ऐसे फ़ेल हुआ पाकिस्तानी हमला

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Image caption हलवारा एयर बेस पर अदम्य साहस दिखाने वाले विनोद नैब, वायुसेना अध्यक्ष अर्जन सिंह और बाएं खड़े हैं राठौर.

6 सितंबर, 1965 को पाकिस्तान ने भारत के तीन हवाई ठिकानों पर हमला किया था. पठानकोट पर हमले के इंचार्ज थे स्क्वैड्रन लीडर सज्जाद हैदर. आदमपुर का हमला हुआ था स्क्वैड्रन लीडर एमएम आलम के नेतृत्व में जबकि हलवारा पर हमले की ज़िम्मेदारी थी पाकिस्तान के बेहतरीन पायलट स्क्वैड्रन लीडर रफ़ीक़ी के हाथ में.

सुनिए: हाजीपीर का निर्णायक युद्ध

पठानकोट का हमला सफल रहा था और सज्जाद हैदर की टीम बेस पर खड़े भारत के दस विमान तबाह करने में कामयाब रही थी. आदमपुर में आलम के फ़ॉर्मेशन को ज़करिया ने इंगेज किया और वो कोई नुक़सान पहुंचाए बिना वापस हो लिए.

जब आलम वापस जा रहे थे तो स्क्वैड्रन लीडर रफ़ीक़ी की टीम उन्हें सामने से आते दिखाई दी. आलम ने रफ़ीक़ी को चेताया कि आगे भारत के सात हंटर्स मौजूद हैं. रफ़ीक़ी इससे पहले लड़ाई के पहले ही दिन भारत के दो वैंपायर विमान गिरा चुके थे. आलम की चेतावनी के बावजूद रफ़ीक़ी ने अपना रास्ता नहीं बदला और आगे बढ़ते चले गए.

ओ माई गॉड ! ये तो सेबर है

उधर हलवारा एयरबेस पर नए-नए आए फ़्लाइंग ऑफ़ीसर विनोद नेब अपने कमांडिंग ऑफ़िसर ग्रुप कैप्टेन जॉन से इसरार कर रहे थे कि उन्हें भी कुछ काम दिया जाए. जॉन ने उन्हें ‘कैप’ यानी कॉमबैट एयर पैट्रोल के काम पर लगा दिया.

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विनोद नेब याद करते हैं, "चूँकि मैं नया था. मुझमें इतना आत्मविश्वास नहीं था. इसलिए मैं जल्दी से हेलमेट पहन कर, स्विचेज़ वग़ैरह ऑन करके अपने जहाज़ में बैठ गया. तभी मैंने देखा राठौर दौड़ते हुए आ रहे हैं. उन्होंने मुझे उंगली से इशारा किया कि जहाज़ स्टार्ट करो. उन्होंने मुझे से रेडियो ट्रैफ़िक पर कहा 'इट्स कैप' यानी कॉम्बैट एयर पैट्रोल. जब मैं आसमान में गया तो मैं राठौर के जहाज़ से 250 मीटर की दूरी पर था."

नेब आगे बताते हैं, "मुझे अचानक तीन जहाज़ उड़ते हुए नज़र आए. मैंने कहा बोगी. मुझे ये तक पता नहीं था कि वो सेबर हैं या कोई और जहाज़. सच बोलूँ तो मैं समझा था कि वो अपने मिसटियर्स हैं. मैं राठौर की टेल कवर कर रहा था. तभी मैंने देखा कि वो फ़ायरिंग कर रहे थे. जब फ़ायर होता है तो धुआँ सा निकलता है. मैंने कहा ये तो सेबर है. ओ माई गॉड. मेरे सामने ही एक जहाज़ था."

पिंगले और गाँधी के विमान गिरे

जैसे ही पाकिस्तान के विमान हलवारा एयरबेस के नज़दीक आए, एयर रेड सायरन बजा और विमानभेदी तोपों ने फ़ायरिंग शुरू कर दी. ज़मीन पर मौजूद वायु सैनिक हमलों से बचने के लिए अपने ट्रेंच में भागे.

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उनको चिंता करने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि उनका निशाना वो नहीं बल्कि पहले से ही कैप पर गए पीएन पिंगले और अदी गाँधी के विमान थे.

पीवीएस जगनमोहन और समीर चोपड़ा अपनी किताब 'इंडिया पाकिस्तान एयर वार ऑफ़ 1965' में लिखते हैं, "रफ़ीक़ी का विमान पिंगले और गाँधी के विमान के बीच में आ गया और पिंगले के जहाज़ पर छह ब्राउनिंग गन्स से गोलियों की वर्षा करने लगा. पिंगले के कॉकपिट में धुँआ भर गया और उन्हें हलवारा एयरबेस के ऊपर ही इजेक्ट करना पड़ा."

इस विवरण के मुताबिक़, "गाँधी के विमान को रफ़ीक़ी के नंबर 3 सेसिल चौधरी ने हिट किया. उन्होंने भी 150 फ़ीट की ऊँचाई से इजेक्ट किया और वो भी हलवारा एयरबेस के बाहरी हिस्से में गिरे और उनकी पिंडली की हड्डी टूट गई."

राठौर ने रफ़ीकी का विमान गिराया

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Image caption रफ़ीकी को 1965 के युद्ध में अदम्य साहस के लिए पाकिस्तान का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार दिया गया.

फ़लाइट लेफ़्टिनेंट डीएन राठौर और विनोद नेब से जो कि एक दूसरे 'कैप' पर थे, कहा गया कि वो रफ़ीकी की टीम को इंटरसेप्ट करें. राठौर ने 500 गज़ से अपनी कैनन से निशाना लगाया और रफ़ीक़ी का विमान बांई तरफ़ झुकते हुए ज़मीन से टकरा कर आग के गोले में बदल गया.

उधर विनोद नेब एक दूसरे पाकिस्तानी सेबर के पीछे लग गए. विनोद नेब याद करते हैं, "जब मैंने अपने गन साइट को लगा कर फ़ायरिंग शुरू की तो गोलियाँ चली तो, लेकिन वो ज़मीन की तरफ़ जा रही थीं. फिर मुझे याद आया. मैंने कहा मिस्टर नेब, पहले ग्रेविटी को फ़ीड करिए, तब जा कर आपकी गोलियाँ लगेंगी. मैंने ऐसा ही किया."

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Image caption विनोद नेब द्वारा गिराए गए विमान की तस्वीर, फ्रेम दर फ्रेम.

नेब आगे बताते हैं, "जब मैंने पहली गोली चलाई तो वो उसके टेल पर लगी. मुझे ताज्जुब हुआ कि उसने अपनी स्पीड क्यों नहीं बढ़ाई. एक मौक़ा ऐसा आया कि मुझे थ्रौटल बैक करना पड़ा वर्ना मैं उससे आगे निकल जाता. मुझे ट्रेनिंग में बताया गया था कि किसी जहाज़ को गिराने के लिए 20 से 50 गोलियों काफ़ी होती है. इसके बाद जहाज़ में विस्फोट हो जाता है. वहाँ पर मैं 30 एमएम की चार गन्स एक साथ चला रहा था और जहाज़ टस से मस नहीं हो रहा था."

Image caption बीबीसी हिंदी के स्टुडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ विनोद नेब.

लेकिन नेब की कोशिशों ने रंग दिखाया, "मुझे अपने आप पर शक हो गया कि मेरी गोलियाँ उसे लग भी रही हैं या नहीं. बहरहाल मैंने फ़ायरिंग करना जारी रखा. तभी मैंने देखा कि जहाज़ का विंग टूटने को है. वो एकदम से बांई तरफ़ मुड़ा. मैंने गोली दाग़ना जारी रखा. तभी मैंने देखा कि उसका बाँया विंग टूट ही गया और जहाज़ में ज़ोर का एक्सप्लोजन हुआ. मैं इस चक्कर में कि वो टूट नहीं रहा है, सेबर के बहुत नज़दीक यानी पचास मीटर पास तक चला गया. उसका मलबा मेरी तरफ़ उड़ता हुआ आया. मैंने कहा ब्रेक आफ़ वर्ना यू आर गॉन."

एयरमैन की ख़ुशी

विनोद नेब को अभी तक याद है कि जब वो पाकिस्तानी जहाज़ को गिरा कर नीचे उतरे तो उनका ज़बरदस्त स्वागत किया गया.

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Image caption विनोद नेब द्वारा गिराए गए पाकिस्तानी विमान की तस्वीर.

"सबरीना में फ़ायरिंग के लिंक्स जमा हो जाते हैं. जब एयरमैन ने उसे खोला तो सारे लिंक्स गिरे. वो दृश्य देखने लायक़ था. वो आज भी मेरे ज़हन में बिल्कुल ताज़ा है. उसने सारे लिंक्स को अपने ऊपर फेंकना शुरू कर दिया. उसे इतनी ख़ुशी हुई कि उसने इस जहाज़ में गन की सर्विसिंग करके लगाई और उसको पायलट ने इस्तेमाल किया और उससे जहाज़ गिरा दिया. मैंने उसे पागलों की तरह ख़ुश होते देखा तो उसे दौड़ कर मैंने गले लगा लिया. वो पहला आदमी था जिसको मैंने बहुत ख़ुश होते हुए देखा मेरी वजह से."

अर्जन सिंह ले गए रफ़ीक़ी का आइडेंटी कार्ड

हलवारा के पास सेबर जेट का मलबा मिला. पास ही स्क्वैड्रन लीडर रफ़ीक़ी का शव पड़ा हुआ था. बिल्कुल साबुत. उन्हें देख कर लगता नहीं था कि उनका विमान गिराए जाने से उनकी मौत हुई है.

उनके ओवरऑल से उनका आइडेंटिटी कार्ड बरामद हुआ. उन्हें पूरे सैनिक सम्मान के साथ हलवारा में ही दफ़नाया गया. युद्ध की समाप्ति पर जब एयर मार्शल अर्जन सिंह पाकिस्तान गए तो वो रफ़ीक़ी का परिचय पत्र भी अपने साथ ले गए जिसे बाद में रफ़ीक़ी की पत्नी तक पहुंचा दिया गया.

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Image caption पाकिस्तानी वायुसेना के स्कावड्रन लीडर रफ़ीकी कुर्सी पर बीचोंबीच बैठे हैं.

रफ़ीक़ी को पाकिस्तान का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार हिलाल-ए-जुर्रत दिया गया. पाकिस्तान के सैन्य इतिहासकार क़ैसर तुफ़ैल इस हमले का विश्लेषण करते हुए कहते हैं, "असल में पठानकोट का रेड जा चुका था और भारतीय सावधान हो चुके थे. हलवारा के ऊपर चार हंटर पैट्रोलिंग कर रहे थे. जैसे ही रफ़ीक़ी, यूनुस और सेसिल चौधरी ने अटैक के लिए डाइव लगाई, भारतीय जहाज़ों ने उन्हें इंटरसेप्ट कर लिया."

तुफ़ैल कहते हैं, "रफ़ीक़ी ने एक जहाज़ गिरा दिया. उन्होंने एक और जहाज़ पर निशाना लगाना चाहा लेकिन उनकी गन जाम हो गई और उन्होंने तय किया कि यहाँ से निकल चलें. जब वो निकल रहे थे तो हंटर उनके पीछे पड़ गए. राठौर ने उन पर अटैक किया और उन्हें शूट डाउन कर दिया."

नेब को ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं

राठौर बाद में भारतीय वायु सेना में एयर मार्शल के पद तक पहुंचे. इस समय वो चंडीगढ़ में रहते हैं और बहुत बीमार हैं. उनको ये तक याद नहीं है कि उन्होंने ही रफ़ीक़ी के जहाज़ को गिराया था.

राठौर और विनोद नेब दोनों को उनके इस कारनामे के लिए वीर चक्र दिया गया. विनोद नेब बताते हैं कि कुछ दिनों बाद वायु सेनाध्यक्ष एयर मार्शल अर्जन सिंह अपने कैनबरा विमान में हलवारा एयर बेस का मुआयना करने आए.

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Image caption विनोद नेब को 1965 के युद्ध में अहम भूमिका निभाने के लिए वीर चक्र दिया गया था.

उनके सामने पदक जीतने वाले पायलटों को पेश किया गया. मुझे भी चीफ़ से मिलने के लिए आगे कर दिया गया. उन्होंने मुझसे पूछा क्या तुम अभी ट्रेनिंग ले रहे हो. मैंने कहा हाँ. उन्होंने मेरे सीओ को बुला कर पूछा, नोवी, इनको तुम अभी भी ट्रेनिंग दे रहे हो? हम पायलटों को जहाज़ गिराने की ट्रेनिंग देते हैं. ये तो पहले ही जहाज़ गिरा चुके हैं. इनको किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं है.

कहने का मतलब कि इन्होंने मुझे 6 सितंबर को फ़ुली ऑप घोषित कर दिया जब कि मैंने अपना सिलेबस भी पूरा नहीं किया था.

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