मुल्ला का हर बयान फ़तवा नहीं

भारतीय मुस्लिम

भारत में 25 सालों से पत्रकारिता कर रहा हूँ लेकिन जब भी मुस्लिम सम्बंधित कोई मुद्दा उठता है तो मुझे पत्रकार बिरादरी की जहालत पर तरस आता है.

बरसों पहले मैंने फ़तवा के सिलसिले में जो बात कही थी आज भी दुहराना पड़ रहा है क्योंकि ये एक ऐसा शब्द है जिसे मीडिया के अधिकतर लोग समझ नहीं सके हैं या समझने का प्रयास नहीं करते.

ऑस्कर से सम्मानित एआर रहमान ने पैग़ंबर मोहम्मद पर बनी एक ईरानी फ़िल्म में संगीत दिया है जिसके कारण मुंबई की रज़ा एकेडमी ने आपत्ति जताई है और फ़िल्म पर पाबंदी लगाने की मांग की है.

रज़ा एकेडमी के सईद नूरी ने पिछले शुक्रवार को एक इंटरव्यू में कहा था कि इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक, संगीतकार रहमान और इस फ़िल्म में काम करने वाले दूसरे लोगों से ग़लती हुई है और उन्हें माफ़ी मांगनी चाहिए.

उन्होंने कहा था कि फ़िल्म से जुड़े मुसलमानों को दोबारा कलमा (इस्लाम धर्म स्वीकार करने की पहली शर्त) पढ़कर इस्लाम में दाख़िल होना चाहिए.

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रज़ा एकेडमी की इस आलोचना को अंग्रेज़ी प्रेस और सोशल मीडिया पर फ़तवा कहा जा रहा है. ये फ़तवा नहीं है.

ये एक आलोचना है और भारतीय सरकार से फ़िल्म पर पाबन्दी की एक मांग. इसकी कोई इस्लामी हैसियत नहीं है.

फ़तवा एक बड़ा अमल होता है जिसे एक संस्था सोच विचार करके जारी करती है. हर मामले में फ़तवा नहीं जारी किया जाता.

ईरान, सऊदी अरब और मिस्र जैसे मुस्लिम देशों में फ़तवा देने वाले आलिमों और संस्थाओं को सरकारी मान्यता होती है.

ईरान के इस्लामी इंक़लाब के बाद लेखक सलमान रुश्दी के ख़िलाफ़ जारी किया गया फ़तवा राजनीति से प्रेरित ज़रूर था, लेकिन उसे फ़तवा कहना सही था.

पैग़ंबर मोहम्म्द पर बनी फ़िल्म 'मोहम्मद: मैसेंजर ऑफ़ गॉ़ड' का निर्देशन ईरान के माजिद मजीदी ने किया है.

फतवा

ईरान में इसपर कोई फ़तवा नहीं जारी किया गया है. भारत में भी कुछ ऐसी संस्थाएं और आलिम हैं जो फ़तवा जारी कर सकते हैं, लेकिन इस्लामी देशों के विपरीत ये भारत के मुसलमानों पर बाध्यकारी नहीं है.

जो चाहे वो माने जो न चाहे वो न माने. दारुल उलूम देवबन्द और इमारत शरिया (बिहार और ओडिशा) दो ऐसी संस्थाएं हैं जो फ़तवा जारी कर सकती हैं.

मुंबई की रज़ा अकादमी भी फ़तवा दे सकती है. हालांकि रहमान के ख़िलाफ़ जो बयान आया है वो आलोचना है फ़तवा नहीं.

मगर भारतीय मीडिया पर इसे फ़तवा कहे जा रहा है. मुझे याद है इस तरह के कई मुद्दों पर आए बयानों को मीडिया ने फ़तवा की तरह पेश किया है जो लोगों को गुमराह करने के अलावा और कुछ नहीं कर रहे.

आलोचना से डर

अगर मैं रहमान होता तो रज़ा एकेडमी की आलोचना पर ध्यान देता ही नहीं.

हाँ ये बात समझ में आती है कि अगर आप मुंबई में रहते हों तो इस एकेडमी को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते.

ये मुंबई और इसके आस-पास काफ़ी तेज़ी से अपना असर बढ़ाने में कामयाब रही है.

कुछ साल पहले इस एकेडमी ने प्रदर्शनों का आयोजन भी किया था जो बाद में हिंसात्मक हो गईं थीं.

मैंने मुंबई में बाल ठाकरे और राज ठाकरे के सामने बॉलीवुड की हस्तियों को घुटने टेकते देखा है.

हो सकता है कि रहमान को भी इस एकेडमी की आलोचना से भय हो.

फ़तवे पर फ़तवा

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इसीलिए उन्होंने बहुत इज़्ज़त के साथ रज़ा एकेडमी की आलोचना का जवाब दिया है.

रहमान को उम्मीद होगी कि रज़ा एकेडमी को उनका जवाब पसंद आया होगा.

मगर एकेडमी ने अपनी मांग वापस नहीं ली है.

फ़िलहाल मुझे फ़िल्म के भारत में रिलीज़ होने का बेसब्री से इंतज़ार है.

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