बात बात पर क्यों भड़क जा रहे हैं मुलायम?

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Image caption अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव.

समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने जिस कुनबे को आगे बढ़ाया था वही उनकी मुसीबत बन गया है.

नतीजा यह हुआ कि मुलायम अब कुनबे के एक ग़ुस्सैल बुज़ुर्ग में बदल गए हैं जिसके ज़्यादातर राजनीतिक दांव उल्टे पड़ रहे हैं.

उनकी सारी उर्जा भ्रष्टाचार में फंसे कुनबे के अनाड़ी नेताओं को बचाने और यूपी में अपने बेटे की ही सरकार को कोसने में ज़ाया हो रही है.

उनकी सबसे बड़ी समस्या पार्टी महासचिव रामगोपाल यादव के सांसद बेटे अक्षय यादव बनते जा रहे हैं जिनके नोएडा प्राधिकरण में हुए घोटालों के किंगपिन कहे जाने वाले चीफ़ इंजीनियर यादव सिंह से कारोबारी संबंधों का ख़ुलासा हुआ है.

सीबीआई यादव सिंह के मामलों की जांच कर रही है.

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मुलायम के जनता परिवार गठबंधन से बाहर आने के बाद से यूपी के राजनीतिक गलियारों में एक जुमला चल निकला है, 'जिसके हाथ में सीबीआई उसके हाथ में सपाई.'

जनता परिवार की पार्टियां राजद और जदयू खुलेआम कह रही हैं कि पुराने मुक़दमों और सीबीआई को मिले नए सबूतों के आधार पर केंद्र में सत्ताधारी भाजपा ने मुलायम को ब्लैकमेल किया जिसके कारण उन्हें गठबंधन छोड़ना पड़ा ताकि बिहार चुनाव में भाजपा की संभावनाएं बेहतर हो सकें.

शायद यही कारण है कि सपा सरकार यादव सिंह मामले की सीबीआई जांच कराने से कतराती रही है.

मुलायम ने इससे पहले कांग्रेस सरकार में भी सीबीआई के डर से निर्णायक मौक़ों पर सरकार का समर्थन करने के अलावा डमी उम्मीदवार देकर सोनिया और राहुल गांधी को पिछला चुनाव जिताया था.

जनता परिवार के साथ गठबंधन में भी पहली बाधा कुनबा ही बना था.

परिवार आया आड़े

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पहले राजद, जद (यू) और सपा का विलय करके साइकिल चुनाव चिह्न पर बिहार चुनाव लड़ने का फ़ैसला हुआ था लेकिन मुलायम के भाई रामगोपाल यादव और परिवार के अन्य नेता अड़ गए.

क्योंकि बड़े नेताओं के आगे उनकी हैसियत ख़त्म हो जाती और यूपी में होने वाले अगले चुनाव में उन्हें सीटें देनी पड़तीं.

मुलायम राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के विरोध में धर्मनिरपेक्ष ताक़तों की गोलबंदी कर बड़ी पहल करना चाहते थे लेकिन उन्हें क़दम वापस लेने पड़े.

कुनबे की खींचतान का नतीजा यह हुआ है मुलायम किसी ग़ुस्सैल बुज़ुर्ग की तरह झल्लाने और पार्टी की बैठकों में माइक पटकने लगे हैं.

हाल ही में उन्होंने तीन मौक़ों पर अखिलेश सरकार के मंत्रियों और अफ़सरों को नाकारा और सिर्फ़ अपना मतलब साधने वाला कह दिया.

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पार्टी की एक बैठक में उन्होंने कहा, "लोकसभा चुनाव में हुई हार की आज तक समीक्षा नहीं हुई, मुख्यमंत्री चापलूसों से घिरे हुए हैं, अगर आज यूपी में चुनाव हों तो पार्टी बुरी तरह हारेगी."

नेताओं ने इस हताशा के जवाब में तर्क देने चाहा तो उन्होंने माइक पटक दिया और डांटा.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की चिंता है कि इससे उनकी सरकार की छवि पर बुरा असर पड़ रहा है लेकिन वे कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं.

मोदी और मुलायम

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इसी बीच प्रधानमंत्री मोदी ने संसद चलाने में मुलायम के सकारात्मक रवैये की तारीफ़ करके बसपा और कांग्रेस जैसे विरोधियों को भाजपा से मिलीभगत और सीबीआई के डर से ब्लैकमेल होने का मुद्दा और थमा दिया है, जिसका कोई जवाब सपा से देते नहीं बन रहा है.

अखिलेश सरकार में मंत्री और पार्टी प्रवक्ता, राजेंद्र चौधरी ने कुनबे की खींचतान के कारण मुलायम के झल्लाने को नकारते हुए कहा कि, "वो हमारे मुखिया हैं, जो भी कर रहे हैं हमारे भले के लिए कर रहे हैं."

संसद में किसी एक परिवार से सबसे अधिक सदस्य मुलायम के ही कुनबे से हैं.

उन्होंने अपने कुनबावाद को समाजवाद की ओट में कांग्रेस के परिवारवाद का विरोध करते हुए परवान चढ़ाया था जिसके नतीजे अब सामने आ रहे हैं.

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