काश मोदी ने 2002 के लिए मांगी होती माफ़ी!

  • 14 सितंबर 2015
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में चंडीगढ़ गए थे. उनके इस दौरे की वजह से स्कूल बंद किए गए, परीक्षाओं की तारीख़ बदली गई और एक शमशान की जगह पार्किंग में तब्दील कर दी गई.

इन वजहों से लोगों को काफ़ी असुविधा हुई जिसके लिए मोदी ने माफ़ी मांगी और जांच के आदेश दिए.

मेरे दौरे से हुई असुविधा के लिए खेद है: मोदी

कोई भारतीय नेता माफ़ी मांगे तो हैरानी होती है और वह प्रधानमंत्री हो तो हैरानी और भी बढ़ जाती है. भारत में ऐसे मौक़े बहुत कम आए हैं जब किसी नेता ने माफ़ी मांगी हो.

कोई नेता माफ़ी मांगे, भारत के लोगों के लिए नई बात है.

माफ़ी मांगने की कला भारतीय नेता नहीं जानते हैं. उन्हें लगता है कि माफ़ी मांगना उनके लिए भारी पड़ेगा और इसे हमेशा अपराधबोध की तरह लिया जाएगा.

गुजरात दंगे और मोदी

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लोग हमेशा यह कहते रहे हैं कि नरेंद्र मोदी को वर्ष 2002 की घटना के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए जो गुजरात में उनके शासनकाल में हुआ था. आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि तब गुजरात में 1,200 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

भारत जैसे देश में कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि दुर्घटना के लिए सीधे-सीधे ज़िम्मेदार नहीं होने के बावजूद रेलमंत्री इस्तीफ़ा दे देते हैं.

ऐसे देश में किसी नेता से उसके शासनकाल के दौरान हुए दंगों में लोगों की मौत के लिए माफ़ी की मांग करना क्या कुछ ज़्यादा है?

वैसे दंगा रोकना रेल दुर्घटना रोकने से अधिक आसान है. लेकिन यदि दंगाइयों को पता हो कि पुलिस उनके साथ है तो हत्या, लूटपाट और आगज़नी उनके लिए आसान हो जाती है.

ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें गुजरात दंगों के दौरान पुलिस की भूमिका पर कई सवाल खड़े होते हैं.

यहां तक कि ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी रिपोर्ट का शीर्षक दिया था, ''वी हैव नो ऑर्डर्स टू सेव यू'' यानी 'आपको बचाने के लिए हमारे पास कोई आदेश नहीं है.'

बात नैतिक ज़िम्मेदारी की

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नरेंद्र मोदी इन आरोपों से हमेशा इनकार करते रहे हैं. वह कहते रहे हैं कि ख़ासतौर पर दिल्ली की मीडिया ने तय कर लिया था कि उन्हें दोषी ठहराना है.

लेकिन नरेंद्र मोदी गुजरात दंगों के दोषी नहीं भी थे तब भी वह इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी तो ले ही सकते थे.

ऐसा करके मोदी शांति का संकेत दे सकते थे. लेकिन तब उन्होंने ऐसा नहीं किया और चुनाव प्रचार सांप्रदायिक रंग में रंगा गया.

जो लोग मोदी की राजनीतिक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) वाली विचारधारा से सहमत नहीं हैं, उन्होंने भी कहा कि असुविधा के लिए चंडीगढ़ के लोगों से माफ़ी मांगकर मोदी ने अच्छा किया.

इस तरह की माफ़ी मन को छूती है क्योंकि इससे पता चलता है कि एक नेता ठीकरा फोड़ने के लिए हमेशा किसी दूसरे का सिर तलाश नहीं करता. वह आम आदमी के प्रति सहानुभूति भी दिखाना चाहता है.

वर्ष 2015 के नरेंद्र मोदी वर्ष 2002 के नरेंद्र मोदी से अलग हैं. लेकिन इस तरह के नेता हमारे राजनीतिक तंत्र की उपज हैं.

यही वजह है कि नरेंद्र मोदी को नहीं लगता कि उन्हें ललित मोदी मामले में माफ़ी मांगने की ज़रूरत है, भले ही ललित मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बीच कोई सीधा संबंध नहीं रहा हो.

1984 के दंगे और मनमोहन की माफ़ी

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वह क्षण दिल को सुकून देने वाला था जब मनमोहन सिंह ने वर्ष 1984 के सिख-विरोधी दंगों के लिए माफ़ी मांगी थी.

संसद में 12 अगस्त 2005 को माफ़ी मांगते हुए मनमोहन सिंह ने कहा था, ''मुझे सिख समुदाय से माफ़ी मांगने में कोई संकोच नहीं है. मैं सिर्फ़ सिख समुदाय से नहीं बल्कि पूरे भारत से माफ़ी मांगता हूं क्योंकि 1984 में जो हुआ था, वो हमारे संविधान का उल्लंघन था.''

अमरीका के एक राजनयिक ने मनमोहन सिंह की इस माफ़ी पर कहा था, ''प्रधानमंत्री का राजनीतिक साहस भरा यह एकमात्र काम वर्ष 1984 में सिखों के विरुद्ध भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की नफ़रत और अवसरवाद के विपरीत है."

उनके मुताबिक़, "प्रधानमंत्री का राजनेता वाला यह काम उनकी पहले से मज़बूत छवि को राष्ट्र की गांधीवादी विचारधारा के प्रतिनिधि के तौर पर और ऊंचा उठाएगा.''

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जर्जर और विभाजित समाज के लिए इस तरह की माफ़ी बड़े मायने रखती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का माफ़ी मांगना, उनके 'सबका साथ, सबका विकास' के सपने को साकार करने का ज़रिया है.

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