अंगदान: ग़रीब दाता, अमीर पाता

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पूरी दुनिया में दो तरह के अंगदान किए जाते हैं. एक जीवित व्यक्ति की ओर से और दूसरा 'ब्रेन डेड' घोषित किए गए मरीज़ की ओर से. जीवित व्यक्ति अपने लीवर और आँतों के अंश और दो में से एक गुर्दे को दान में दे सकता है और वो भी सिर्फ़ अपने ख़ून के रिश्ते वालों को ही.

संकल्प सिर्फ़ 'ब्रेन डेड' घोषित किए गए मरीज़ों के मामले में ही होता है. मसलन अगर किसी ने अपने जीवनकाल में ही यह संकल्प किया हो कि मरने की सूरत में वो अपने अंगों का दान कर सकता है तो सिर्फ़ उसी सूरत में अंग दान किया जा सकता है.

गुर्दा और आंत देने के लिए किसी संकल्प की ज़रूरत नहीं होती है. वो आवश्यकता अनुसार दान किए जा सकते हैं.

कौन कर सकता है अंगदान

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मेडिकल साइंस ने स्पष्ट किया है कि दो गुर्दों में से एक दान में दिया जा सकता है. जबकि आंत और लीवर के अंश को किसी की जान बचाने के लिए दिया जा सकता है क्योंकि आंत और लीवर अपने आप बढ़ते है.

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'ब्रेन डेड' घोषित किए गए मरीज़ों ने अगर अंगदान का संकल्प नहीं लिया है तो भी मरीज़ के घरवाले उनके अंगदान का फ़ैसला कर सकते हैं.

लेकिन अगर मरीज़ ने अंगदान करने का संकल्प पहले कर लिया हो, तो भी 'ब्रेन डेड' घोषित किए जाने वाले मरीज़ के घरवालों को अधिकार है कि वो उनके अंगों का दान करने से इनकार कर दें.

भारत में अंगदान के लिए लोगों को प्रेरित करने और जागरूकता फैलाने वाली संस्था मोहन फ़ाउंडेशन की निदेशक पल्लवी कुमार कहती हैं, "संकल्प लेना या संकल्प के काग़ज़ पर हस्ताक्षर करना सिर्फ़ इच्छा प्रकट करना ही है. इस दस्तावेज़ की कोई क़ानूनी वैधता नहीं होती है. ख़ास तौर पर 'ब्रेन डेड' घोषित किए गए मरीज़ों के परिवार वालों पर ही सबकुछ निर्भर करता है."

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संकल्प लेने के बावजूद भी अंगदान करने के लिए मरीज़ के परिवार पर दबाव नहीं बनाया जा सकता जबकि सिंगापुर में मामला ठीक उल्टा है. सिंगापुर में हर नागरिक को स्वाभाविक अंगदाता मान लिया जाता है और 'ब्रेन डेड' घोषित किए जाने पर अस्पताल और सरकार का उसके अंगों पर अधिकार होता है.

अंगदान के लिए कहाँ जाएं

पल्लवी कुमार कहती हैं कि भारत में स्थिति चिंताजनक इसलिए है क्योंकि ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि अगर वो अंगदान करना चाहते हैं तो कहाँ जाएँ और किससे संपर्क करें.

पल्लवी के अनुसार अंगदान के मामले में स्थिति बेहतर ज़रूर हुई है, मगर अंगों की ज़रूरत और उनकी उपलब्धता को अगर पूरे तौर पर देखा जाए तो स्थिति अब भी काफ़ी निराशाजनक बनी हुई है.

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वहीं भारत सरकार के नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट आर्गेनाईजेशन (नोटटो) के निदेशक सौदान सिंह कहते हैं कि अभी भी बहुत सारे अंग प्रतिरोपण करने वाले अस्पतालों ने अपने आपको सरकार के साथ पंजीकृत नहीं कराया है. पंजीकृत कराना क़ानूनी तौर पर अनिवार्य है.

विधायी प्रक्रिया

Image caption पल्लवी कुमार कहती हैं कि भारत में स्थिति चिंताजनक है

सौदान सिंह कहते हैं कि भारत में किसी मरीज़ को 'ब्रेन डेड' घोषित करने की एक विधायी प्रक्रिया है जिसका पालन करना अस्पतालों के लिए क़ानूनन रूप से ज़रूरी है. इस प्रक्रिया के होने के बाद ही अंगों को दान दिया जा सकता है. इस प्रक्रिया को पूरी करने के लिए अस्पतालों में चार सदस्य चिकित्सकीय दल का होना भी अनिवार्य है.

वो कहते हैं, "सिर्फ़ कुछ चुनिंदा अस्पतालों में ही ऐसे दल हैं. अब सवाल उठता है कि अगर किसी ने अंगदान करने का संकल्प लिया हो और किसी कारणवश उसकी 'ब्रेन डेथ' हो जाती है तब क्या होगा? अगर अस्पताल में चार-सदस्यों वाली टीम नहीं है तो अंगदान नहीं हो सकता है. हम राज्यों को लगातार पत्र भेज रहे हैं ताकि अस्पतालों का पंजीकरण किया जा सके."

Image caption सौदान सिंह कहते हैं भारत में मरीज़ को 'ब्रेन डेड' घोषित करने की विधायी प्रक्रिया है

यशपाल सिंह वर्मा उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिन्होंने अपनी पत्नी के ब्रेन डेड होने के बाद उनके अंगों को दान करने का फ़ैसला लिया.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि अंगदान तो मुफ़्त है मगर बड़े अस्पताल अंग प्रतिरोपण करने के काफ़ी पैसे लेते हैं. उनके अनुसार ऐसी कोई मिसाल नहीं है जब किसी अस्पताल ने किसी ग़रीब का अंग प्रतिरोपण मुफ़्त में किया हो.

यशपाल सिंह वर्मा आगे कहते हैं, "यह भी नहीं देखा गया है कि किसी ग़रीब की जान बचाने के लिए कभी बड़े अस्पतालों ने उतनी ही उत्सुकता दिखाई हो जितनी कि वो किसी अमीर मरीज़ के अंग प्रतिरोपण के लिए दिखाते हैं. इससे यह संदेश तो जाता है कि जहाँ तक अंगदान का सवाल है, कहीं ऐसा तो नहीं है कि सिर्फ़ ग़रीब दाता हो और अमीर सिर्फ़ पाता हो?"

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