झाबुआ: 'समय पर दुकान जाता, तो नहीं बचता'

मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के पेटलावद कस्बे में शनिवार को हुए विस्फोट के बाद से कस्बा ग़म में डूबा हुआ है.

बीस हज़ार की आबादी वाले इस कस्बे में कई परिवारों ने घर को चलाने वाले मुखिया को ही खो दिया है. इस हादसे में मरने वालों की संख्या 85 हो गई जबकि 39 लोग घायल हुए हैं.

इलाके के एसडीएम-एसडीओपी ने बताया है कि पेटलावद में तैनात पुलिसकर्मियों का तबादला किया जाएगा. साथ ही मृतकों के परिवारवालों को पाँच लाख रुपए और परिजन को नौकरी दी जाएगी. इसके अलावा निजी अस्पताल में इलाज का खर्चा भी सरकार उठाएगी.

बीबीसी ने ऐसे कई परिवारों से बात की जिन्होंने अपने इकलौते कमाई करने वाले को खो दिया और अब अनिश्चितता भरे भविष्य से सहमे हुए हैं.

'वो पोहा लेकर वापस न आए'

40 साल के मनोज बरेला पेटलावाद में अंडे का ठेला लगाते थे. वो आठ लोगों के परिवार में एक मात्र सदस्य थे जिनकी कमाई से परिवार चलता था. उनके साथ उनके भाई, भाभी और माता, पिता रहते थे.

बड़ा भाई दिमाग़ी तौर पर ठीक नही हैं, इसकी वजह से घर की पूरी जिम्मेदारी मनोज ही निभाते थे.

झाबुआ धमाकों की तस्वीरें

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रोज़ की तरह शनिवार को भी मनोज अपनी तीन साल की बेटी के साथ पोहा लेने उस दुकान पर गए थे जिसके बाजू वाली दुकान में ये विस्फोट हुआ. लेकिन हर रोज़ की तरह मनोज पोहा लेकर वापस नहीं आए.

मनोज की भाभी कैलासी बाई ने बीबीसी को बताया, “वो हर रोज़ ही बच्चों को पोहा दिलाने ले जाते थे. उस दिन भी वो गए. उसके बाद हमने विस्फोट की आवाज़ सुनी. हम सब वहां भागे भागे गए देखा तो वो घायल पड़े थे और बच्ची भी घायल थी. सरकारी अस्पताल में ले गए लेकिन वहां कोई इंतज़ाम नहीं होने की वजह से फिर दूसरी जगह ले गए. इसी बीच मनोज ने दम तोड़ दिया.”

'समय पर दुकान जाता तो मर जाता'

बच्ची को कैलासी बाई गुजरात के दाहोद लेकर गईं. बच्ची की हालत अभी ठीक है लेकिन परिवार ने घर चलाने वाले सदस्य को खो दिया है. परिवार कैसे चलेगा इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं है.

वहीं दूसरी तरफ मनोज के ही मित्र जीवन ठाकुर की नींद देर से खुली.

इस देरी ने शायद उन्हें नई जिंदगी दे दी. जीवन ठाकुर ने बीबीसी को बताया, “हर रोज़ सुबह के वक़्त हम चार मित्र मिल कर पोहा, समोसा खाते थे. मैं देर से सोया, इस वजह से उठा भी देर से और वक्त़ पर दुकान नही पहुंच पाया. विस्फोट की आवाज़ सुनते ही मैं वहां पहुंचा और देखा कि हर तरफ अफरा तफरी मची है.”

जीवन ने मनोज के साथ ही अपने दो और दोस्तों को खो दिया. अगर वो वक़्त पर पहुंच जाते तो वो भी शायद निशाना बन जाते.

प्रशासन से नाराज़गी

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सरकारी आकड़ों के मुताबिक विस्फोट में 85 लोग मारे गए हैं लेकिन स्थानीय लोग अलग आँकड़े बता रहे हैं. गंभीर रुप से घायल लोग अब भी झाबुआ, दाहोद और रतलाम के अस्पतालों में हैं.

लेकिन लोगों का गुस्सा प्रशासन के ख़िलाफ बरकरार है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ज़रुर उनके जख़्मों पर मरहम लगाने की कोशिश की.

लेकिन उन्हें भी लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा. मुख्यमंत्री लोगों के बीच सड़क पर बैठ गए और आश्वासन दिया कि सभी पीड़ितों से मिल कर ही जाएँगें.

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