गांव की पंचायतें महिलाओं के ख़िलाफ़ क्यों?

अब जब बागपत की घटना अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ी बन गई है तो इसी बहाने भारत के गांवों की उन पंचायतों की ज़रा चर्चा कर ली जाए जिन्होंने अपनी महिलाओं को बार-बार नीचा दिखाया हैं.

बोकारो के नज़दीक एक छोटे से गांव में पिछले जुलाई में एक नशेड़ी आदमी एक घर में घुसकर एक महिला के साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश करने लगा.

उस महिला के पति ने उस आदमी को जमकर पीटा और उसे अपने घर से बाहर फेंक दिया.

उसने फ़ैसला लिया कि वो इस मामले को अगली सुबह पंचायत में ले जाएगा.

पंचायत ने तुरंत ही अपना फ़ैसला सुनाते हुए ये फ़रमान सुनाया कि महिला का पति अपने खोए सम्मान का बदला लेने के लिए उत्पीड़क की 12 साल की बहन का बलात्कार करेगा.

पुरुषवादी सोच

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लड़की की मां पंचायत के सामने बार-बार गिड़गिड़ाती रही लेकिन कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा.

लड़की की मां ने बताया, "हम रहम की भीख मांगते रहे, उनके हाथ जोड़े लेकिन उन लोगों ने एक नहीं सुनी. वे उसे जंगल में खींच कर ले गए."

एक घंटे के बाद उसकी लड़की उसे झाड़ियों के बीच ख़ून से लथपथ मिली.

पंचायत के मुखिया और भाई समेत सभी अभियुक्तों को गिरफ़्तार किया गया और उनपर मामला दर्ज किया गया.

लेकिन घटना के एक साल बाद भी भावनात्मक रूप से लड़की के घाव भरे नहीं है और परिवार अदालती लड़ाई में फंसा हुआ है.

इस बीच चारों तरफ़ से उन पर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने और समझौता करने के लिए बड़े बुजुर्गों की ओर से दबाव भी है.

खाप पंचायतों पर महिलाओं के ख़िलाफ़ फ़ैसले सुनाने का आरोप लगता रहा है लेकिन पूरे देश में ऐसी पंचायतें हैं जो महिलाओं के ख़िलाफ़ फ़ैसलें सुनाती रही हैं.

पुरुषवादी सोच के शिकार इन स्थानीय सत्ता केंद्रों के पास समुदाय के बारे में फ़ैसला लेने का हक़ होना एक बेहद ख़तरनाक बात है.

मानसिकता

पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक किसान शमशेर सिंह का कहना है, "पंचायत आमतौर पर लोगों का समान रूप से और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व करता है. हर गांव में पंचायत का स्वरूप अलग-अलग है और उनके फ़ैसले अक्सर सामूहिकता के मानसिकता को दर्शाते हैं. "

बागपत की घटना बताती है कि औरतों के प्रति जो मानसिकता लोगों में है उसे देखने के लिए किसी ग्रामीण इलाक़े में जाने की ज़रूरत नहीं है.

जाति का सवाल जो कि ग्रामीण भारत का एक अहम मुद्दा है, ज़्यादातर मामलों में फ़ैसले का आधार होता है, और आम तौर पर इसकी क़ीमत औरतों को चुकानी पड़ती है.

वे सम्मान के मामले को पुराने वक़्त की तरह सीधे औरतों से जोड़कर देखते हैं.

ये पंचायतें औरतों के आधुनीकरण के ख़िलाफ़ आदेश देते हैं. वे औरतों को मोबाइल फ़ोन ना रखने, जींस ना पहनने जैसे फ़रमान सुनाते हैं और मसालेदार खाने (चाउमीन) को बलात्कार के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

बहिष्कार

इन पंचायतों को असली ताक़त बहिष्कार करने की ताक़त से मिलती है. ये पंचायत का फ़ैसला नहीं मानने वालों को गांव से बहिकृत करने का हक़ रखते हैं.

समुदाय से बहिष्कृत करने के लिए ये हुक़्क़ा-पानी बंद कर देने जैसे फ़ैसले का भी इस्तेमाल करते हैं.

29 साल की रामा देवी उस रात को याद करती है जब उनकी भाभी की मौत हुई थी और बताती है, "वो पूरी रात चिल्लाती रही थी.

हम उसकी मदद करना चाहते थे लेकिन किसी ने नहीं किया उसकी मदद.

हम सभी डर गए थे कि हमारे साथ भी ऐसा ही ना हो. उन्हें अपने चचेरे भाई के साथ संबंध रखने की वजह से बहिष्कृत किया गया था. उस रात उनका पति खेत में सो रहा था. जब वो सुबह घर लौटा तो वो मर चुकी थी."

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