'मोदी और बच्चन को बुलाना पाखंड'

अशोक वाजपेयी, हिंदी साहित्यकार

समकालीन हिंदी साहित्य के प्रमुख नाम अशोक वाजपेयी का कहना है कि हिंदी की हालत इतनी दयनीय हो गई है कि उसके अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन एक राजनेता (प्रधानमंत्री मोदी) करते हैं और समापन के लिए एक अभिनेता (अमिताभ बच्चन) को बुलाया जाता है.

अशोक वाजपेयी इसे पाखंड मानते हैं, उन्हें यह धन व समय की बर्बादी लगती है.

वो कहते हैं, "इससे हिंदी का कोई भला नहीं होने वाला. यदि मुझे निमंत्रण मिला भी होता तो भी मैं भोपाल नहीं जाता."

सम्मेलन कारगर होगा?

साहित्य और संस्कृति पर समान अधिकार रखने वाले अशोक वाजपेयी को भोपाल के भारत भवन के निर्माण में अहम भूमिका अदा निभाने के लिए भी जाना जाता है.

दसवां विश्व हिंदी सम्मेलन भोपाल में हो रहा है, लिहाजा इस मौके पर सम्मेलन की अवधारणा और विषय वस्तु पर उनके साथ विमर्श लाज़मी है.

हिंदी की समृद्धि की दिशा में यह सम्मेलन कितना कारगर साबित होगा?

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वाजपेयी कहते हैं, "मैं हिंदी के एक विश्व सम्मेलन में गया था, जो लंदन में हुआ था. न्यूयार्क और त्रिनिदाद नहीं गया, बावजूद इसके कि सरकारी प्रतिनिधिमंडल में शामिल था. लंदन का अनुभव अच्छा नहीं रहा. दुर्व्यवस्था थी और दृष्टि भी नहीं थी."

'हिंदी अंतरराष्ट्रीय भाषा नहीं'

अशोक वाजपेयी कहते हैं, "दरअसल सम्मेलन अपने आप में यह भ्रम पैदा करता है कि हिंदी अंतरराष्ट्रीय भाषा है. दरअसल हिंदी अंतरराष्ट्रीय भाषा नहीं है. इसलिए नहीं है कि जहां जहां इसका रहना बताया जाता है, वहां हिंदी जीवन व्यवहार और राजकाज की भाषा नहीं है."

वे कहते हैं, "हिंदी विचार और अभिव्यक्ति की भाषा भी नहीं है. सबकी अपनी-अपनी भाषाएं हैं. सच यह है कि 65 साल के बावजूद अपने देश में ही हिंदी राजभाषा नहीं बन पाई तो अंतरराष्ट्रीय भाषा कैसे कहलाएगी? इस सम्मेलन के नाम पर होगा यही कि करोड़ों रूपए फूंक दिए जाएंगे."

अशोक वाजपेयी का मानना है, "भोपाल में हो रहा उत्सव खुद बताता है कि हिंदी अभी तक राजभाषा नहीं बन सकी है. कामकाज में हिंदी का उपयोग घटता गया है. अब आप उसकी हालत देख ही रहे हैं कि सम्मेलन का उद्घाटन एक राजनेता कर रहा है और समापन एक अभिनेता."

'सत्ताधारी दल के ख़िलाफ़'

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सम्मेलन पर अशोक वाजपेयी ने कहा, "भोपाल के इस सम्मेलन को साहित्य से दूर रखने का भी कारण है. सत्ताधारी दल (भाजपा) का समर्थन करने वाले महत्वपूर्ण लेखक हिंदी में नहीं हैं. ज़्यादातर लोग उनके विरुद्ध हैं. कम से कम उनकी संकीर्णता, असहिष्णुता वगैरह के ख़िलाफ़ हैं. पिछले 50-60 बरस का साहित्य इन व्यक्तियों के ख़िलाफ़ है."

वे कहते हैं, "इसलिए साहित्यकार और साहित्य को सोच-समझकर विश्व हिंदी सम्मेलन से दूर रखा गया होगा. क्या पता साहित्यकार ऐन वक़्त पर क्या कह दे? साहित्यकार जब राजनीति के लिए अविश्वसनीय हो जाए तो समझिए कि उसका नैतिक कद बढ़ गया."

प्रधानमंत्री को खुश रखना है?

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सम्मेलन के उद्घाटन के पहले भोपाल हवाई अड्डे पर मोदी की सभा रखे जाने पर अशोक वाजपेयी ने सियासी अंदाज़ में टिप्पणी की.

उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री के और भी बहुत काम होते हैं, इसमें कोई हर्ज नहीं है. मैं कोई अटकल नहीं लगाना चाहता हूं. यह मुमकिन है कि व्यापमं मामला देर सबेर मुख्यमंत्री को भी चपेट में ले ले."

वाजपेयी कहते हैं, "संभव है कि उनकी कोई भूमिका न हो, पर हो भी सकती है. लेकिन इसके लिए भी प्रबंध किया जा रहा है प्रधानमंत्री को हर हालत में खुश रखा जाए, ताकि आगे जाकर मामला फंसे तो वे बचाव में आएं. कोई मुझसे ऐसा कह रहा था, पता नहीं इसमें क्या सच्चाई है?"

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