'संघसेवियों की नज़र में हिन्दी का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं'

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अनेक लोगों को आशंका है कि आने वाले दिनों में हिन्दी के संस्कृतकरण की गति तेज़ होने वाली है.

भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन में मौजूद बहुत सारे लोगों का यही मत है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग जिस तरह की हिन्दी लिखते-बोलते हैं उसी को 'आदर्श हिन्दी' बताने-बनाने का अभियान कुछ लोग चला रहे हैं.

बात यह नहीं है कि हिन्दी को संस्कृत के शब्दों से परहेज़ करना चाहिए, लेकिन भाषा को संस्कृतमय बना देना अतिवाद है.

मगर संघसेवियों की नज़र में हिन्दी का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है.

इन लोगों की नज़र में मध्यकाल से लेकर अब तक केवल सांस्कृतिक पतन ही होता आया है और जितनी जल्दी सतयुग की ओर लौट चलें, उतना ही अच्छा होगा. यह हठधर्म कुछ नया नहीं है.

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जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस रचा था और पंडितगण उनकी रचना को भदेस कहकर हँसते थे, तब से यह क्रम चला आ रहा है.

हिन्दी की जो खुशबू आज दुनिया भर में महक रही है वह सरकारों के धर्मनिरपेक्ष नारों और केसरिया पताकाओं के असर से नहीं बल्कि डेढ़ हजार साल तक अलग-अलग संस्कृतियों की आपसी रच बस से पैदा हुई है.

भाषा पर चर्चा के दौरान अक्सर अँग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव से 'प्रदूषित होती हिन्दी' पर फ़िक़्र जताई जाती है.

ऐसी चिंता करने वाले यह भूल जाते हैं कि बीते बारह सौ साल में कोई वक़्त ऐसा नहीं रहा जब इस देश की भाषाओं पर विदेशी भाषाओं का प्रभाव न पड़ा हो.

यह राज्यसत्ता या धर्म के ज़ोर पर नहीं हुआ बल्कि बाज़ार की ज़रूरत पर हुआ.

उपज के लिए ‘फ़सल’ शब्द आम हो गया. कोश के लिए ‘ख़ज़ाना’ शब्द का कोई दूसरा विकल्प हिन्दी में ढूँढने से भी नहीं मिलता.

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‘साबुन’ का कोई विकल्प हिन्दी के पास नहीं है. पुर्तगाली मूल के सैपोन शब्द को अरब सौदागरों ने साबुन बनाया.

होता यह है कि बड़ा भाषायी समूह ही किसी भी समाज का प्रभावी समूह होता है.

'शालिग्राम से सालिगराम'

चाहे धर्म और सत्ता जैसे तत्व उसके ख़िलाफ़ हों, भाषा अलग-अलग समाज-संस्कृतियों के बीच फलती-फूलती है.

बीती कई सदियों से अरबी, फ़ारसी, पुर्तगाली, अंग्रेजी के बीच पलती-पनपती हिन्दी इसका प्रमाण है.

किसी शब्द में दिक्कत होते ही उस भाषायी समूह का ध्वनितंत्र नए शब्दों के साथ अनुकूलन स्थापित कर लेता है.

स्कूल-इस्कूल, लैन्टर्न-लालटेन, एग्रीमेंट-गिरमिट, गैसलाईट-घासलेट, ऊं नमो सिद्धम्- ओनामासीधम, सिनेमा-सनीमा, प्लाटून-पलटन, बल्ब-बलब-बलप-गुलुप, लेफ्टिनेंट-लपटन जैसे अनेक शब्द हैं.

संस्कृत के शालिग्राम को सालिगराम होते देर नहीं लगती.

अक्सर हिन्दी में तकनीकी शब्दावली की दुरूहता के पीछे उसकी संस्कृतनिष्ठता होती है.

आधुनिक विज्ञान की सारी शब्दावली ग्रीक मूल के शब्दों से अंग्रेजी में बनाई गई है. औद्योगिक क्रांति के साथ ही आधुनिक विज्ञान का विकास भी हुआ जो पश्चिम की देन है.

ज़रूरत सिर्फ वैज्ञानिक शब्दावली के देवनागरी रूपांतर की थी.

नाइट्रोजन के लिए नत्रजन कठिन है. ध्वनिविज्ञान के हवाले से नहीं, बल्कि सहज व्यवहार में. यही समस्या डिस्टिल्ड वॉटर के लिए ‘आसुतजल’ कहने में भी है.

‘आसवन’ का अर्थ जिसे पता है, वह भी आसुतजल नहीं कहता. आप कोई तरीका बता सकते हैं कि इस कड़ी के आसुत, आसवनी, आसवन जैसे शब्दों को आमफ़हम कैसे बनाया जा सकता है?

अभिव्यक्ति अपनी राह खोजती है. गाँव में अगर डिस्टीलरी खुलती है तो वहां 'आसवनी' का बोर्ड नहीं लगता.

अंग्रेज़ी के शब्द

अगर लगे तो शायद गांववाले उसे आसवनी कहना सीख जाएँ. वे उसे या तो डिस्टीलरी कहेंगे या दारू फैक्टरी.

डिस्टिल्ड वाटर नहीं, लेकिन हमें 'डिस्टिल वाटर' के लिए तो तैयार रहना ही चाहिए जो देहातों-कस्बों में लोग बोलते हैं.

इस कड़ी के 'अनडिस्टिल्ड' जैसे शब्दों को उच्चारने की अभी तक समाज को जरूरत नहीं पड़ी है.

ऐसा हुआ तो राह भी अपने आप निकलेगी. बोलचाल में डिस्टिलेशन ही चल रहा है.

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‘मोटर’ का हिन्दी अनुवाद क्या है? ‘गाड़ी’ से क्या इसकी सही तस्वीर उभरती है? मोटर को क्यों न चलने दिया जाए.

‘जहाज़’ और ‘पोत’ दोनों ही प्रचलित हैं. तो भी हिन्दी में ‘शिप’ स्वीकार्य होना चाहिए. एयरक्राफ्ट कैरियर का ‘विमानवाही पोत’ अनुवाद बीते कई दशकों से सहज और स्वीकार्य बना हुआ है लेकिन आप ‘नत्रजन’ के बारे में यह बात नहीं कह सकते.

‘ऐपल’ ने सेब को चलन से बाहर नहीं किया है. सेब धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है. सेब की अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी वाले ‘ऐपल’ को स्वीकार कर लें, ऐसा दुराग्रह तो सरलता के हामी किसी हिन्दीप्रेमी ने नहीं किया.

‘दाड़िम’ कि तुलना में अनार डटा हुआ है और द्राक्षासव की जगह अंगूरी भी. ‘वाइन’ की तुलना में शराब डटी हुई है और मदिरा, मद्य का साहित्यिक संस्कार भी बरकरार है.

यह सब किसी सरकारी प्रयास से नहीं हो रहा है. भाषा का समाजवाद करा रहा है यह सब. बीसियों मिसालें सामने हैं.

हिन्दी की 'घरवापसी'

हम हिन्दी को बिगड़ते देखने की जगह इसके विकास के गवाह बन रहे हैं, इसे उदारता से स्वीकार करने की ज़रूरत है.

तकनीक से जुड़ा देशज ज्ञान सदियों से हमारे पास है उसकी शब्दावली आज भी वही इस्तेमाल होती है जो लोगों की समझ में आती है.

फर्मेंटेशन के लिए खमीर उठना जैसी अभिव्यक्ति ही उभरती है, किण्वन किताबी शब्द है. यह कभी प्रचलित रहा होगा, इसमें संदेह है.

अब खमीर की बात करें तो सदियों पहले अरबी मूल का यह शब्द हिन्दी की धारा में समा गया.

खमीर उठने की प्रक्रिया के लिए निश्चित ही लोक बोलियों में जो अभिव्यक्तियां हैं उन्हें आम बोलचाल की हिन्दी ने नहीं अपनाया.

इतिहास, भाषा और संस्कृति का शोधन करने की कोशिश करने वालों को पहले उसकी समझ हासिल करनी चाहिए और उसके सहज प्रवाह को स्वीकार करना चाहिए.

हिन्दी की 'घर वापसी' कराने की कोशिश करने वालों को हिन्दी का हिंदू नाम भी सोचना होगा.

संस्कृतनिष्ठ संपर्क भाषा को लोग शायद स्वीकार कर लें लेकिन उसके लिए 'भारती' जैसा कोई नाम सोचना चाहिए क्योंकि हिंदवी या हिन्दी से फ़ारसी की बू तो नहीं जाने वाली और क्यों जाए?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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