चाय बागान के मज़दूरों के लिए कड़वी है चाय

चाय बागान

बीबीसी की जांच पड़ताल में असम के चाय बागानों में मज़दूरों के काम करने की ख़तरनाक़ और भयावह स्थितियां सामने आई हैं.

इस पड़ताल के बाद पीजी टिप्स, टेटलीज़ और ट्विनिंग्स जैसी ब्रिटेन की कई बड़ी चाय कंपनियों ने कहा है कि जिन चाय बागानों से वो चाय ख़रीदते हैं, उनके साथ मिलकर वो मज़दूरों की स्थिति सुधारने के लिए काम करेंगे.

हैरॉड्स ने अपने कुछ चाय उत्पादों को बेचना बंद कर दिया है जबकि सर्टिफ़िकेट देने वाली संस्था रेनफ़ॉरेस्ट अलायंस ने माना कि इस पड़ताल ने ऑडिट प्रक्रिया में गड़बड़ियों को उजागर किया है.

असम में बीबीसी न्यूज़ और रेडियो फ़ोर के फ़ाइन ऑन फ़ोर द्वारा संयुक्त रूप से की गई पड़ताल में पाया गया कि बागान के मज़दूर और उनके परिवारों के हालात इतने बुरे हैं और मज़दूरी इतनी कम है कि उनमें कुपोषण आम बात है और इसलिए वो बीमारियों के जल्द शिकार हो जाते हैं.

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भारत में क़ानून है कि बागान मालिक मज़दूरों को रहने के लिए घर और टॉयलेट सुविधा देंगे और उनकी मरम्मत की ज़िम्मेदारी भी उनकी ही होगी.

लेकिन हालत ये है कि मज़दूरों के घर जर्जर हालत में हैं, टॉयल या तो टूट गए हैं या गंदगी से भरे हुए हैं.

मज़दूर बताते हैं कि हर साल कहने के बावजूद उनकी मरम्मत नहीं कराई जाती है.

मज़दूरों के रिहाइशी इलाक़ों में ड्रेनेज खुले हुए हैं और उनमें ऊपर तक गंदगी पड़ी रहती है. कुछ मामलों में तो लोगों के घरों में रहने वाली जगहों में मेनहोल से गंदगी ऊपर बहती है.

अधिकांश घरों में बिजली नहीं है और एक बागान में तो मज़दूर पाइप से आने वाले बारिश के पानी को पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं.

दुनिया के सबसे बड़े चाय उत्पादक मैक्लियोड रसल के मालिकाने वाले एक बागान के मैनेजर ने स्वीकार किया कि मरम्मत का बहुत सारा काम लंबे समय से अधूरा पड़ा है.

गंदगी

इस मैनेजर के अनुसार, मज़दूरों के लिए ‘रहने लायक़ स्थितियां नहीं’ हैं और 740 घरों के बीच केवल 464 टॉयलेट हैं.

भारत में चाय उत्पादकों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था 'इंडियन टी एसोसिएशन' के असम शाखा के मुखिया ने भी स्वीकार किया कि काम करने की स्थितियां यहां मानक से बहुत नीचे हैं.

संदीप घोष ने बीबीसी को बताया, “बहती नाली और खुले में शौच एसोसिएशन के लिए भी स्वीकार्य नहीं है. इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है.”

भारतीय क़ानून के मुताबिक़, बेहतर रिहाइश और साफ़ सफ़ाई मज़दूरों के मेहनताने का हिस्सा है.

और यही कारण है कि बागान मालिक इस उद्योग में लगे मज़दूरों को बहुत कम मज़दूरी देते हैं. असम में चाय बागान मज़दूरों की दिहाड़ी 115 रुपए है यानी राज्य में 177 रुपए प्रतिदिन की न्यूनतम मज़दूरी से भी कम.

कुपोषण

चाय बागान इलाक़े में स्थित अस्पताल असम मेडिकल कॉलेज के निदेशक प्रोफ़ेसर एके दास के मुताबिक़, बागान से आने वाले 10 मरीज़ों में से नौ कुपोषण के शिकार होते हैं.

अन्य अध्ययनों से भी पता चलता है कि बागान में कुपोषण का स्तर देश के औसत से भी ज़्यादा है.

प्रो दास के मुताबिक़, यहां ‘ग़रीबी की बीमारी’ आम बात है. यहां आने वाले ज़्यादातर मरीज़ डायरिया, सांस, त्वचा और टीबी जैसे गंभीर संक्रमण और मेनिंजाइटिस जैसी ख़तरनाक बीमारियों से पीड़ित होते हैं.

ये बीमारियां एक दुखद चक्र बन जाती हैं. यहां आने वाले बच्चे कुपोषण से इतने कमज़ोर होते हैं कि मामूली बीमारी से उबरने में भी उन्हें काफ़ी समय लग जाता है और अस्पताल से छूटने के बाद जल्द ही उनकी हालत पहले जैसी हो जाती है.

बाल श्रम

अपनी पड़ताल में बीबीसी ने इन बागानों में बाल श्रम की समस्या भी पाई.

प्रतिष्ठित डूमूर दुलंग बागान में काम करने वाली एक लड़की ने बताया कि वो 14 साल की है और दो महीने से पूर्णकालिक काम कर रही है.

डुमूर दुलंग बागान दुनिया की सबसे पुरानी चाय कंपनियों में शुमार असम कंपनी का है और यहां से ट्विनिंग्स, यॉर्कशायर टी, हैरॉड़्स और फॉर्टनम एंड मैसन को चाय की आपूर्ति की जाती है.

दो अन्य बच्चों ने भी बताया कि वे असम कंपनी के बागानों में बहुत कम उम्र में ही नौकरी पर लग गए थे.

हालांकि बाल श्रम पर संयुक्त राष्ट्र के नियमों के मुताबिक़, 15 साल से नीचे के बच्चों को नौकरी पर नहीं लगाया जा सकता.

घातक रसायन

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असम कंपनी के मालिकाना वाले एक बागान में मज़दूर बिना किसी सुरक्षा उपाय के ही केमिकल का छिड़काव कर रहे हैं.

इन मज़दूरों ने बताया कि सुरक्षा उपकरण साल भर में एक बार दिए जाते हैं, लेकिन वो कुछ ही महीने में बेकार हो जाते हैं और उन्हें बदला नहीं जाता.

उन्होंने इसके बुरे प्रभावों की भी शिकायत की, जैसे जलन, सांस लेने में दिक़्क़त, हाथों और चेहरे का सुन्न होना और भूख का ख़त्म होना.

मैक्लियोड रसल के एक बागान में केमिकल छिड़कने वाले मज़दूर केवल मुंह पर कपड़ा बांधे हुए थे.

असम कंपनी ने बीबीसी के आरोपों को ‘बेबुनियाद और ग़लत’ बताया है.

मैक्लियोड रसेल का कहना है कि मज़दूरों की सुरक्षा और उनके रहने संबंधी व्यवस्था कंपनी के लिए प्राथमिकता में है.

इसके मुताबिक़, कंपनी मज़दूरों को सुरक्षा उपकरण मुफ़्त में मुहैया कराती है और उन्हें ट्रेनिंग देती है और समय-समय पर चेकिंग भी की जाती है.

कड़ी निगरानी

चाय कंपनियां मज़दूरों की रिहाइश वाली जगहों पर पुलिस पहुंच पर कड़ी निगरानी रखती हैं.

मज़दूर शोषण के बहुत आसानी से शिकार इसलिए भी हो जाते हैं क्योंकि कंपनियां मज़दूरों की ज़िंदगी के बहुत सारे पहलुओं को नियंत्रित करती हैं.

मज़दूरों के रिहाइश वाले इलाक़ों तक सार्वजनिक पहुंच को दख़ल की तरह लिया जाता है.

यहां तक कि बीबीसी को भी मैक्लियोड रसेल के बागानों में इन जगहों पर जाने की इजाज़त नहीं दी गई और टीम को फ़ैक्ट्री परिसर में कुछ देर के लिए बंद कर दिया गया था.

पिछले साल कोलंबिया लॉ स्कूल के ह्यूमन राइट्स इंस्टीट्यूट ने टाटा के मालिकाना वाले बागानों में काम करने की स्थितियों पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी.

भारत की कांग्लोमरेट कंपनी टाटा टेट्ली टी की मालिक है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, काम करने की अमानवीय और ग़ैरक़ानूनी परिस्थितियां इस उद्योग में आम हैं.

हालांकि टाटा ने बीबीसी को बताया कि वो अपने बागानों में कई गंभीर सामाजिक मुद्दों पर ध्यान दे रही है और कंपनी रहने और कार्य परिस्थियों में सुधार के लिए कड़ी मेहनत कर रही है.

चिंताजनक

बीबीसी की पड़ताल पर टाटा ने कहा कि कंपनी अपनी पूरी सप्लाई चेन में लगे लोगों के प्रति ‘निष्पक्ष और नैतिक’ सलूक के लिए प्रतिबद्ध है.

कंपनी के मुताबिक़, एथिकल टी पार्टनरशिप (ईटीपी) में उसकी सदस्यता का होना इस बात का सबूत है.

चाय बनाने में लगे लोगों की ज़िंदगी में सुधार लाने के लिए ब्रिटेन की चाय कंपनियों ने इस संस्था को बनाया है.

इसके कार्यकारी निदेशक सारा रॉबर्ट्स, जो ट्विनिंग्स की ओर से भी बात कर रही थीं, ने कहा कि उसके सदस्य चाय उत्पादक इलाक़ों की चुनौतियों से वाक़िफ़ हैं.

उन्होंने कहा कि संस्था उद्योग के साथ मिलकर उन लोगों के लिए काम कर रही है जो इस उद्योग में लगे हुए हैं.

फ़ॉर्टनम एंड मैसन के मुताबिक़, मज़दूरों का कल्याण उनकी ‘पहली प्राथमिकता’ है और इसकी सभी चाय एथिकल टी पार्टनरशिप की निगरानी में उत्पादित की जाती है.

पीजी टिप्स और लिप्टन्स के स्वामित्व वाली कंपनी यूनीलीवर का कहना है कि बीबीसी द्वारा उठाए गए मुद्दों को उसने गंभीरता से लिया है, लेकिन इस ओर पहले से काम हो रहा है.

हालांकि कंपनी ने माना कि “मानकों पर खरे उतरने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है और कंपनी अपने आपूर्तिकर्ताओं के साथ ज़िम्मेदार और टिकाउ तंत्र विकसित करने के लिए काम कर रही है.”

हैरॉड्स ने कहा है कि बीबीसी की पड़ताल के बाद उसने डूमूर दुलंग चाय को अपने यहां से हटा लिया है, लेकिन ये भी कहा कि इस साल इस बागान से उन्होंने कोई चाय नहीं ख़रीदी है.

सर्टिफ़िकेट

इस बीच यॉर्कशायर टी ब्रांड की मालिक टेलर्स ऑफ़ हैरोगेट ने बीबीसी को बताया कि बीबीसी की पड़ताल को लेकर वो बहुत चिंतित है और कहा है कि वो इस मामले की तहक़ीक़ात कर रही है.

बीबीसी ने जिन बागानों का दौरा किया उन सभी के पास रेनफ़ॉरेस्ट अलायंस का सर्टिफ़िकेट था और उन्हें ‘फ़्रॉग सील’ के मुहर से नवाज़ा गया था, जोकि कई अग्रणी चाय ब्रांड के पैकेट पर प्रदर्शित होता है.

रेनफ़ॉरेस्ट अलायंस एक एनजीओ है, जिसका दावा है कि वो जैव विविधता के संरक्षण और टिकाऊ जीवनयापन के लिए काम करती है. इसका कहना है कि फ़्रॉग सील का मतलब होता है कि उद्योग में मज़दूरों, उनके परिवारों और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा से संबधी सभी मानदंडों का ख़्याल रखा गया है.

स्थानीय एनजीओ पाझरा के कार्यकर्ता स्टीफ़ेन एक्का बागानों में कार्य परिस्थितियों में सुधार के लिए अभियान चला रहे हैं.

वो कहते हैं कि रेनफ़ॉरेस्ट अलायंस के 'फ़्रॉग लोगो' का संबंध मज़दूरों की हालत सुधारने से ज़्यादा चाय बेचने से है.

हालांकि रेनफ़ॉरेस्ट अलायंस ने इन मुद्दों को सर्टिफ़िकेट देने की प्रक्रिया से जुड़ा बताया.

इसके निदेशक एडवर्ड मिलार्ड ने कहा, “यह ऑडिटिंग प्रक्रिया की वजह से है क्योंकि साल में एक बार होने वाली जांच पर यह आधारित होता है और यह पूरी तरह सटीक नहीं होता है.”

उन्होंने स्वीकार किया कि असम में रिहाइश एक ‘व्यवस्थित समस्या’ है और इनमें सुधार बेहद ज़रूरी है.

उन्होंने बीबीसी से यह भी कहा कि अगर संस्था के ऑडिटरों ने बागानों में किसी बाल श्रमिक को पाया होता या बिना सुरक्षा उपकरण के रसायन छिड़कते हुए मज़दूरों को पाया होता तो उस बागान को सर्टिफ़िकेट नहीं दिया जाता.

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