'ग्रीनपीस को बदलनी होगी अपनी रणनीति'

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अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस इंडिया की विदेशी फंडिंग पर रोक लगाने की ख़बर को प्रमुखता से जगह दी है.

कई बड़े अख़बारों ने इस ख़बर को छापा है और कुछ ने इसकी वजह की पड़ताल भी की है.

ब्रितानी अख़बार 'द गार्डियन' लिखता है, "कोयले पर आधारित उद्योगों की वजह से पर्यावरण को हो रहे नुक़सान के दावों, परमाणु परियोजनाओं और जंगलों की कटाई पर ग्रीनपीस भारत सरकार से भिड़ता रहा है. इसने भारत सरकार पर 'द्वेषपूर्ण अभियान' चलाने का आरोप भी लगाया है."

अख़बार यह भी लिखता है कि इसके अलावा अधिकारियों ने ग्रीनपीस की एक कार्यकर्ता को जनवरी में दिल्ली से बाहर नहीं जाने दिया था, वे संदिग्ध लोगों की सूची में शामिल थीं.

द गार्डियन का मानना है कि इससे भारत में चैरिटी के काम में लगी विदेशी संस्थाओं को झटका लगा है.

आलोचना से ख़फ़ा

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Image caption ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई को बाहर जाने से रोका गया था.

इसी विषय पर ब्रितानी अख़बार 'द टेलीग्राफ़' ने लिखा है कि विदेशी ग़ैर सरकारी संगठनों पर संदेह करने की भारतीय जनता पार्टी की नीति कई भारतीयों के इस विचार से मेल खाती है कि पश्चिम के लोग भारत के आर्थिक विकास को रोकने की कोशिश कर रहे हैं.

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'द टेलीफग्राफ़' ने लिखा है, "ग्रीनपीस की आलोचना से भारत सरकार ग़ुस्से में है. ग्रीनपीस ने कई बड़ी ढांचागत परियोजनाओं के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए हैं और सरकार ने ग्रीनपीस पर विकास परियोजनाओं को रोकने का अरोप लगाया है."

अमरीकी अखबार 'न्यूयॉर्क टाइम्स' लिखता है कि ताज़ा घटनाक्रम के बाद ग्रीनपीस को भारत में अपनी रणनीति बदलनी होगी और इसे ज्यादा घरेलू चंदा जुटाना होगा.

अख़बार के मुताबिक़ ग्रीनपीस को लगभग 75,000 दानदाताओं से पैसे मिलते है. अख़बार लिखता है कि सरकार का कहना है कि ग्रीनपीस ने विदेशों से मिलने वाले पैसे की सही जानकारी नहीं दी है और हिसाब किताब में गड़बड़ की है. ग्रीनपीस इन आरोपों को नकारता रहा है.

कामकाज बंद करेगा ग्रीनपीस?

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'द इंडीपेंडेट' के मुताबिक़, सरकार ने अपना फ़ैसला नहीं बदला तो ग्रीनपीस को वहां अपना कामकाज बंद करना होगा.

अखबार मानता है कि इससे भारत में पर्यावरण, संतुलित विकास और साफ़ ऊर्जा को लेकर घरेलू संगठनोें की ओर से चलाए जा रहे आंदोलन भी प्रभावित होंगे.

दूसरी ओर, अमरीकी अख़बार 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' लिखता है कि ग्रीनपीस पर कार्रवाई विदेशी दान से चलने वाले तमाम संगठनों पर निगरानी कड़ी करने की सराकरी कोशिश का हिस्सा भर है.

इससे पहले जून में सरकार ने दर्जन भर विश्वविद्यालयों और 9,000 संगठनों के लाइसेंस रद्द कर दिए थे. सरकार का तर्क था कि इन्होंने विदेश से पैस लेने से जुड़े नियमोें का उल्लंघन किया था.

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