क्यों नहीं चमकते भारत के अपने लक्ज़री ब्रैंड?

  • 8 सितंबर 2015
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भारत में महँगे शौक़ रखने वालों की कमी नहीं है लेकिन इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर भारत के अपने लक्ज़री ब्रैंड बाज़ार में जम नहीं पाए हैं.

भारत में जिन महँगी चीज़ों की माँग तेज़ी से बढ़ रही है उनमें वाइन काफ़ी आगे है लेकिन भारतीय वाइन का कोई महँगा ब्रैंड बाज़ार में जगह नहीं बना सका है.

मुंबई से 200 किलोमीटर दूर उगने वाले अंगूर से जो शराब बनाई जाती है वो काफ़ी बिक रही है, शैनडो नाम के इस ब्रैंड को दिल्ली, मुंबई के बारों में बिकते देखा जा सकता है लेकिन दुकान में 1200 रूपए में बिकने वाली बोतल को लक्ज़री वाइन नहीं कहा जा सकता.

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इसकी वजह ये है कि भारत के सचमुच धनी लोगोंं के लिए इम्पोर्टेड शैम्पेन कोई नियामत नहीं है लेकिन देश का मध्यवर्ग उसकी क़ीमत नहीं चुका सकता, यही वजह है कि कई भारतीय कंपनियाँ ऐसे उत्पाद बनाती हैं जो दिखने में लक्ज़री लगती हैं लेकिन उन्हें मध्यवर्ग की जेब को ध्यान में रखकर बनाया जाता है.

ऐसे उत्पाद सच्चे अर्थों में लक्ज़री प्रोडक्ट नहीं माने जा सकते क्योंकि उनकी क़ीमत और क्वालिटी दोनों औसत से थोड़ी बेहतर होती है लेकिन 'टॉप रेंज' की नहीं होंती.

इज़ाफ़ा

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Image caption भारतीय मालिक होने के बावूजद अब भी जगुआर को विदेशी कार ब्रांड के ही रूप में देखा जाता है.

यूरो मॉनिटर इंटरनेशनल के मुताबिक़ भारत के लक्ज़री मार्केट में निश्चित तौर पर प्रति साल 25.5 करोड़ अमरीकी डॉलर का इज़ाफ़ा हो रहा है.

जिससे अनुमान लगया जा सकता है कि 2013 से लेकर 2018 के बीच 86 फ़ीसदी के हिसाब से यह सेक्टर बढ़ेगा जो कि चीन, मलेशिया, और इंडोनेशिया से अधिक तेज़ होगा.

यह पैसा शहरी मध्यम वर्ग और नए अमीरों की ओर से किए जाने वाले ख़र्च की वजह से आ रहा है.

वेल्थ-एक्स और यूबीएस बिलिनियर सेंसस ने पिछले साल भारत को दुनिया भर में अरबपतियों की संख्या के मामले में छठे स्थान पर रखा था.

लेकिन जिन ब्रांडों पर ये अमीर पैसा ख़र्च करते हैं वे ज़्यादातर अंतरराष्ट्रीय ब्रांड हैं.

मुंबई, दिल्ली और बैंगलूरू के चमचमाते शॉपिंग मॉल में अरमानी, जिम्मी चू, गुची और बरबरी जैसे महंगे ब्रांड मौजूद मिलेंगे.

और जहां तक कारों की बात है तो बुगाती, लैम्बोर्गिनी, पोर्श और फ़ेरारी की बिक्री अच्छी है और ये सिर्फ़ बड़े शहरों में ही नहीं है.

दबदबा

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भारत कभी अपने ऐश्वर्य के लिए मशहूर था, बात चाहे महलों की शान हो या फिर महँगी दस्तकारी के सजावटी सामान या बारीक कढ़ाई वाले कपड़ों की.

लेकिन आज भारत में ऊंची क़ीमतों वाले भारतीय ब्रांड बमुश्किल ही मिले.

होटल समूह ताज और ओबेराय जैसे अपवादों को छोड़ दें तो भारत में ऐसे दूसरे उदाहरण खोजने मुश्किल हो जाएंगे.

कंस्लटेंट एटी किर्ने के पार्टनर नीलेश हुंडेकरी का कहना है, "भारत के लोग महँगे गहने ख़रीदते वक़्त एक पल भी नहीं सोचते लेकिन लुई वितौं का हैंडबैग ख़रीदने से पहले वो दो बार इस पर सोचेंगे."

उनका कहना है, "ज़ेवर के मामले में लक्ज़री सेगमेंट में भारतीय कंपनियों का दबदबा है."

उत्पादन को बढ़ावा

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'ऑल थिंग्स नाइस' के सीईओ निखिल अग्रवाल का कहना है कि हमें चीज़ों को उनके पूरे परिदृश्य के साथ देखना चाहिए.

अग्रवाल कहते हैं, "आप ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाली बड़ी आबादी के अस्तित्व को नकार नहीं सकते लेकिन भारतीय समाज का एक तबक़ा ऐसा है जिसके पास दुनिया के किसी भी देश के अमीरों जितना पैसा है."

विशेषज्ञों का मानना है कि नरेंद्र मोदी सरकार का मेक इन इंडिया अभियान ऊंची क़ीमत वाले भारतीय प्रोडक्ट्स के उत्पादन को बढ़ावा देगी.

निखिल अग्रवाल कहते हैं, "पैसे वाले भारतीय भी पैसे को लेकर सजग हैं. कोई अपना पैसा यूं ही नहीं फेंक देता. यह हमारे ज़ेहन की गहराई में बसा हुआ है." यानी चीज़ जितनी महँगी होगी लोग उसे उतना ही ठोक-बजाकर ख़रीदते हैं.

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