22 दिनों का युद्ध और 20 आवाज़ें

1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध को भारतीय इतिहास में मात्र हाशिए की जगह मिलती है. लोगों की यादों में भी उस युद्ध की वो जगह नहीं है जो शायद 1962 के भारत चीन युद्ध या 1971 के बांगलादेश युद्ध की है. कारण शायद ये है कि इस लड़ाई से न तो हार की शर्मसारी जुड़ी है और न ही निर्णायक जीत का उन्माद.

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के 52 साल पूरे होने पर बीबीसी हिंदी ने अपनी ख़ास सीरीज़ में इस युद्ध के तमाम पहलूओं को संजोने की कोशिश की. इस युद्ध के बारे में हमने भारत और पाकिस्तान से जुड़े 20 लोगों के अनुभव यहां सुनिए.

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  • 1965 युद्ध की 20 झलकियां

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  • सौम्य छवि लेकिन तेवर आक्रामक

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    1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भारत को कुशल नेतृत्व दिया. उन्होंने इसी दौरान जय जवान जय किसान का नारा दिया था. युद्ध के तुरंत बाद रामलीला मैदान में भाषण देते हुए उन्होंने पाकिस्तनी मंसूबों पर कटाक्ष किया था.

  • अयूब ने ये नहीं सोचा था

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    1965 के युद्ध में पाकिस्तान का नेतृत्व राष्ट्रपति अयूब ख़ान कर रहे थे. वे ये मान कर चल रहे थे कि कश्मीर पर उनके हमले के जवाब में भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा पार नहीं करेगा. लेकिन जब ऐसा हुआ तो वे अचरज से भर गए. उन्होंने पाकिस्तानी जनता को इस तरह संबोधित किया था.

  • भुट्टो ने दी थी हमले की सलाह

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    माना जाता है कि 1965 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान को भारत पर हमला करने की सलाह तत्कालीन विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने दी थी. इसके बाद उन्होंने सुरक्षा परिषद में पाकिस्तानी पक्ष की पुरज़ोर वकालत भी की थी. सुरक्षा परिषद में बोलते हुए जुल्फ़िकार अली भुट्टो.

  • टैंकों को तबाह करने वाला कर्नल

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    1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान चिविंडा की लडा़ई में लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर ने असीम साहस का परिचय देते हुए पाकिस्तान के कई टैंकों को तबाह किया था. इस दौरान वे शहीद भी हो गए. उनकी इस वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया था. उनके साथी जनरल अजय सिंह (उस समय कैप्टन) से उनकी अंतिम इच्छा के बारे में सुनिए.

  • पाकिस्तानी विमानों पर भारी पड़े कीलर बंधु

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    वायुसेना के इतिहास में शायद ये पहला मौका था जब दो भाईयों को एक साथ वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. दोनों ने 1965 की लड़ाई में पाकिस्तान का एक-एक सेबर जेट गिराया था और दोनों को वीर चक्र दिया गया था. इस युद्ध में हिस्सा लेने वाले एयर मार्शल डेंज़िल कीलर ने बताए अपने अनुभव.

  • टैंक और हथियार भरी ट्रेन पर निशाना

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    1965 के युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के फ्लाइट लेफ्टिनेंट (बाद में एयर मार्शल बने) भूप बिश्नोई ने पाकिस्तानी सीमा के अंदर जाकर टैंक और हथियार ला रही ट्रेन को निशाना बनाया. बिश्नोई ने इसी तरह का साहस 1971 के युद्ध के दौरान भी दिखाया था. उन्होंने 1965 के युद्ध में बेहद महत्वपूर्ण हमले के बारे में बताया.

  • बाटानगर तक पहुंचे भारतीय सेना

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    1965 के युद्ध में डोगराई की लड़ाई भी निर्णायक लड़ाईयों में गिनी जाती है. इसमें भारतीय सेना के जवान पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश करते हुए बाटानगर तक पहुंच गए थे. बाद में उन्हें वहां से पीछे हटना पड़ा था. लेकिन युद्ध विराम से पहले भारतीय सैनिकों ने कड़े संघर्ष के बाद डोगराई पर दोबारा कब्ज़ा किया था. जनरल वीएन शर्मा उस समय सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी के विशेष सहायक थे. उन्होंने इस हमले के बारे में बताया.

  • सेनाध्यक्ष को ना कहने वाला जनरल

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    1965 के युद्ध में भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी चाहते थे कि भारतीय सेना व्यास नदी के पीछे आकर मोर्चा संभाले, लेकिन जनरल हरबख़्श सिंह ने उनके इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया था. हरबख़्श सिंह की बेटी हरमाला गुप्ता बता रही हैं कि पाकिस्तानी सेना में हरबख़्श के समकक्ष ना सिर्फ उनके साथ पढ़े थे बल्कि साथ में ट्रेनिंग भी ली थी.

  • भूखे पेट भारतीय सैनिकों की लड़ाई

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    हाजीपीर की लड़ाई को भी 1965 के युद्ध में सबसे अहम लड़ाईयों में गिना जाता है. इस लड़ाई में जीत का सेहरा मेजर आरएस दयाल के सिर बंधा था. उनके साथ लड़ रहे थे कर्नल जिमी राव. राव बता रहे हैं कि किन मुश्किलों में बिना भोजन के भारतीय सैनिकों को ये लड़ाई लड़नी पड़ी थी. राव के मुताबिक भारतीय सैनिक ने चार दिन भूखे प्यासे रहने के बावजूद अदम्य साहस दिखाया था.

  • भारतीय सैनिक का वो अदम्य साहस

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    सैन्य इतिहासकार रचना बिष्ट 1965 के युद्ध पर एक किताब लिख चुकी हैं. इस किताब को लिखने के सिलसिले में उन्होंने 1965 के युद्ध में शामिल कई सैनिकों से बात की. इस युद्ध से जुड़ी एक मार्मिक घटना का जिक्र वो कर रही हैं. यह वाकया डोगराई की लड़ाई के दौरान हुआ था.

  • युद्ध के दौरान रणनीति की भूमिका भी अहम

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    वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने इस युद्ध को नजदीक से देखा था. उन्होंने इस युद्ध में भारतीय सेना की रणनीति की बात करते हुए बताया कि तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी चाहते थे कि भारतीय सेना को पीछे हटाया जाए लेकिन जनरल हरबख़्श सिंह ने इससे इनकार कर दिया था.

  • प्रशिक्षु पायलट ने पाकिस्तानी विमान गिराया

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    1965 के युद्ध में वीर चक्र पाने वाले सबसे युवा वायुसैनिक विनोद नेब बता रहे हैं कि किस तरह से उन्होंने पाकिस्तान के सेबर जेट को हलवारा हवाई ठिकाने के पास गिराया था. इन्हीं नेब ने 1971 के बांग्लादेश युद्ध में एक और सेबर जेट गिराया था, जिसके चलते उन्हें दोबारा वीर चक्र से सम्मानित किया गया.

  • पठानकोट की लड़ाई में दिखाया कमाल का कौशल

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    स्कावर्डन लीडर सज्जाद हैदर के नेतृत्व में पाकिस्तान की वायुसेना ने 1965 के युद्ध में भारत के पठानकोट हवाई ठिकाने पर हमला कर वहां खड़े 10 भारतीय विमानों को नष्ट कर दिया था. सज्जाद हैदर को पाकिस्तान सरकार ने सितारा-ए-जुर्रत से सम्मानित किया था. सज्जाद बता रहे हैं किस तरह उन्होंने भारतीय विमान को निशाना बनाया.

  • कैसे फ़तह हुआ बर्की?

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    1965 के युद्ध में जिन पांच बड़ी लड़ाईयों में एक बर्की में हुई थी. इस लड़ाई को पिल बॉक्स की लड़ाई भी कहा जाता है. इसमें भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ़ से बहुत सारे सैनिक मारे गए थे. इस युद्ध में भारत की ओर से भाग लेने वाले ब्रिगेडियर कंवलजीत सिंह ने युद्ध का वो मंजर याद किया.

  • जहांगीर की बेटी को माफ़ी भरा ईमेल

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    1965 के युद्ध के दौरान गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के विमान पाकिस्तानी वायुसेना ने उड़ा दिया था. इस हादसे के 46 साल बाद पाकिस्तानी पायलट कैस हुसेन ने भारतीय विमान उड़ा रहे पायलट जहांगीर इंजीनियर की बेटी फरीदा सिंह से माफ़ी मांगी. फरीदा सिंह याद कर रही हैं कैस हुसेन के भेजे ईमेल को.

  • कितनी मुश्किल थी ये लड़ाई?

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    1965 के युद्ध में हाजीपीर की लड़ाई चढ़ाई और ऊंचाईयों की लड़ाई थी. पाकिस्तानी सेना चोटी पर पहले से मौजूद थी और भारतीय सेना के जवानों के सामने चुनौती गोलियों की बौछार का सामना कर चढ़ाई पर पहुंचने की थी. ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह बता रहे हैं कि वो लड़ाई कितनी मुश्किल थी और भारतीय सैनिकों ने किस साहस का परिचय दिया था.

  • अब्दुल हमीद ने दिखाया था अदम्य साहस

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    असल उत्तर की लड़ाई में शामिल हुए कर्नल रसूल ख़ान युद्ध में शहीद अब्दुल हमीद के साथ लड़े थे. अब्दुल हमीद को भारत सरकार ने सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया था. उस लड़ाई के बारे में बता रहे हैं रसूल ख़ान.

  • पठानकोट की लडा़ई में वायुसेना का दमखम

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    1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पठानकोट में तैनात भारतीय वायुसैनिकों ने अदम्य साहस दिखाया था. कीलर बंधुओं के साथ एयर मार्शल विनय कपिला यहीं तैनात थे. उन्होंने पाकिस्तानी वायुसेना के सेबर जेट को गिराने के किस्से को कुछ यूं याद किया.

  • लाहौर से क्यों लौटी भारतीय सेना?

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    1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार कर लिया था. पहले भारतीय सेना का इरादा लाहौर तक पहुंचने का था लेकिन बाद में पाकिस्तान के आम लोगों का ख़्याल करते हुए फ़ैसला लिया गया कि लाहौर शहर के अंदर नहीं जाया जाए. इसके बारे में बता रहे हैं तत्कालीन रक्षा मंत्री यशवंत राव चव्हाण के सचिव आरडी प्रधान.

  • भाारत नहीं जीता, लेकिन फ़ायदा हुआ?

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    1965 के युद्ध में ना तो पाकिस्तान हारा और ना ही भारत जीता. ऐसे में इस युद्ध से किसको क्या मिला? सैन्य इतिहासकार श्रीनाथ राघवन के मुताबिक इस युद्ध से भारत को फ़ायदा हुआ. वे मानते हैं कि युद्ध ने कश्मीर मसले पर भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मज़बूत करने का मौका दिया.