रामलीला मैदान में तैयारी के साथ उतरे कांग्रेसी?

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रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान पर कांग्रेस के लिए एक तरह की राजनीतिक जीत का मौक़ा था.

लोकसभा चुनाव की करारी हार और प्रदेशों के चुनावों में कमतर प्रदर्शन के बाद शायद यह पहला मौका था जब कांग्रेस के बड़े नेताओं से लेकर कार्यकर्ता तक जोश से लबरेज़ नज़र आए.

ज़मीन अधिग्रहण विधेयक पर केंद्र सरकार के पीछे हटने को कांग्रेस अपनी बड़ी उपलब्धि मान रही है. शायद इसलिए उसने दिल्ली में ज़ोरशोर से किसान सम्मान रैली का आयोजन किया.

रैली को देखकर एक बार तो ऐसा लगा कि वाक़ई इंसान अपनी असफलताओं से सीख हासिल करता है. कांग्रेस के मामले में भी ऐसा ही नज़र आया क्योंकि अमूमन कहा जाता रहा है कि कांग्रेस में कोई कार्यकर्ता नहीं बल्कि सब नेता ही हैं.

व्यवस्थित रैली

मगर किसान सम्मान रैली से इतना समझ में ज़रूर आया कि कांग्रेस अब व्यवस्थित होने की पूरी कोशिश में लगी हुई है.

रामलीला मैदान पर दो अलग मंच बने. एक पर सारे नेता और दूसरे पर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा बस सिर्फ़ कुछ चुनिंदा नेता.

इस बार कांग्रेस नेताओं के भाषणों में भी कुछ ख़ास बात थी. मसलन प्रदेश के पार्टी अध्यक्ष निर्धारित किए गए समय के मुताबिक़ ही बोल रहे थे.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषणों से ऐसा लगा कि मानो इन नेताओं ने पहले से ही तय कर लिया था कि किसको क्या बोलना है और कितनी देर तक बोलना है.

मसलन राहुल ने जो कहा वो ना तो सोनिया गांधी ने दोहराया और ना ही मनमोहन सिंह ने.

हल और हाथ

किसी भी नेता ने लंबा भाषण नहीं दिया और बड़े ही संक्षिप्त रूप में अपनी बात रखी.

जहाँ राहुल ने 'माँ' का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सरकार किसानों की न सिर्फ़ ज़मीन छीन रही है बल्कि वो उनकी मां भी छीन रही है.

तो सोनिया ने कहा कि अब वक़्त की ज़रूरत है कि 'हल और हाथ की ताक़त' एक साथ आए.

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जबकि मनमोहन सिंह ने अपने भाषम को अपने शासनकाल की कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित रखा, उनके मुताबिक़ नई सरकार उनकी कल्याणकारी योजनाओं को बंद करना चाहती है.

बिना चुटकी के ही सही मगर सबने तय कर रखा था कि किसको क्या और कितना बोलना है.

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