करते हैं कि सियासी पटल पर अचानक उनके उदय का श्रेय नीतीश कुमार को जाता है.

लेकिन अब सियासी समीकरण बदल गए हैं और आगामी विधानसभा चुनाव में मांझी का अकेला मक़सद नीतीश-लालू को हराना है.

हालांकि मांझी साफ़ करते हैं कि वे भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं.

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बीबीसी को दिए इंटरव्यू में मांझी ने कहा, "जब हम एनडीए में शामिल हो रहे थे, उसी समय हमने कह दिया था कि हम मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं. अगर वो लोग उचित समझेंगे और हमें मुख्यमंत्री बनाएंगे तो हम मना भी नहीं करेंगे."

"नरेंद्र भाई मोदी जिसे उचित समझेंगे, हम उसे स्वीकार करेंगे."

एनडीए में शामिल पार्टियों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर अब तक कोई फ़ैसला नहीं हो सका है.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता उपेन्द्र कुशवाहा अपनी पार्टी के लिए न केवल अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं बल्कि मुख्यमंत्री पद के भी दावेदार हैं.

लेकिन एनडीए में इस पद के कई दावेदार हैं और उनका क़द कुशवाहा से बड़ा है.

'नीतीश से नफ़रत'

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इस बीच, आज मांझी भी बिहार विधानसभा चुनाव में एक अहम खिलाड़ी बन चुके हैं.

उन्होंने हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा पार्टी बनाई और एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए.

नीतीश से रिश्तों पर वो कहते हैं, "हमें उन्होंने मुखौटे के तौर पर सीधा-साधा समझ कर मुख्यमंत्री बना दिया. दो महीने तक हमने वही किया जो उन्होंने कहा. लेकिन इसके बाद हमने सोचा कि जैसा कहा जाएगा वैसा ही हम करेंगे तो बदनाम होंगे."

"जब हमने फ़ैसला लेना शुरू कर दिया और ख़ुद काम करने करने लगे तो नीतीश कुमार ने हमें हटाने का काम शुरू किया जिसमें उन्हें कामयाबी मिली."

मांझी ने कहा, "नीतीश कुमार अपनी गद्दी के लिए कुछ भी कर सकते हैं. इसीलिए हम उनसे नफ़रत करते हैं."

मांझी कहते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को शिकस्त देना उनका एकमात्र मक़सद है.

'विकास है नारा'

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70 वर्षीय मांझी का संबंध महादलित तबक़े से हैं. उनका दावा है कि दलित और मुस्लिम उनके साथ हैं.

वो कहते हैं, "हमारा नारा विकास का है. हम पिछड़े वर्ग के विकास के लिए काम करेंगे. वो स्थिति तब पैदा होगी जब एनडीए चुनाव जीतेगा. फ़िलहाल इसका नीतीश-लालू के गठजोड़ से सख़्त मुक़ाबला है."

मांझी के अनुसार, नीतीश-लालू के गठजोड़ के बाद बिहार की हालत और ख़राब हो गई है.

उनके मुताबिक़, "जब से नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव का गठबंधन बना है तब से बिहार में भ्रष्टाचार और क़ानून-व्यवस्था की हालत बहुत ख़राब हुई है."

उनका कहना था कि ग़रीबों की ग़रीबी वहीं है.

मजबूरी

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नीतीश को मांझी मौक़ापरस्त कहते हैं. लेकिन यही इल्ज़ाम उनके विरोधी उन पर भी लगाते हैं.

उन्होंने भी कई पार्टियां बदली हैं. वो कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड में सालों बिता चुके हैं.

लेकिन मांझी का कहना है उन्होंने ख़ुद पार्टी बदलने की पहल नहीं की, उन्हें हमेशा पार्टी से निकाला गया है.

वो कहते हैं, "हम किसी पार्टी से अलग नहीं हुए. राष्ट्रीय जनता दल में जब हम थे और जब जनता दल यूनाइटेड में थे, दोनों पार्टियों ने हमें टिकट नहीं दिया. ये समझा कि हम उपयोगी आदमी नहीं हैं इसलिए हमें पार्टी से निकाल दिया."

उनके मुताबिक़, "हमें पार्टी छोड़ने पर मजबूर किया गया, जबकि नीतीश कुमार गद्दी के लिए कुछ भी कर सकते हैं."

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