'पहले ऐतिहासिक रिकॉर्ड ठीक होना चाहिए'

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जो काम भारत में अब शुरू हुआ है वो काम हमारे पाकिस्तान में बहुत पहले से चल रहा है.

इसलिए इतिहास बदलने के नेक काम में अगर टेक्निकल सहायता की ज़रूरत हो तो पाकिस्तान से फ़ौरन विशेषज्ञों की एक टीम दिल्ली भेजी जा सकती है.

ताकि मोदी सरकार के साथ अगर हिस्टौरीकल नहीं तो हिस्टेरिकल संबंधों की नींव ही पड़ सकें.

देखिए जब पाकिस्तान बना तो हम बच्चों को स्कूली किताबों में पढ़ाया जाने लगा कि पाकिस्तानी सभ्यता में मोहनजोदड़ो और हड़प्पा मध्य एशिया से आने वाले आर्य, तक्षशिला और गंधारा सभ्यता, अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य, मोहम्मद बिन क़ासिम, महमूद गज़नवी, तुर्क और मुग़ल वंश, गुरुनानक, दादागंज बख़्श और ख़्वाजा मोईनुद्दीन जैसे महान औलिया, सर सैयद अहमद ख़ान, इक़बाल और जिन्ना सभी शामिल हैं.

नया इतिहास

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लेकिन जब पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश हो गया तो नए पाकिस्तान में नया इतिहास लिखा गया.

सब हिंदू, बौद्ध ऐतिहासिक किरदार घर भेज दिए गए और नया कैलेंडर मोहम्मद बिन क़ासिम से शुरू हुआ.

वहां से सीधी छलांग लगाई गई मुसलमानों की अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ 1857 की जंग-ए-आज़ादी पर.

और फिर आ गए आपके अलीगढ़ तहरीक वाले सर सैयद अहमद ख़ान. फिर मुसलिम लीग बनी और मुसलिम लीग ने गांधी के राम राज्य और नेहरू-पटेल के साज़िशों का डटकर मुक़ाबला किया और फिर हिंदू बहुमत के शोषण से बचने के लिए लाखों मुसलमानों की क़ुर्बानियों से पाकिस्तान बना.

जिसे भारत ने एक साज़िश के ज़रिए दो हिस्सों में तक़सिम कर दिया और आज माशाल्लाह पाकिस्तान इस्लामी दुनिया का मज़बूत एटमिक क़िला है. अल्लाह-अल्लाह ख़ैर सल्लाह.

इसलिए मोदी सरकार को भी हमारा मशविरा है कि टुकड़ों-टुकड़ों में कभी बाबर को घुसपैठिया, कभी औरंगज़ेब को विदेशी, कभी टीपू सुल्तान को ज़ालिम राजा और कभी एपीजे अब्दुल कलाम को मुसलमान होने के बावजूद एक देशभक्त साबित करने के बजाए एक ही झटके में इतिहास दोबारा लिखकर इसपर डट जाएं.

असर

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और फिर स्कूली बच्चों को ये बताएं कि नए भारत की असल दास्तां 26 मई 2014 से शुरू होती है.

इससे पहले भारतवर्ष में जो हुआ, जिस-जिस ने किया, अच्छा किया, बुरा किया, क़ुर्बानियां दीं या ज़ुल्म किया सब अफ़साने हैं, कहानियां हैं.

हमारा क्या लेना-देना? हम बहू-बेटियां ये सब भला क्या जाने और क्यों जाने?

ज़ीरो से इतिहास का पन्ना लिखना कोई अद्भुत तजुर्बा नहीं.

कंबोडिया में 1975 में जब ख़मेररूज ने सत्ता संभाली तब क़ौमी कैलेंडर ईयर ज़ीरो से ही शुरू हुआ था.

इसके बाद कंबोडिया की क़ौम में जैसी ऐतिहासिक जागरूकता आई, इसका असर आज तक मौजूद है.

ऐतिहासिक रिकॉर्ड

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पाकिस्तान ने भी इतिहास के पन्ने बदल कर देखें, पिछले 43 साल में कितनी तरक़्क़ी कर ली.

ग़रीबी, बीमारी, बेरोज़गारी, लॉ एंड ऑर्डर, दक्षिण एशिया को शांति के रास्ते में लाने और क़ौमी एकता वग़ैरह जैसे फ़ालतू के काम निपटाने को तो बेशुमार सदियां पड़ी हैं.

इन सब पर हाथ डालने से पहले ऐतिहासिक रिकॉर्ड ठीक होना चाहिए.

मुझे तात्कालिकता का पूरा अहसास है इसलिए कहिए तो इस बीच मदद की ख़ातिर टेक्निकल टीम भिजवाने के लिए इस्लामाबाद को तुरंत फ़ोन घुमाऊं.

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