राहुल में अगर दम, तो सोनिया मजबूर क्यों?

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राहुल गांधी का 'सूट-बूट' जुमला अब कानों को चुभने सा लगा है, लेकिन रविवार को रामलीला मैदान की 'किसान सम्मान' रैली में वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नया जुमला लेकर आए.

ऐसा लगता है कि राहुल ने अमिताभ बच्चन की मशहूर फ़िल्म 'दीवार' के संवाद 'मेरे पास माँ है' से ये जुमला उठाया. उन्होंने किसानों की 'दो मां' की बात की. पहली वो जो किसान को जन्म देती है और दूसरी 'धरती मां'. राहुल ने कहा कि मोदी किसानों की 'दूसरी मां' को छीनने की कोशिश कर रहे हैं.

साफ़ है कि राहुल को लगता है कि किसानों का मुद्दा भावनात्मक है और मोदी को घेरने लायक़ है.

क्या राहुल का 'किसान मुद्दा' उन्हें उनकी खोई हुई राजनीतिक ज़मीन लौटा सकता है

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यहाँ यह भी देखा जाना चाहिए कि मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने अमेठी में राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट पर किसानों की ज़मीन छीनने का आरोप लगाया था, इस पर कांग्रेस उन्हें क़ानूनी नोटिस भेजने की तैयारी में है.

लड़ाई अब विधानसभाओं में

यह भी साफ़ होता जा रहा है कि कांग्रेस की रणनीति अब इस लड़ाई को राज्य विधानसभाओं तक ले जाने की है- संसद में गतिरोध के बाद- राज्य अब ख़ुद के ज़मीन अधिग्रहण क़ानून लाने की तैयारी में हैं, ऐसे में राहुल ने कहा है कि लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है.

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देश के कई हिस्सों में सूखा, किसानों में बढ़ता असंतोष, चीनी सेक्टर में गहराता संकट ऐसे विषय हैं, जिनसे अगले कुछ महीनों में मोदी सरकार को जूझना है.

मोदी पर हमले जारी रखना राहुल गांधी के लिए एक चुनौती है. हालाँकि उनके पास वो सैनिक नहीं हैं, जिनकी दरकार एक जनरल को होती है.

कांग्रेस पिछले कुछ वर्षों में ड्राइंग रूम संगठन तक सिमट कर रह गई है और इस क्रम में वो आम जनता से दूर होती गई है.

तो एक तरह से पार्टी अब पुनर्निर्माण के दौर से गुज़र रही है, मुश्किल ये है कि पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह और उनकी संख्या अपने सबसे निचले स्तर पर है.

जब एक राजनीतिक संगठन कमज़ोर होता है, तो इसके भीतर ही खींचतान मचने लगती है और आज कांग्रेस में यही सब होता दिख रहा है.

नई टीम पर दांव

राहुल गांधी नई टीम खड़ी करना चाहते हैं, लेकिन वह पुराने और अनुभवी नेताओं की पूरी तरह अनदेखी भी नहीं कर सकते, जैसा कि उन्होंने एक बार करने का प्रयास किया था.

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न ही इस मौक़े पर वो लोगों को सिर्फ़ उनकी जाति या मज़हब के नाम पर पद बांट सकते हैं. अशोक तंवर विभिन्न परिस्थितियों में बेहतर हो सकते हैं, लेकिन कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा की अनदेखी नहीं कर सकती और रविवार की रैली में ये दिखा भी. रैली में सबसे अधिक लोग हुड्डा ने ही जुटाए थे.

यही स्थिति पंजाब में अमरिंदर सिंह के साथ भी है. पंजाब में फिर से सत्ता तक पहुँचने के लिए कांग्रेस को एकजुटता का प्रदर्शन करना होगा.

राज्यों में पार्टी का प्रदर्शन सुधारने के लिए कांग्रेस को पार्टी के संघीय ढाँचे पर ध्यान देना होगा. यानी राज्यों के प्रमुखों का चयन सावधानीपूर्वक करना होगा और फिर उन्हें फ़ैसले लेने की स्वतंत्रता देनी होगी.

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कुछ ऊर्जावान लोगों की आवश्यकता होगी जो कि राज्य में कांग्रेस को वापस ला सकें. राजस्थान का प्रयोग कुछ रंग लाता दिख रहा है. सचिन पायलट को पार्टी को मुश्किल दौर से बाहर निकालने की ज़िम्मेदारी कारगर होती दिख रही है.

राजस्थान में हाल में हुए निकाय चुनाव में भाजपा का वोट 20 फ़ीसदी घटा है. पिछले साल लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों के बीच वोट का अंतर 26 फ़ीसदी था वो अब सिर्फ़ डेढ़ फ़ीसदी रह गया है.

इसके लिए पायलट को अपना मुख्य ठिकाना दिल्ली से जयपुर ले जाना पड़ा. वो पूरे राज्य में घूम-घूमकर कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा रहे हैं.

मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस के पास मौक़ा है, लेकिन वहाँ नेतृत्व को लेकर तस्वीर अभी स्पष्ट नहीं है.

अध्यक्ष न बनने का नुक़सान

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हालाँकि राहुल ने राजनीति में ख़ुद को फिर से गढ़ा है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी ताजपोशी कुछ कारणों से नहीं हो सकी है.

कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी का कार्यकाल एक साल और बढ़ गया है. सोनिया गांधी पार्टी के युवा और बुज़ुर्ग नेताओं को एक साथ रखने में सक्षम हैं. साथ ही वे मौजूदा हालात में विभिन्न दलों को एकजुट भी रख सकती हैं.

मिसाल के तौर पर नीतीश कुमार और लालू यादव पटना की स्वाभिमान रैली में सोनिया गांधी के साथ ज़्यादा सहज थे. उन्होंने उस रैली में राहुल को नहीं बुलाया. ये दोनों नेता चंपारण रैली में राहुल गांधी के साथ मंच पर नहीं थे.

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लालू और राहुल के बीच के तनावपूर्ण रिश्ते जगज़ाहिर हैं, क्योंकि राहुल ने उस अध्यादेश को फाड़ दिया था, जो कि चारा घोटाले में दोषी राजद अध्यक्ष को राहत दे सकता था.

कांग्रेस कार्यसमिति का सोनिया का अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल एक साल और बढ़ाने का फ़ैसला पार्टी के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन राहुल गांधी के लिए ये बुरा है. राहुल सक्रिय हैं और पार्टी की रणनीति तैयार करने के साथ-साथ फ़ैसले भी ले रहे हैं. संसद के पिछले सत्र में उन्होंने कांग्रेस को मुख्य विपक्ष के रूप में खड़ा किया.

ऐसे में अभी पार्टी की बागडोर नहीं संभालना, लोगों के बीच ये संदेश दे सकता है कि जब भी पार्टी को नेतृत्व देने की बात आती है, राहुल सहारा ढूंढने लगते हैं.

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