तस्वीरों में देखिए कठपुतलियों के रंग

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हाल ही में दिल्ली के मेघदूत रंगशाला परिसर में संगीत नाटक अकादमी द्वारा 'पुतुल यात्रा' नाम से सातवां अखिल भारतीय पुतुल (कठपुतली) महोत्सव आयोजित किया गया.

यह महोत्सव बच्चों के साथ साथ बड़ों और बुजुर्गों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा.

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विभिन्न प्रदेशों से आए कलाकारों ने पारम्परिक और समकालीन कठपुतली के खेल दिखाए.

गुमनाम होती जा रही इस कला को दर्शकों के बीच लाकर संगीत नाटक अकादमी ने इसे नया जीवन देने की ओर क़दम बढ़ाया है.

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'कठ' का मतलब होता है लकड़ी और 'पुतली' का अर्थ होता है गुड़िया.

लकड़ी से बनी गुड़िया को कठपुतली कहते हैं जिसमें रंगबिरंगे कपड़े और तार का प्रयोग होता है.

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इस गुड़िया को कठपुतली कलाकार धागे या तार की मदद से हिलाकर अभिनय कराता है.

एक ज़माने में ये कलाकार गांव-गांव घूमकर कठपुतली के नाच के जरिए कहानी सुनाते थे.

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धीरे-धीरे यह कला लुप्त होती गई, पर अब भी कुछ प्रदेशों में पुतुल कला जीवित है और शहरों में पपेट शो के जरिए लोगों का मनोरंजन कर रही है.

माना जाता है भारत में कठपुतली का इतिहास लगभग 2000 वर्ष पुराना है.

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ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी की 'अष्टध्यायी' में 'नटसूत्र' में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है.

भारत में चार तरह की पारम्परिक पुतुल प्रचलित हैं- धागा, दस्ताना, छड़ और छाया.

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धागा पुतुल का प्रयोग आंध्रप्रदेश, असम, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में प्रचलित हैं.

छड़ पुतलों का प्रयोग झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में किया जाता है. दस्ताना पुतुल केरल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में उपलब्ध हैं.

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छाया पुतुल परम्पराएँ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा और तमिलनाडु में प्रचलित हैं.

माना जाता है, उत्तर प्रदेश में सबसे पहले पुतुल कला का कठपुतलियों के माध्यम से प्रदर्शन शुरू हुआ था.

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यहाँ से धीरे धीरे इस कला का प्रसार दक्षिण भारत के साथ ही देश के अन्य भागों में भी हुआ.

उड़ीसा का 'गोपा लीला', असम का 'पुतला नाच', महाराष्ट्र का 'मलसूत्री बहुली' और कर्नाटक की 'गोम्बयेत्ता' धागे से नचाई जाने वाली कठपुतलियों का रूप हैं.

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तमिलनाडु की 'बोम्मलट्टम (स्ट्रिंग पपेट्री या धागा पुतुल)' रोचक पुतुल कला है, जिसमें बड़ी बड़ी कठपुतलियाँ धागों और डंडों की सहायता से नचाई जाती है.

केरल की 'तोलपावाकुथु' और आंध्र प्रदेश की 'थोलु बोमलता (छाया पुतुल)' में मुख्य रूप से पौराणिक कथाएं ही दिखाई जाती हैं.

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वक़्त के साथ कठपुतली कला में काफ़ी बदलाव हुए. पिछले पचास से अधिक वर्षों में भारत में नए प्रकार के पुतुल खेल और पुतुल रंगमंच के नए कलाकार सामने आए हैं.

पहले के समय की तरह यह कलाकार पारम्परिक ग्रामीण समुदायों के नहीं हैं, हालांकि उन्हें कला और संस्कृति की जानकारी है.

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स्वतंत्रता के बाद भारत का कई देशों के साथ कला के क्षेत्र आदान प्रदान हुआ.

और एशियाई देशों की कला प्रथाओं का शहरी भारतीय पुतुल रंगमंच पर काफी प्रभाव पड़ा.

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