रात की पहरेदारी में भी पेंटर बनने का जुनून

  • 12 सितंबर 2015
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आदिवासी गोंड चित्रकार भज्जू श्याम का नाम लगभग सभी जानते हैं.

मध्य प्रदेश के पाटनगढ़ गाँव में जन्मे भज्जू का कला से नाता इतना ही था कि घर की दीवारों पर चित्र बनाते समय जब माँ के हाथ ऊंचाई तक नहीं पहुँचते तो वो उसे पूरा करते थे.

आर्थिक अभाव के चलते 16 साल की उम्र में वो अपने चाचा जनगढ़ श्याम के पास भोपाल आ गए, जो उस वक़्त भारत भवन में बतौर आदिवासी चित्रकार काम कर रहे थे.

उस दौरान वो रात में पहरेदारी के काम के साथ दिन के समय अपने चाचा के चित्रों में रंग भरने का काम करने लगे.

धीरे-धीरे जब भज्जू का हाथ जम गया तो अपने चाचा की सलाह पर उन्होंने स्वतंत्र रूप से चित्रकारी शुरू की.

1998 में पेरिस में एक प्रदर्शनी में उनके गोंड चित्रों को खूब सराहा गया, उसके बाद उनके चित्र कई देशी-विदेशी प्रदर्शनियों का हिस्सा बने.

उनकी किताब 'लंदन जंगल बुक' पांच विदेशी भाषाओं के साथ हिंदी में भी छापी गई है. 2001 में उन्हें 'बेस्ट इंडिजिनस आर्टिस्ट' का अवार्ड मिला. आजकल भज्जू श्याम भोपाल में रह रहे हैं.

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Image caption भज्जू श्याम का कहना है कि गोंड कला में भी हर चित्रकार का अपना अलग ढंग होता है. चित्र देखकर बताया जा सकता है की यह किस कलाकार का है.
Image caption भज्जू मानते हैं कि आदिवासी चित्रकला को इस मक़ाम तक पहुँचाने में भोपाल के भारत भवन ने बड़ी भूमिका निभाई है.
Image caption गोंड चित्रकला में काल्पनिक पशु पक्षियों से लेकर देवताओं और पेड़ पौधों के रूपाकार बनाए जाते हैं.
Image caption भज्जू लगता है युवा गोंड कलाकार अपने इतिहास से अनभिज्ञ हैं, क्योंकि वो शहर में पैदा हुए हैं.
Image caption उनकी बेटी भी आगे चलकर कलाकार ही बनना चाहती हैं.
Image caption उनका कहना है कि कलाकारों को अपनी संस्कृति नहीं भूलनी चाहिए तभी वे बेहतर कलाकार बन सकते हैं.
Image caption गोंड चित्रों पर उन्होंने ' क्रिएशन्स' नाम की किताब भी लिखी है. इसके अलावा देश - विदेश में गोंड चित्रकला पर वर्कशॉप भी करते रहते हैं.
Image caption पारंपरिक कहानियों के अलावा भज्जू अपने आसपास घट रही घटनाओं और अनुभवों को भी चित्रित करते हैं.
Image caption उनकी किताब ' लंदन जंगल बुक ' में भज्जू ने लंदन में गुजारे दो महीनों के अनुभव और भावनाओं को चित्रित किया है.

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