जब पिघल गई थी लोहे की सलाखें..

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शाम लगभग छह बजे का समय था. न्यूज़ के दृष्टिकोण से बिल्कुल फीका दिन था. मैं अपना बैग संभाले बीबीसी के अपने मुंबई दफ्तर से घर जाने की तैयारी कर रहा था. बाहर हल्की बारिश हो रही थी इसलिए इमारत के बाहर निकलने में संकोच कर रहा था.

अचानक मेरे मोबाइल फ़ोन की घंटी बजी. लाइन पर तेज़ आवाज़ में बोलता एक स्थानीय मराठी पत्रकार दोस्त था. "बांद्रा स्टेशन के पास एक लोकल ट्रेन में बम ब्लास्ट हुआ है".

वो ग्यारह जुलाई का दिन था. साल था 2006. बांद्रा स्टेशन मेरे दफ्तर के क़रीब था. मैं फ़ौरन वहां पीछे की तरफ से पहुंचा. झोपड़ पट्टियों में रहने वालों ने हमें ऊंची दीवार फांदने में मदद की. दीवार के ऊपर से ट्रेन के एक डिब्बे को देख सकता था जो स्टेशन से कुछ दूरी पर रुका था. ट्रेन नहीं थी, केवल एक डिब्बा था.

बारिश और ढलती शाम में वहां पर मौजूद पुलिस और स्थानीय लोगों को देख सकता था, लेकिन वहां क्या हो रहा है वो नज़र नहीं आ रहा था.

खैर डिब्बे तक पहुँचने के लिए मैं ऊंची दीवार से नीचे कूदा और दौड़ते हुए डिब्बे तक पहुंचा.

'लोहे की सलाखें पिघलीं'

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वहाँ का मंज़र अब तक मेरी आँखों के सामने है. डिब्बे का आधा हिस्सा बर्बाद हो चुका था. लोहे की सलाखें मोम की तरह पिघल चुकी थीं. सीटें ग़ायब थीं.

कई शव निकाले जा चुके थे. कई और निकाले जाने की कोशिश की जा रही थी. मैं उस समय वहां मौजूद अकेला पत्रकार था. धमाका हुए आधा घंटा हुआ था. बीबीसी दिल्ली से मेरे साथी मुसलसल फ़ोन कर रहे थे, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली.

बाद में पता चला फ़ोन लाइनें जाम हो गईं थीं. लेकिन बीबीसी लंदन ने जब फ़ोन किया तो उनका फ़ोन लग गया.

'शव निकालना किसकी ज़िम्मेदारी?'

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वहाँ डिब्बे के बाहर वर्दी वाले दो गुटों में बहस इस बात पर हो रही थी कि शवों को निकालने की ज़िम्मेदारी किसकी है.

मुंबई पुलिस के लोगों का तर्क था कि डिब्बा पटरियों पर खड़ा है जो रेलवे पुलिस के अंतर्गत आता है.

रेलवे पुलिस के लोग कह रहे थे कि ये एक आतंकी हमला है इसलिए बचाव और राहत का काम मुंबई पुलिस की ज़िम्मेदारी है.

बीबीसी के 'न्यूज़ ऑवर' नामक प्रोग्राम पर मैं लाइव था. मैंने जब बताया कि राहत का काम रेलवे और मुंबई पुलिस के बीच मतभेद के कारण रुक गया है तो प्रोग्राम को प्रस्तुत करने वाले मेरे सहयोगी हैरान रह गए थे.

मेरा ये पुराना तजुर्बा है कि किसी बड़े कांड के दौरान मौके पर पुलिसवाले पत्रकारों से कम ही बात करते हैं. प्रामाणिक जानकारी लेने का मेरा एक अपना तरीका है.

पुलिस वैन के पास खड़े हो जाओ या उन अफसरों के निकट जिनके हाथों में वॉकी-टॉकी हो. मैंने ऐसा ही किया. वॉकी-टॉकी पर थोड़ी-थोड़ी देर पर दूसरी जगहों से ट्रेनों पर बम धमाकों की ख़बरें आती जा रही थीं.

'आठ मिनट में सात बम धमाके'

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आधे घंटे में ये साफ़ हो गया कि शाम 6.24 बजे से 6.32 तक सात अलग-अलग लोकल ट्रेनों में बम धमाके हुए हैं.

शाम के समय मुंबई की लोकल ट्रेनों में तिल धरने को जगह नहीं होती है. ज़ाहिर है ये हमले पूरी योजना के साथ किए गए थे और इरादा ये था कि अधिक से अधिक लोग धमाकों में मारे जाएँ.

हमला करने वाले अपनी योजना में कामयाब रहे. लगभग 190 लोग मारे गए और 700 यात्री घायल हुए.

शाम के समय ट्रेनों के अलावा मुंबई की सड़कों पर भी भारी भीड़ होती है. देखते ही देखते शहर में अफरा-तफरी फैल गई. लोकल ट्रेनें स्थगित कर दी गईं. यातायात ठप पड़ गया. लाखों लोग बस अड्डों और ट्रेन स्टेशनों में फंसे रह गए.

मज़बूत इरादे

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मुंबई के लोग मज़बूत इरादों के होते हैं और उनका हौंसला आसानी से पस्त नहीं होता. ये मैंने सुन रखा था.

अगले दिन सुबह-सुबह देख भी लिया. मैंने सोचा था ट्रेनें बंद रहेंगी, दफ्तर और स्कूल नहीं खुलेंगे. लेकिन मैं जब बांद्रा स्टेशन पर वापस आया तो सुबह की पहली लोकल ट्रेन आकर रुकी. उसमें यात्री और दिनों के मुकाबले कम थे, लेकिन ट्रेन में मौजूद सभी लोग बग़ैर खौफ़ और भय के अपने दफ्तरों और अपने काम पर जा रहे थे.

अगर हमला करने वालों का इरादा मुंबई में दहशत फैलाना था तो वो उसमें कामयाब नहीं हुए.

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