बिहार में बीजेपी की नैया जाति के सहारे

  • 21 सितंबर 2015
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भाजपा ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार तय करने में जातीय गणित और केमेस्ट्री, दोनों का सहारा लिया है.

पार्टी द्वारा अब तक घोषित 152 उम्मीदवारों के नामों से यह स्पष्ट है कि गणित और केमेस्ट्री को मिलाकर जीत का समीकरण बनाने की पूरी कोशिश भाजपा के रणनीतिकारों ने की है.

यदि जाति का गणित देखें तो इन 152 में से सबसे ज़्यादा 65 सीटें पिछड़ी व अति पिछड़ी जातियों को दी गई हैं. इसमें से भी 22 यादव हैं. 64 उम्मीदवार सवर्ण हैं और 21 दलित व महादलित.

जीतने की उम्मीद में भाजपा ने अपने क़रीब 22-24 फ़ीसदी निवर्तमान विधायकों को टिकट नहीं दिया है.

समीकरण

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इस्लामपुर विधानसभा क्षेत्र इसका सबसे ज़ोरदार उदाहरण है. इस क्षेत्र में जबसे ज़्यादा वोट कुर्मी जाति के हैं और फिर यादवों के.

मुसलमान वोट भी ठीक संख्या में है. 2010 में यहां से जेडी-यू के राजीव रंजन राजद के वीरेंद्र गोप को हराकर जीते थे. 2013 आते-आते वे नीतीश से दूर हो गए और भाजपा के नज़दीक.

जब मांझी अलग हुए तो वे मांझी के साथ चले गए. लेकिन राजीव आश्वस्त थे कि मांझी का जो भी हो, उनका टिकट भाजपा से पक्का है.

लिहाज़ा मांझी जब भाजपा के साथ ज़ोर-आज़माइश कर रहे थे, तभी राजीव ने उनका साथ छोड़कर भाजपा का दामन इस आश्वासन के साथ थाम लिया कि इस्लामपुर से उनको ही पार्टी का टिकट मिलेगा.

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राजीव रंजन की गणित साफ़ थी. कुर्मी होने के नाते कुर्मी वोट उनको भी मिलेंगे. यदि जेडी-यू का उम्मीदवार इस सीट से आया तो कुर्मियों के वोट बंट जाएंगे और यादव तो नीतीश को वोट देंगे नहीं.

राजीव का मानना था कि यदि यह सीट राजद को गई और राजद ने यादव उतार दिया तो मुक़ाबला बहुत कड़ा हो जाएगा.

भाजपा के रणनीतिकारों ने भी यह केमेस्ट्री समझी और उसके अनुरूप जो रासायनिक समीकरण बना, उसमें राजीव की जगह कुछ घंटे पहले राजद से भाजपा में शामिल हुए वीरेंद्र गोप को टिकट दे दिया.

घोषणा

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इसी तरह राघोपुर के जेडी-यू विधायक सतीश यादव को भाजपा ने उसी सीट से उतारा है. सतीश ने 2010 में राबड़ी देवी को हराया था.

भाजपा की दिक़्क़त यह है कि उसके सहयोगी क़रीब 84 सीट पर लड़ रहे हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने अपनी पार्टी 'हम' के सभी उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं.

यही नहीं उन्होंने दो सीटों पर ख़ुद लड़ने की घोषणा कर अपनी सीटें बढ़ाकर 21 कर ली हैं. लेकिन इन 21 में से 25 फ़ीसदी पर ही उनकी पार्टी की संभावना मानी जा रही है.

राम विलास पासवान ने जिन 11 सीटों पर नामों की घोषणा की है, उनमें से 3 तो उनके कुनबे से हैं और क़रीब 6 उनके पार्टी नेताओं के कुनबे से.

उपेंद्र कुशवाहा ने अभी नामों की घोषणा नहीं की है. भाजपा के ही सूत्र मानते हैं कि ये लोग 30 फ़ीसदी से ज़्यादा सीटें न जीत पाएंगे.

जाति की राजनीति

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ऐसे में भाजपा अपना विनिंग प्रतिशत बढ़ाए बिना सरकार बनाने की स्थिति में न आ पाएगी. भाजपा को इसका अहसास है और इसीलिए उसने इसकी तैयारी शुरू कर दी है.

मज़ेदार बात यह है कि बिहार में सभी प्रमुख राजनीतिक दल जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर विकास की बात करते हैं लेकिन अंदर ख़ाने सभी इन्हीं के मज़बूत समीकरण को जीत का पक्का फ़ार्मूला मानकर चल रहे हैं.

2010 के विधानसभा चुनाव के बाद यह हल्ला हुआ था कि बिहार का मतदाता जाति की राजनीति से ऊब चुका है और वह अब विकास चाहता है.

इस चुनाव के बाद जेडी-यू व भाजपा की ओर से यह दावे भी किए जाने लगे थे कि आम बिहारी बाक़ी राज्यों की तरह विकास चाहता है और इसलिए अब जाति की राजनीति नहीं चलेगी.

दावे में दम भी लगता था. उस चुनाव में जेडीयू-भाजपा गठबंधन ने कुल 243 सीटों में से 209 सीटें जीती थीं.

क्षेत्र आधारित

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मुस्लिम और यादव वोट के सहारे चुनाव लड़ने वाली राजद को मात्र 22 सीटें मिली थीं.

2014 के आम चुनाव में कुछ इसी तरह का कारनामा एनडीए ने कर दिखाया और 40 में से 31 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की.

लेकिन इसके बाद विधानसभा की 10 सीटों के लिए हुए उपचुनाव में जातीय समीकरण उभर कर सामने आए और इस इक्वेशन के सामने एनडीए को मात्र चार सीटें ही मिल सकीं.

इस विधानसभा चुनाव में इसी गणित के आधार पर समीकरण बनाए जा रहे हैं और भाजपा के रणनीतिकार यहां कोई कसर किसी क़ीमत पर नहीं छोड़ना चाहते.

ख़ास बात यह है कि ये समीकरण क्षेत्र आधारित हैं.

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