अपने अनुभवों को शब्द देती भारतीय महिलाएं

महिलाएं

जब किसी ने यह तय किया कि औरतों को शब्दों से दूर रखा जाए, जब ये रिवाज हुआ कि औरत बाहर न निकले, घर और घर वालों में उलझी रहे सारी उम्र, तब उस पर क्या-क्या बीती?

इसका जवाब मिलना मुश्किल होता अगर औरतों ने अपने सत्य से अपना साहित्य न रचा होता. दो हज़ार साल पहले भी स्त्रियों ने बंधन तोड़े. अपने अनुभवों को शब्दों में बाँधा.

स्त्रियों की आवाज़ लोक-गीत में शुरू से सुनाई देती थी. खेत में गूँजती उसकी मेहनत, उसके बदन की थकान. लोरियों में ममता, शादी के खट्टे-मीठे गीतों में उसके सपने और शरारतें झलकती हैं.

लोकगीत को 'साहित्य' का दर्जा मिला नहीं. इतिहास लिखने वाले ज़्यादातर पुरुष थे, इसलिए स्त्रियों के संघर्ष का बयान कम ही हुआ. स्त्रियों के पास सोचने की फ़ुर्सत, छंद-कविता रचने की आज़ादी बहुत कम थी. जिन स्त्रियों ने आज़ादी हासिल की, अक्सर घर-गृहस्थी से अलग होकर ही.

बुद्ध के समय में भिक्कुनी स्त्रियों की रचनाएँ हैं जिनमें घरेलू जीवन का दुख भी शामिल है, मोह-माया त्याग देने के बाद की शांति भी. पाली में लिखी ये कविताएँ 'थेरिगाथा' नाम के संग्रह में मिलती हैं.

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प्राचीन तमिल भाषा में 'संगम' कविता रचनाकारों में स्त्रियाँ भी थीं. उनके शब्दों में भक्ति के अतिरिक्त बहुत कुछ मिलता है, युद्ध से लेकर रूमानियत तक.

लेकिन स्त्रियों के साहित्य में अध्यात्म का रस गहरा था, ख़ासकर मध्यकालीन समय में.

कश्मीर की 14वीं सदी की कवियत्री लल्लेश्वरी यानी लल देढ़, राजस्थान की मीराबाई से लेकर तमिलनाडु की आम्माइयर तक, पूरे देश में महिलाएँ अपनी-अपनी भाषाओं में साहित्य रच रही थीं.

इनके स्त्री होने का अनुभव इनकी भक्ति में मिला हुआ था शायद इसीलिए इतिहास ने उन्हें बचाए रखा.

जबकि कवि के ज़िम्मे केवल कविता रचना ही था.

हर राजा, हर बादशाह, हर नवाब ने अपने आस-पास कवियों की जमात बना रखी थी, जिन्होंने बर्तन मांजते-मांजते, पानी भरते-भरते साहित्य रचना नहीं की.

बच्चों को नहलाने, दूध पिलाने, सुलाने, सास-ससुर के पाँव दबाने की उन्हें कभी ज़रूरत नहीं पड़ी.

उनके नाटकों को मंच पर उतारा गया. सबसे बड़ी बात, उनके शब्दों को काग़ज़ पर उतारा गया, संभालकर रखा गया पर औरतों के लिखे का नाम-ओ-निशान कहाँ मिलता है? लिखने और छपवाने के लिए निजी संपत्ति या सहारा चाहिए.

पाबंदी और औरतें

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लिख सकती थी मुग़ल राजकुमारी ज़ैबुन्निसा, लेकिन अपनी क़िस्मत का फ़ैसला ख़ुद नहीं कर सकी.

लिख सकती थी गुलबदन बेगम, जो बाबर के घराने की राजकुमारी थी, और लिखा भी 'हुमायूँनामा'. अपनी कहानी या किसी दूसरी रानी की कहानी न लिखी.

आम औरत साहित्य से उतनी ही दूर थी जितनी सत्ता से. 18वीं सदी आते-आते उसकी हालत अच्छी नहीं थी. ऊँची जाति, राजा या नवाब परिवार हुआ तो पर्दे में रही.

सती प्रथा थी. ज़मीन-जागीर में हिस्सा न था. छोटी-छोटी बच्चियों की शादी होती और वे नाबालिक़ विधवा भी हो जातीं.

दोबारा शादी की अनुमति नहीं थी. पढ़ने पर बंदिश थी जबकि 19वीं सदी में पढ़ने की संभावना और साधन बढ़ते जा रहे थे.

शिकायत होना लाज़मी था पर समाज ने औरत से शिकायत दर्ज करने का माध्यम छीन लिया था.

बंगाल में रससुंदरी देवी की आत्मकथा पढ़ें तो मालूम होता है कि आम औरत का जीवन कितना बँधा हुआ था, पढ़ने-लिखने पर कितनी सख़्त पाबंदी.

लेकिन 19वीं सदी में काफ़ी कुछ बदल रहा था. देश में समाज, रिवाज और धर्म के नाम पर जो ज़ुल्म हो रहे थे, इससे पुरुष और स्त्री दोनों का सीना छलनी था. अँग्रेज़ हुकूमत के सहारे कुछ सुधारकों ने क़ानून बदलने की कोशिश की.

लड़कियों के स्कूल शुरू हुए. फिर अख़बार-पत्रिकाएँ भी छपने लगीं. काग़ज़ अब सिर्फ़ अमीरों का खिलौना नहीं था.

आज़ादी की लड़ाई और महिलाएं

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शब्दों का इस्तेमाल अपने हक़ में करना अब संभव था. ये समय कविता-छन्द का नहीं था. समय था साफ़ बात करने का. सच कहना था निडर होकर. और कहने वालियों की अब कमी नहीं थी.

पंडिता रमाबाई सरस्वती, ताराबाई शिंदे, रमाबाई राणाडे, सावित्रीबाई फुले, कॉर्नीलिया सोराबजी, सरोजिनी नायडू और रुक़ैया सख़ावत हुसैन.

रुक़ैया हुसैन जो भी लिखतीं उसमें समाज का वर्णन और उस पर टिप्पणी ज़रूर होती.

उन्होंने तो कल्पना की आड़ में पूरी व्यवस्था उल्टी कर डाली कि जहाँ मर्द पर्दे में हैं और औरत दुनिया चलाती है सुख और शांति से.

20वीं सदी में चारों तरफ़ आज़ादी की लड़ाई का जोश था. सियासी बैठकें, हड़ताल, रैली, बवाल. लड़के-लड़की, पुरुष-स्त्री एक-दूसरे को पढ़ रहे थे, साथ लड़ रहे थे.

स्त्रियों की आवाज़ और हिस्सेदारी बढ़ रही थी. अरुणा आसफ़ अली जैसे कार्यकर्ता भी थे, डॉक्टर रशीद जहां, महादेवी वर्मा जैसी लेखिकाएँ भी, जिनके शब्दों में समाज बदलने की कोशिश साफ़ उभरती है.

कुछ ही साल बाद, एक साहित्यिक पन्ना और पलटा गया. अब जो लिखा जा रहा था–ख़ास तौर से कहानी और उपन्यास में–उसमें झिझक कम थी और कलात्मक भाव ज़्यादा.

निडर लेखन

Image caption इस्मत चुग़ताई.

इस्मत चुग़ताई और विभावरी शिरूरकर, क़ुर्रतुल-ऐन हैदर और ललितांबिका अंतर्जनम, आशापूर्णा देवी और ज्योतिर्मयी देवी जैसी लेखिकाएँ उभरीं.

हिंदुस्तानी औरत के हाल को देखकर इन्होंने सिर्फ़ माथा ही नहीं पीटा, इस पीढ़ी की लेखिकाओं ने उसकी सीरत, उसके अभाव, डर, शोख़ी और गुस्ताख़ी को काग़ज़ पर उतारा.

जैसे-जैसे देश में साक्षरता बढ़ती गई, किताबों और पत्रिकाओं का प्रकाशन बढ़ा. इसके साथ ही लेखन की शैली और कहानी का ढाँचा बदलता रहा.

शिवानी जैसे उपन्यासकारों की लिखाई में कहानी का बदलता रूप साफ़ नज़र आता है. कृष्णा सोबती नाटक को उपन्यास की तरह लिख डालती हैं. महाश्वेता देवी का लेखन बिजली की तरह गिरता है.

नबनीता सेन ने अकेले सफ़र करके हमको अपने बारे में और इस देश में अकेली औरत के बारे में बात करने एक नया ढंग दिखाया.

अलका सरावगी ने कलकत्ता पर धुली-सी नज़र डाली. पद्मा सचदेव ने कश्मीर के दर्द पर आँसू गिराए तो सारा जोसेफ़ ने केरल में जल प्रदूषण पर. जो अख़बार नहीं लिख पाते, जिस पर संसद में चर्चा नहीं होती, उन सच्चाइयों को भी लिख रही हैं स्त्रियाँ.

अब 21वी सदी आ पहुँची है, लेखिकाओं की गिनती हज़ारों में है. देश की हर भाषा में सैकड़ों किताबें छपती हैं. अख़बारों में भी महिला पत्रकारों के पहले से ज़्यादा नाम दिखते हैं.

पिछले 25 सालों में 'लिटेरेरी नॉन-फ़िक्शन' ने हमारे साहित्य को ज़ोरदार मोड़ दिया है.

नई शैली, नया ढाँचा

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Image caption फ़िल्म गर्म हवा की स्क्रीप्ट राइटर शमा ज़ैदी.

अँग्रेज़ी में ज़्यादा दिखता है लेकिन जिन स्त्रियों ने इस शैली में लिखा, कठिन विषय को नया कलात्मक ढाँचा दिया है. पिंकी वीरानी ने अरुणा शानबाग के बलात्कार पर 'अरुणाज़ स्टोरी' और बाल उत्पीड़न पर 'बिटर चॉकलेट' लिखी.

माला सेन ने फूलन देवी पर 'बैंडिट क्वीन' और स्त्रियों को जलाकर मारने के मुद्दे पर 'डेथ बाइ फ़ायर' लिखी.

सोनिया फ़ल्येरो ने मुंबई की बार डांसरों पर 'ब्यूटिफुल थिंग' लिखी, और हाल ही में रोहिणी मोहन ने श्रीलंका के गृह-युद्ध पर 'द सीज़न्स ऑफ़ ट्रबल' लिखी है.

ये नई आवाज़ें जो उठ रही हैं, लेखिकाओं की आप-बीती नहीं हैं. ये सिर्फ़ स्त्रियों की आवाज़ें भी नहीं हैं. ये स्त्री की क़लम से निकलती इस समय की सियाही है, जिसमें ख़ून भी मिला है, मिट्टी भी और प्यार भी.

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