'मैंने खुद को पांच साल तक अँधेरे में रखा'

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प्यार की निशानी कहलाए जाने वाले ताज महल के शहर आगरा में खुला है एक अनोखा कैफ़े.

ये है शीरोज़ हैंगआउट कैफ़े. ताज महल से थोड़ी दूरी पर स्थित इस कैफ़े में काम करने वाले ख़ास चेहरे वो हैं जो खुद पर हुए एसिड अटैक से लड़कर एक नई ज़िन्दगी का आग़ाज़ कर चुके हैं.

क्या है शिरोज़?

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शिरोज़ का संधिविछेद करेंगे तो शिरोज़ का मतलब समझ आजाएगा. शी + हीरोज़ (she+heroes) यानी महिला हीरोज़.

ये नाम इस कैफ़े में काम करने वाली ज़िंदादिल लड़कियों को दिया गया है. ये सभी लड़कियां अपने अतीत को भूल इस कैफ़े से अपनी एक नई पहचान ढूंढ रही हैं.

ये आम होटल रेस्टोरेंट की तरह नहीं है.

इस कैफ़े में खान पान के अलावा यहां काम करने वाली लड़कियों के हुनर का भी प्रदर्शन किया गया है.

खाने पीने के दो मनचाहे पैसे!

एक होटल या कैफ़े में आप खाने पीने के अलावा क्या उम्मीद कर सकते हैं? शिरोज़ में खान पान के अलावा बहुत कुछ है.

कैफ़े के तीन हिस्से हैं जिनमे बूटीक, लाइब्रेरी और हैंडीक्राफ्ट का सामान मिलता है.

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यहाँ रखा सामान एसिड अटैक से पीड़ित लड़कियों ने बनाया है.

इस कैफ़े की ख़ास बात ये है कि यहाँ खाने की चीज़ों का कोई मूल्य नहीं है.

ये कैफ़े 'पे ऐज़ यू विश' मॉडल पर आधारित है यानी पैसा उतना दो जितना मन चाहे.

तो कैसे कमाता है ये कैफ़े ?

शिरोज़ को चलाने के पीछे दो गैर सरकारी संस्थाय हैं - 'छाँव फाउंडेशन' और 'स्टॉप एसिड अटैक'.

संस्था से जुडी कार्यकर्ता मेघा दीपांकर कहती हैं कि "मक़सद पैसा कामना नहीं है, बल्कि इन सर्वाइवर के बारे में लोगों को बताना है."

"यहाँ लोग जैसा खाते हैं वैसा पैसा देते हैं बल्कि कई बार बहुत अधिक भी देते हैं और कई बार कम भी. कमाया हुआ पैसा इन लड़कियों के टेलेंट को परखने में और उसे प्लेटफार्म देने में लगाया जाता है."

कैफ़े में लगातार विदेशी सैलानियों का आना जाना लगा रहता है.

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ये पर्यटक ताज महल को देखने आते हैं साथ ही शिरोज़ की बेहतरीन इंटरनेट मार्केटिंग की वजह से यहाँ खिंचे चले आते हैं.

पर्यटक यहाँ खाने से साथ साथ खरीदारी भी करते हैं और चंदा भी.

मेघा बताती हैं, "शिरोज़ क्राउड फंडिंग पर भी चलता है, जहाँ हमें लोगों से चंदा मिलता है जिसे हम शिरोज़ के संचालन में साथ ही इन लड़कियों की ट्रेनिंग में लगते हैं."

यही चेहरा मेरी पहचान

22 साल की रूपा फरीदाबाद की रहने वाली हैं जो अब अपने परिवार से अलग आगरा में शिरोज़ के साथ जुड़ गई हैं.

15 साल की उम्र में रूपा पर एसिड अटैक हुआ. ये अटैक रूपा की सौतेली माँ ने तब किया जब वो सो रही थीं.

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रूपा का चेहरा उस रात के बाद से उनका ना रहा - तेज़ाब ने उसे बुरी तरह जला दिया.

उस रात के बाद से रूपा अगले पांच सालों तक अपने घर की चार दीवारी में ही रहीं.

रूपा बताती हैं, "मेरा आना जाना बंद हो गया, में जब भी अस्पताल अपने इलाज के लिए जाती तो चेहरे को ढक कर जाती, मैंने खुद को पांच साल तक अँधेरे मेरे रखा."

"मैं खूब रोती थी, मायूस थी. पर फिर 'स्टॉप एसिड अटैक' नामक संस्था के साथ जुड़कर मैंने जीवन को नए नज़रिए से देखा. इसीलिए मैं शिरोज़ का हिस्सा बन गई."

रूपा शिरोज़ में अपना बुटीक चालती हैं.

रूपा का ये बुटीक इंडियन और वेस्टर्न दोनों ही फैशन के कपड़े बेचता है. विदेशी पर्यटकों में रूपा के कपड़े खूब पॉपुलर हैं.

भविष्य की ओर

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रूपा कहती हैं, "मैंने बचपन से सिलाई बुनाई का काम किया है, तेज़ाब गिरने के बाद में जीवन से सभी उम्मीदें छोड़ चुकी थी. पर शिरोज़ के साथ जुड़के मैंने ट्रेंनिंग ली और अब एक फैशन डिज़ाइनर बनना चाहती हूँ. अब यही चेहरा मेरी पहचान बनेगा."

रूपा का सपना है की वो अजय देवगन और सोनाली बेंद्रे को अपने डिज़ाइन किए कपड़ों से सजाएँ.

शिरोज़ में ऐसी कई साहसी लड़कियां हैं जो अब अपने कल को भूल भविष्य की सोचती हैं.

उनके चेहरे पर निशान हैं पर कोई शिकन नहीं.

वो बताती हैं कि आने वाले समय में शिरोज़ का अगला कैफ़े कानपुर, लुधियाना और फिर दिल्ली में खोला जाएगा.

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