राजस्थान में ग़रीबों, विशेष पिछड़ों को आरक्षण

  • 22 सितंबर 2015
गुर्जर आरक्षण आंदोलन
Image caption राजस्थान में गुर्जरों ने मई में आरक्षण के लिए आंदोलन किया था.

राजस्थान विधान सभा ने मंगलवार को राजस्थान विशेष पिछड़ा वर्ग विधेयक 2015 को ध्वनि मत से पारित कर दिया.

इस विधेयक के तहत अनारक्षित वर्ग के आर्थिक पिछड़ों को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 14 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा.

गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने सदन में बताया कि सरकार इस विधेयक को भी संविधान की नवीं अनुसूची में शामिल करवाने का प्रयास करेगी ताक़ि ये क़ानूनी पेंचों में न फंसे.

गुर्जर, बंजारा, गड़िया लोहार, रेबारी, गड़रिया आदि को विशेष पिछड़े वर्ग के रूप में अलग से पांच प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है.

इस तरह अब राजस्थान में 68 प्रतिशत आरक्षण हो गया है. इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग को 21, अनुसूचित जातियों को 16, अनुसूचित जनजातियों को 12, आर्थिक रूप से पिछड़ों को 14 और विशेष पिछड़ा वर्ग को पांच प्रतिशत आरक्षण मिलेगा.

68 प्रतिशत आरक्षण सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50 फ़ीसदी सीमा का उल्लंघन है.

क़ानूनी पेंच

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Image caption गुर्जरों के आंदोलन के बाद सरकार पर आरक्षण देने का दबाव था.

राजस्थान विधान सभा ने राजस्थान विशेष पिछड़ा वर्ग एवं राजस्थान आर्थिक पिछड़ा वर्ग के लिए दो विधेयक पारित तो कर दिए गए हैं लेकिन इससे नई परेशानियां खड़ी हो सकती हैं.

सबसे बड़ा सवाल तो कानूनी पेंच का है. सरकार इन विधेयकों को संविधान की नवीं सूची में लाए जाने का प्रयास करेगी पर यदि ऐसा नहीं हुआ तो एक बार फिर से आरक्षण का यह मामला क़ानूनी पचड़े में फंस सकता है.

राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस पाना चंद जैन का कहना है, "संसद में वैसे ही इतने विधायी कार्य लंबित रहते हैं. संविधान की नवीं अनुसूची में लाए जाने में काफ़ी समय लग सकता है. जब तक ऐसा नहीं होता इसे चुनौती दी जी जा सकती है."

"ऐसे में सरकार का यह प्रयास महज एक 'दिखावा' और इन जातियों का ध्यान बंटाने का प्रयास है कि उन्होंने केंद्र को ऐसा प्रस्ताव भेज दिया है. ऐसे में 90 फ़ीसदी आसार अनुसूची में शामिल नहीं होने के हैं."

राजस्थान भी हाई कोर्ट 2009 और 2013 में 50 प्रतिशत से अधिक के आरक्षण प्रावधानों को असंवैधानिक करार दे चुका है.

जाति संघर्ष?

लम्बे समय से चल रहा गुर्जर संघर्ष राज्य सरकार के गले की फांस बना हुआ है. अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल मीणा समुदाय भी काफ़ी सशक्त हैं जो गुर्जरों के बढ़ते प्रभाव से खुश नहीं होगा.

इस विधेयक पर अपनी राय ज़ाहिर करते हुए राजस्थान जाट महासभा के अध्यक्ष राजा राम मील ने कहा, "सरकार गुर्जरों को आरक्षण देना चाह रही है पर उन 75 जातियों का क्या जो अन्य पिछड़ा वर्ग में उनसे भी बहुत कमज़ोर हैं? पहले भी सरकार ने यह कोशिश की थी और फिर से वैसा ही प्रयास किया जा रहा है जो ठीक नहीं है."

उधर सर्वब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष सुरेश मिश्रा को लगता है कि सरकार ने फिर से मीठी गोली देने की कोशिश की है.

वह कहते हैं, "यदि यह पहले पारित विधेयकों को ही नवीं सूची में शामिल करने के लिए भेज देते तो शायद कुछ उम्मीद की जा सकती थी. पर अब एक बार फिर से इसे चुनौती मिलने के पूरे आसार हैं."

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