जहां बक़रीद पर गाय-बैल की क़ुर्बानी नहीं होती

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पाकिस्तान में ब्राह्मणों की आबादी उतनी ही है जितनी सऊदी अरब में यहूदियों की.

पाकिस्तान के हिंदू समुदाय में ख़ुशहाल नज़र आने वाले बनिया-व्यापारी, डॉक्टर, वकील, टीचर और कर्मचारी बहुसंख्यक मुसलमानों में अल्पसंख्यक राजनीति का चेहरा भी हैं.

लेकिन उनके अधिकतर मतदाता 'शेड्यूल्ड कास्ट' हैं जैसे मेघवाड़, भील, कोली आदिवासी और चोलिस्तान के रेगिस्तानी, जिनका रहन-सहन और खान-पान राजस्थानी ख़ानाबदोशों जैसा है.

छुआछूत

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कभी सिंध और पंजाब के इलाक़ों में विभाजन से पहले छुआछूत का निज़ाम रहा होगा, मगर अब न के बराबर है.

चंद साल पहले तक रियासत गुजरात से मिलने वाले दो ज़िलों थरपाकर और उमरकोट में बनियों और 'शेड्यूल्ड कास्ट' के बर्तन अलग-अलग थे, पर ऐसा अब कहीं-कहीं ही देखने को मिलता है.

थरपाकर ज़िले के हेडक्वार्टर मिठीशहर में हिंदू आबादी ज़्यादा है. शहर से बाहर गांव में मुसलमान किसान और चरवाहे हैं. यही हाल उमरकोट का भी है.

मज़ार-दरबार और मेले-ठेले

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मगर पीरों-फ़कीरों की मज़ार-दरबार और मेले-ठेले हिंदू-मुस्लिम झंझट से मुक्त हैं.

इसलिए सिंध में सच्चल सरमस्त शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई और शाह इनायत के हिंदू और मुसलमान मुरीद एक ही क़ब्रिस्तान में दफ़न होना पसंद करते हैं.

उडेरोलाल में पीठ से पीठ जोड़े मंदिर और मस्जिद में कौन कब आकर सो गया, चला गया, रह गया, न कोई पूछता है न कोई बताता है.

पिछले 15-20 साल में थरपारकर-उमरकोट और चोलिस्तान के इलाक़ों में इस्लामिक राजनीतिक गुटों की तादाद और असर में इज़ाफ़े से असहिष्णुता की छिटपुट घटनाएं घटी हैं.

मगर सदियों की ज़मीन में पैबस्त बर्दाश्त के बरगद को उखाड़ने के लिए अब भी बहुत समय चाहिए.

सब्ज़ी या गोश्त

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पाकिस्तान में आप सब्ज़ी खाते हैं या गोश्त, इस बारे में कोई क़ानूनी बाधा या पूछताछ या धर-पकड़ नहीं है, सिवाय इसके कि आप रोज़े के समय खुलेआम न खाएं-पिएं.

हालांकि पाकिस्तान में गाय और बैल काटने पर कोई रोक नहीं है, फिर भी उमरकोट और थरपारकर के मुसलमान बक़रीद के मौके पर गाय या बैल की क़ुर्बानी नहीं करते. वे शादी-ग़मी के मौक़े पर अपने हिंदू दोस्तों को उन बर्तनों में भी नहीं खिलाते हैं, जिनमें बीफ़ खाया गया हो.

हिंदू अपने त्योहारों और शादियों में दो तरह के खाने बनाकर अलग-अलग मेज़ों पर रखते हैं- शाकाहारी और मांसाहारी...आपकी मर्ज़ी है खाएं या न खाएं.

इसी तरह होली के मौक़े पर थरपारकर और उमरकोट में मुसलमान भी जुलूस में शामिल होते हैं. लेकिन उन पर कोई ख़ुद रंग नहीं फेंकता, जो चाहे ख़ुद ही अपने ऊपर रंग डाल ले या डलवा ले.

यह सब बताने का मतलब लेक्चर देना नहीं है कि इस तरह भी साथ-साथ रहा जा सकता है.

हमें क्या, अगर किसी को धर्म की तलवार बनाना अच्छा लगता है या किसी को आसमान किताबों से सिर्फ़ फूल झड़ते नज़र आते हैं तो जैसी सोच, वैसी आंख, वैसा मंज़र. हमने समाज-सुधारी का ठेका थोड़ी ले रखा है!.

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