फ़िल्म रिव्यू: कंगना-इमरान की कट्टी-बट्टी

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फ़िल्म का नाम- कट्टी-बट्टी

निर्देशक- निख़िल अडवाणी

अभिनय- कंगना रनौत, इमरान ख़ान

रेटिंग- 1/2*

लगता है कि फ़िल्म बनाने वालों ने फ़िल्म ख़त्म होने से काफ़ी पहले इसका अंत सोच लिया था. लेकिन ये कोई बुरी बात नहीं.

आपने देखा होगा कि कई फ़िल्में शुरू तो ठीक-ठाक होती हैं लेकिन फिर भटकने लगती हैं - जैसे-जैसे फ़िल्म का अंत नज़दीक आने लगता है वह इधर-उधर भागती नज़र आती है.

फ़िल्मों के शौकीन इसे 'फ़िल्म के दूसरे भाग की बीमारी' कहते हैं.

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इसका एक न एक उदाहरण हर सप्ताह देखने को मिल ही जाता है, जैसे कि 2013 में आई 'गोरी तेरे प्यार में'.

मैं इसलिए यह नहीं कह रहा हूं कि इसमें भी इमरान ख़ान ही थे. उसकी तरह तो नहीं, पर फ़िल्म कट्टी-बट्टी में एक अंत तो है. लेकिन लगता है कि निर्देशक को पता ही नहीं कि उस अंत तक कैसे पहुंचना है.

फ़िल्म के प्रोड्यूसर के लिए शायद इसे बनाना कहीं आसान होता (अभिनेताओं के लिए भी यह आसान होता) अगर इसे चेतन भगत की किताब पर 2014 में बनी फ़िल्म '2 स्टेट्स' के आधार पर बनाया जाता.

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'2 स्टेट्स' को आश्चर्यजनक तौर पर सफलता मिली थी और यह फ़िल्म 100 करोड़ रुपये तक कमा पाई थी.

'2 स्टेट्स' आईआईएम अहमदाबाद कॉलेज में स्नाकोत्तर कर रहे दो युवाओं की कहानी है और साथ रहने के छोटी-छोटी समस्याओं, और उसके बाद कॉलेज से निकलने के बाद शादी के बंधन में बंधने तक जीवन में आने वाली समस्याओं से जूझने की कहानी है.

नहीं आती हंसी

'कट्टी-बट्टी' को कहानी शायद अहमदाबाद में नेशनल इंस्टीय्यूट ऑफ़ डिज़ाइन के इर्द गिर्द बनाई गई है.

फ़िल्म के हीरो-हीरोइन के बीच में झगड़ा है, प्यार है और रूठना-मनाना भी होता है.

सबसे लंबा सीन वह है जब हीरो एक रात ख़ूब सारी बीयर पी लेता है

कभी-कभी फ़िल्मों में हीरो को ऐसा दिखाया जाता है कि ज़मींदार भी शर्मा जाए.

हीरो के दोस्त केवल हीरो को नींद से जगाने के लिए अपनी ज़िंदगी में ख़तरे में डालते हैं, दीवारें लांघ जाते हैं, सिर्फ इस वजह से कि हीरो के माता-पिता उससे मिलने आ रहे हैं.

वो हीरो के माता-पिता की कार डाइवर्ट करते हैं, उनकी कार के सामने वे लोग ड्रामा करते हैं- वो भी लाइट्स और प्रौप्स के साथ.

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बेटे को एक मरे आदमी का तरह उठा कर उधर से निकाल लिया जाता है, कुछ 'जाने भी दो यारों' (1983) फ़िल्म के 'महाभारत' के सीन की ही तरह.

फ़िल्म में वैसे तो यह सीन आपको हंसाने के लिए डाला गया है. लेकिन आपके दिमाग़ में दो बातें आती हैं- ये लोग क्या ये नहीं जानते कि ये कैम्पस में रहते हैं, और दूसरा ये कि बीयर का शरीर पर आख़िर क्या असर होता है.

ताज़गी का एहसास नहीं

एक उकता देने वाला लंबा सीन और उसके बाद कोई ऐसा सीन नहीें, झूठा और अजीब हिप्पी-गिरी दिखाने के लिए डाला गया लगता है.

उस वक्त जब हीरो हीरोइन के सामने '50 शेड्स ऑफ़ ग्रे' पढ़ता है तो फ़िल्म प्रसंशकों को इसमें कई दूसरी रोमांटिक कॉमेडी फ़िल्मों की झलक दिखेगी.

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मैंने पहले ही '500 डेज़ ऑफ़ समर' की तरह के सीन के बारे में सुना है. आगे और भी पता चलेगा.

इंटरनेट की जनता दूसरी फ़िल्मों से सीखे या लिए गए की इन छोटी-बड़ी समानताओं को बताने में कहीं बेहतर काम करती है.

पर मोटे तौर पर थीम साफ़ दिखाई देती है.

इस तरह की फ़िल्मों में मणि रत्नम ने भी हाथ आज़माया है. उन्होंने 'अलाईपायुथे' बनाई थी जिसे बाद में हिंदी में 'साथिया' नाम से बनाया गया था. इस तरह की फ़िल्म बनाने की कोशिश में उन्होंने इस साल की शुरूआत में 'ओ कधल कनमणि' बनाई. मौक़ा मिले तो यह फ़िल्म देखें.

कट्टी-बट्टी में 2003 में आई 'कल हो न हो' जैसी ताज़गी लाने की कोशिश की गई है लेकिन एक अलग और अति आधुनिक और 'देशी' अंदाज़ में.

संयोग से 'कल हो न हो' निखिल अडवाणी की पहली फ़िल्म थी.

हीरो थी बेहतर

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पिछले सप्ताह निखिल आडवाणी की 'हीरो' आई थी जो सुभाष घई की फ़िल्म 'हीरो' से प्रेरित थी.

मैं बताना चाहता हूं कि क्यों वह कुछ हद तक एक बढ़िया फ़िल्म थी. पहली वजह यह कि इसका नाम 'हीरो' ही था, ठीक 1983 की फ़िल्म की ही तरह. इधर-उधर कुछ बातें जोड़ी ज़रूर गई थीं लेकिन अधिकतर हिस्सा 1983 की फ़िल्म की ही तरह था.

फ़िल्म हमें मज़ेदार लगी या नहीं ज़रूरी नहीं, इससे हमें बहुत उम्मीद नहीं थी. हमें वही कुछ मिला जिसकी हमें उम्मीद थी.

एक हारे हुए हीरो और रोमियो पर बनी रोमांटिक कॉ़मेडी कट्टी-बट्टी अपना उद्देश्य बता ही देती है जब फ़िल्म में एक चरित्र पूछता है कि 'फ़िल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे कितनी बार बनाई गई है?'

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'कभी नहीं.' (यह सच नहीं है. बी-ग्रेड फ़िल्मों की बात न भी करें तो अभी पिछले साल दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे को दोबारा 'हम्टी शर्मा की दुल्हनिया' के रुप में बनाया गया था.)

कंगना भी बेअसर

अब अगर कोई बोलेगा 'देवदास को कितनी बार बनाया गया है?' तो आपके सामने मुद्दा साफ़ है.

हालांकि मेरे जैसों के लिए यह फ़िल्म बढ़िया नहीं, लोकिन कुछ लोग इसे लेकर उत्साहित होने की वजहें साफ़ हैं.

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इसमें कंगना रनौत हैं- जिन्होंने 'क्वीन' और 'तनु वेड्स मनु पार्ट-2' के बाद अपना अलग ही मुक़ाम बना लिया है.

यह फ़िल्म एक बार फिर यही साबित करती है कि एक एक्टर उतना ही बढ़िया होता है जितने बढ़िया रोल में वह अभिनय करता है.

आपकी जानकारी के लिए, कंगना मुश्किल से स्क्रीन पर नज़र आती है. और जब वह नज़र आती है तो वह कुछ बढ़िया प्रदर्शन नहीं करती.

फ़िल्म इमरान ख़ान के इर्द-गिर्द ही घूमती है- जो बिना शक़ फ़िल्म में अपना बढ़िया काम दिखाते हैं.

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लेकिन आप कितनी देर ज़रूरत से ज़्यादा प्यार करने वाले एक चरित्र को बर्दाश्त कर सकते हैं - जो बार-बार 'पायल.... पाा..यल.... पाााा...यल' करता पागलों की तरह घूमता नज़र आए. कुछ देर में ही मुझे लगा मैं पागल हो जाऊंगा.

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