सत्ता के गलियारे में मोदी एक 'आउटसाइडर'

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अगर आप पूछेंगे कि अभिलाषा प्रेरित चिंतन की अगली स्टेज क्या होती है?

उत्तर है, जब अभिलाषा को ही वास्तविकता समझा जाने लगता है, ख़्याली पुलाव की तरह.

यह पुलाव लगभग वास्तविक होता है, लेकिन जब तक नींद न टूटे, सिर्फ़ तब तक.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो तरह के ख़्याली पुलाव पकाने का मौक़ा देते आ रहे हैं.

एक यह कि उनकी सत्ता निश्चित ही कोई भ्रम है, जो बस अब टूटने ही वाला है.

और दूसरा यह कि मोदी तो दिल्ली की सत्ता के गलियारों में एक आउटसाइडर हैं, यहां के पुराने जमे लोगों में से कोई भी उन्हें नहीं जानता है. उन्हें दिल्ली की सत्ता के इन गलियारों का रास्ता भी नहीं पता है. उन्हें हमसे आकर पूछना ही पड़ेगा.

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पहले क़िस्म का वेज पुलाव मोदी के राजनीतिक विरोधी पकाते हैं, जिसका उन्हें पूरा अधिकार भी है.

(संसद में और संसद के बाहर) सरकार के काम में अड़चनें डालने की संसदीय और असंसदीय कोशिशें, सरकार को अकारण लांछित करने की कोशिशें, कुछ और न मिले तो सूट-बूट पर ही सही, मोदी ऐसे दिखते क्यों हैं, ऐसे चलते क्यों हैं, या कुछ भी और.

लोकतंत्र के खाते में सब जायज़ है. इसे आप सोशल मीडिया के चुटकुले की तरह अनदेखा नहीं कर सकते.

इस ख़्याली पुलाव के पाकशास्त्री बड़े-बड़े विद्वानों की मेहनत से तैयार की गई रेसिपी का प्रयोग करते हैं. उसमें डाले जाने वाले मसाले भी बेशक़ीमती होते हैं, और उसमें आंच देने की भी अच्छी-ख़ासी लागत होती है.

लेकिन इतना सब कुछ झोंकने वालों को भी ऐसी कोई ग़लतफ़हमी नहीं है कि वे इन तरीक़ों से एक स्पष्ट बहुमत की सरकार को गिरा सकेंगे.

सरकार की साख

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उनका मक़सद सिर्फ़ सरकार को अपनी उपलब्धियां जनता के सामने पेश कर सकने से रोकना और जनता की नज़रों में सरकार की साख कम से कम बनाए रखने की कोशिश करना है.

यह प्रयोग जारी है. हालांकि अभी तक यह पुलाव कम और भानुमती-छाप खिचड़ी ज़्यादा बना है. पकने दीजिए, फिर देखा जाएगा.

दूसरे क़िस्म का पुलाव वे पकाते हैं, जिन्हें पूरा विश्वास था कि मोदी दिल्ली की सत्ता के गलियारों में आउटसाइडर ही रह जाएंगे.

सत्ता के गलियारों में मोदी को आउटसाइडर मानने वालों के दो आधार रहे हैं. एक यह कि मोदी कभी भी सेंट्रल हॉल के नियमित आगंतुक और गॉसिप कॉलमों के नियमित विषय नहीं रहे.

और दूसरा यह कि किराए के मकानों में कई वर्ष से डटे लोग अक्सर मान बैठते हैं कि वे ही मकान मालिक हैं.

जो लोग दिल्ली की सत्ता के गलियारों के नियमित पात्र रहे हैं, वे भूल जाते हैं कि वे सत्ता के बूते इन गलियारों में टहल रहे थे, न कि उनके टहलने के बूते सत्ता चल रही थी.

एक के बाद एक दो गृह सचिवों की छुट्टी होने के मसले पर दिल्ली के एक अंग्रेज़ी अख़बार ने साफ़ लिखा- “नौकरशाही यह भूल ही गई थी कि यह कोई गठबंधन सरकार नहीं है, जिसमें मंत्री के ऊपर तमाम सत्ताएं होती हैं.”

और इस कारण नौकरशाह मंत्री पर अपनी मनमर्ज़ी थोप लेते थे, जिसमें मंत्री यह सोच कर चुप बना रहता था कि पता नहीं इसके पीछे किसका आदेश हो.

बुद्धिजीवियों का रोष

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अब भी कई लोग सत्ता के गलियारों में अकारण टहल रहे हैं. उनके पुलाव की रेसिपी यह है कि उनके चहचहाने से ही सावन आएगा, वरना नहीं आ पाएगा. देख लेना.

इनमें कुछ बुद्धिजीवी भी हैं, जो संभवतः सत्ता के गलियारों के नक्शे की अपनी अनुभवजन्य समझ को अपनी जीविका जैसा बना बैठे थे.

मोदी सरकार से उनकी आत्मीयता, अधिकांश मामलों में, सिर्फ़ इतनी है कि यूपीए सरकार से उनकी आत्मीयता नहीं थी.

ऐसे में, उनकी नज़र में अब मोदी सरकार से किसी तरह की सरकारी प्रतिष्ठा मिलना उनका अधिकार बन जाता है.

अगर मोदी सरकार इसे पर्याप्त क़ाबिलियत नहीं मानती, तो ज़ाहिर तौर पर वह कोपभवन में चले जाते हैं.

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फिर उनकी नज़र में सरकार सारे दोषों की खदान हो जाती है, उसकी लोकप्रियता गिरने लगती है, विश्व में भारत बदनाम होने लगता है और सरकार बस गिरने की कगार पर आ जाती है.

ऐसा नहीं है कि यह सब सिर्फ़ इन दो वर्गों की अभिलाषाएं हों. अगर हर सत्ता के साथ किसी न किसी का हित जुड़ता है तो हर सत्ता के विरोध के साथ भी किसी न किसी का हित जुड़ा होता है.

ऐसे हित भी अपनी सुविधानुसार किसी न किसी वर्ग से जुड़ते चले जाते हैं.

लेकिन नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के पतन के ख़्याली पुलावों के पाकशास्त्री अभी तक उस पुलाव को पकाते आ रहे हैं, जिसकी आंच बुझी हुई है.

सर्वे और लोकप्रियता

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वे किसी सर्वेक्षण के परिणाम को मानने के लिए राज़ी नहीं हैं, वे चुनाव परिणामों को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं.

देसी ख़बरिया चैनलों के अलावा, पीईडब्लू (पिउ रिसर्च) के सर्वे ने हाल ही में कहा है कि सत्ता में आने के बाद से मोदी की लोकप्रियता में और ज़्यादा वृद्धि हुई है. और तो और भारत के लोगों का स्वाभिमान बहुत तेज़ी से बढ़ा है.

चीन की मीडिया ही नहीं, वहां का नेतृत्व भी यह कहने के लिए बाध्य हुआ कि मोदी इस दौर के सबसे लोकप्रिय नेता हैं.

मज़ेदार बात यह है कि जब भारत का एक न्यूज़ चैनल एक सर्वे दिखाकर यह बता रहा था कि मोदी की लोकप्रियता में तेज़ गिरावट आई है, तभी दो राज्यों के स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम आ रहे थे, और सर्वे की अपनी विश्वसनीयता में तेज़ी से गिरावट आती जा रही थी.

सफलता और लोकप्रियता के हर पैमाने पर मोदी हर बार खरे उतर चुके हैं. बचे ख़्याली पुलाव, तो उस पैमाने पर पतन में भी कोई बुराई नहीं है --- लोकतंत्र है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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