सीएम मोदी का सपना पूरा किया पीएम मोदी ने

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केंद्र ने गुजरात सरकार के विवादास्पद चरमपंथ निरोधक क़ानून को मंज़ूरी दे दी है.

अब इसे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास मंज़ूरी के लिए भेज दिया गया है.

गुजरात कंट्रोल ऑफ़ टेररिज़्म एंड ऑर्गनाइज़्ड क्राइम बिल यानी गुजरात चरमपंथ और संगठित अपराध नियंत्रण बिल (गुजकोक) नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री कार्यकाल से लटका हुआ था.

2001 में मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब पहली बार यह बिल लाया गया था.

लटका हुआ था बिल

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गुजकोक को पूर्व में दो बार राष्ट्रपति राज्य सरकार को लौटा चुके हैं.

2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और 2008 में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने बिल राज्य सरकार को लौटाया था.

इस साल मार्च में मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल की अगुवाई में गुजरात विधानसभा में भारी हंगामे और विरोध के बीच इस बिल को पास करा लिया गया था.

नया बिल गुजरात कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम बिल (गुजकोक), 2003 का बदला हुआ रूप है.

गुजरात सरकार का तर्क है कि पाकिस्तान की तरफ से सीमा पार चरमपंथ से निपटने के लिए यह बिल ज़रूरी है.

इसके अलावा गुजरात की लंबी तटीय सीमा की सुरक्षा और अपराधी गैंगों के विस्तार को रोकने के लिए कड़े क़ानून की ज़रूरत है.

क्या है विवाद

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इस बिल के तहत आने वाले सारे अपराधों को गैर-ज़मानती रखने का प्रावधान है.

बिल में प्रवाधान है कि पुलिस द्वारा की गई फोन रिकॉर्डिंग और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के सामने दिया गया कबूलनामा अदालत में सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है.

इसके अलावा इंटरसेप्शन, इलेक्ट्रॉनिक या मौखिक संवाद को भी सबूत के तौर पर अदालत में पेश किया जा सकता है.

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बिल में हिरासत की मियाद 90 से बढ़ाकर 180 दिन कर दी गई है.

गुजकोक 2015 के तहत आने वाले सभी अपराध गैर-ज़मानती होंगे.

बिल के अनुच्छेद 20(4) के मुताबिक, "कोई भी व्यक्ति जिसे इस कानून के तहत हिरासत में लिया गया है, को ज़मानत या निजी मुचलके पर छोड़ा नहीं जा सकता."

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