आर्थिक सुधारों को लेकर कितने गंभीर मोदी

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नरेंद्र मोदी आर्थिक सुधारों को लेकर कितनी गंभीर है?

मैं यह सवाल न तो आर्थिक सुधारों के पैरोकार के रूप में कर रहा हूँ न ही इसके विरोधी के रूप में. सच कहूँ तो मेरी इसमें कोई दिलचस्पी ही नहीं है क्योंकि मैं यह नहीं मानता कि महज़ विधेयक पास कर देने से भारत की बड़ी बड़ी गड़बड़ियां ठीक हो जाएंगी.

मैं ग़लत हो सकता हूँ और मैं इसे मानता भी हूँ. पर इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि कई लोगों ने मोदी सरकार से बड़े आर्थिक सुधारों की उम्मीद लगा रखी थी. उन्हें लगता था कि सरकार कोई चमत्कार कर देगी. फिर ऐसा हुआ क्यों नहीं?

मीडिया और उद्योग जगत में मोदी समर्थकों को उम्मीद थी कि सरकार संसद के पिछले सत्र में कम से कम भूमि अधिग्रहण विधेयक और नया गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स तो पारित करवा ही लेगी. ऐसा न हो सका.

संसद ठप करने की राजनीति

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इसकी एक वजह तो यह ज़रूर है कि कांग्रेस ने सत्र के ज़्यादा समय संसद चलने ही नहीं दिया.

बाद में वह इस मुद्दे पर बहस करने को राजी हो गई. पर बहस में एक पक्ष दूसरे पर ज़ोर ज़ोर से बोलता रहा और कुछ ख़ास नहीं हुआ. दोनों में से कोई विधेयक पारित नहीं हो सका.

बाद में मोदी ने ऐलान कर दिया कि वे भूमि अधिग्रहण विधेयक वापस ले रहे हैं. इससे यह स्पष्ट नहीं हो सका कि उन्होंने विधेयक में ख़ामी होने के कारण ऐसा किया या उसे पूरा समर्थन नहीं मिलने की वजह से.

मेरा सवाल है: मोदी सुधारों को लेकर कितने गंभीर हैं? मैं यह सवाल इसलिए उठा रहा हूँ कि कुछ घटनाओं से मुझे लगता है कि वे बहुत गंभीर नहीं हैं.

उन्होंने और सोनिया गांधी ने एक दूसरे पर तीखे हमले भी किए. सोनिया ने मोदी के कामकाज के तरीके पर टिप्पणी करते हुए उसे महज़ हवाबाज़ी क़रार दिया.

पलटवार

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मोदी ने तुरंत पलटवार किया. उन्होंने कहा कि जो लोग 'हवालाबाज़ी' करते रहे हैं, वे उन्हें भाषण न दें.

इस वाद-विवाद से वह एक बार फिर स्पष्ट हो गया, जो कई लोग पहले से ही मानते रहे हैं. मोदी चुनावी राजनीति में चोट करने और जवाब देने में बहुत अच्छे हैं और वे कई बार निहायत ही ज़बरदस्त जुमलों का इस्तेमाल कर सकते हैं.

चुनाव अभियान में वे बहुत ही आक्रामक और तेज़ हैं.

पर अच्छी राजनीति सुशासन भी हो, यह ज़रूरी नहीं. राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए कांग्रेस जो कुछ कर सकती है, कर रही है.

फ़िलहाल, इसकी कोई राजनीतिक साख नहीं है.

अच्छी राजनीति

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संसद ठप करना अनैतिक था, किसी सिद्धांत पर आधारित नहीं था और न ही किसी तरह से जायज़ ही था. पर यह बहुत अच्छी राजनीति थी.

एक साल तक अप्रांसगिक रहने के बाद कांग्रेस पार्टी राजनीति और मीडिया, दोनों में प्रासंगिक बन गई.

सोनिया और उनके लोग व्यवधान और बयानबाज़ी से ही सुर्खियों में जगह पा सकते हैं. कांग्रेस इतनी छोटी पार्टी है कि वह और कुछ कर नहीं सकती.

मोदी निश्चित रूप से यह जानते हैं. उनके पास दो ही विकल्प हैं.

पहला विकल्प यह है कि वे कांग्रेस को इसकी छूट दें कि वह अपनी शर्तों पर सरकार से बात करे. यदि उन पर कोई हमला करता है तो वे पलटवार करें और अपने समर्थकों को खुश करने के लिए चालाकी भरी बातें कहें.

सुषमा का जवाब

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लोकसभा में बिल्कुल यही हुआ. वहां हुई छोटी बहस में सुषमा स्वराज ने गांधी परिवार पर जमकर हमला किया.

उन्होंने मरे हुए लोगों को भी नहीं बख़्शा. इससे उन्हें मीडिया में एक दिन के लिए बहुत ही अच्छा कवरेज मिला, पर मानसून सत्र एक तरह से बर्बाद हो गया.

मोदी को यह पता होना चाहिए था, पर उन्होंने विधेयक पारित करवाने की बजाय पलटवार करना ही बेहतर समझा. उन्होंने इसके बाद कांग्रेस पर विकास विरोधी होने का आरोप भी मढ़ दिया.

अगर यही उनकी रणनीति है तो लगता है कि संसद में गतिरोध बने रहने से विपक्ष पर दवाब बढ़ेगा और वह उससे ढह जाएगा.

मुझे नहीं लगता है कि यह बुद्धिमानी भरी रणनीति है, क्योंकि कांग्रेस को ऑक्सीजन व्यवधान से ही मिलता है.

इसके पास दूसरा कोई हथियार नहीं है. विकास विरोधी होने का आरोप लोगों को जमा नहीं.

रियायत नहीं

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मोदी के पास दूसरा विकल्प यह है कि वह कांग्रेसे से हाथ मिला लें और उसे कुछ रियायतें दें.

वे किसी का इस्तीफ़ा न लें तो कम से कम जांच पर ही राज़ी हो जाएं.

यहां व्यक्तित्व का सवाल उठता है. मेरा मानना है कि मोदी वाद विवाद में पलटवार करने के लोभ से नहीं बच सकते.

वे मनमोहन सिंह की तरह किसी अपमान को हज़म या नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. अगर सोनिया कुछ कहेंगी तो वे उसका जवाब देंगे.

इसका नतीजा यह है कि सरकार विेधेयक पास करवाने के लिए कांग्रेस की ओर हाथ नहीं बढ़ा रही है. ऐसा नहीं लगता है कि मोदी अपना रवैया बदलेंगे.

ईमानदार कोशिश नहीं?

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शायद यह तात्कालिक हो और बिहार चुनावों के बाद ख़त्म हो जाए.

मुमिकन है कि मोदी अभी भी चुनाव जैसी मनःस्थिति में ही हों और इस अंतिम रुकावट को पार करने के बाद विधेयक पारित करवाने पर गंभीर हो जाएं.

अगर मोदी ऐसा नहीं करते हैं तो लोग यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि क्या वे लटके पड़े विधयकों को पारित करवाना चाहते भी हैं या नहीं.

मुझे तो लगता है कि उन्होंने इन विधेयकों को पास करवाने के लिए पूरी ईमानदारी से कोशिश ही नहीं की है.

(लेखक एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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