मुखौटों के जादूगर शशधर आचार्य

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शशधर आचार्य सराईकेला छउ के जाने माने कलाकार हैं. सराईकेला छउ का उद्भव सराईकेला कस्बे से हुआ है जो अब झारखंड का हिस्सा है.

शशधर इस नृत्य परम्परा की पाँचवी पीढ़ी के कलाकार हैं. सराईकेला छउ मुख्य रूप से सैन्य नृत्य है जिसे सैनिक किया करते थे.

छउ का अर्थ होता है मुखौटा इसीलिए इसमें मुखौटों का प्रयोग होता है.

सोलहवीं शताब्दी में राजा बूढ़ा विक्रम सिंह ने सराईकेला को बसाया. उससे पहले सराईकेला की जगह साले गुटु नाम का जंगल था.

शशधर के पिता गुरु लिंगराज आचार्य ने उन्हें इस नृत्य की बारीकियों से परिचित कराया है. यही वजह है कि शशधर व उनके तीनों छोटे भाई इस नृत्य शैली को आगे ले जाने में जुटे हुए हैं.

उनके दो छोटे भाई सराईकेला में ही छउ गुरुकुल चलाते हैं. उनके शिष्य हर धर्म, जाति व तबके के हैं.

शशधर दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में नियमित रूप से सराईकेला छउ का प्रशिक्षण दे रहे हैं.

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Image caption शशधर कहते हैं कि छउ नृत्य शैली पर अभी और गंभीरता से काम करने की ज़रूरत है और जब तक वह जीवित हैं इस नृत्य शैली को मरने नहीं देंगे.
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Image caption छउ नृत्य में लड़कियां भी खूब दिलचस्पी लेती हैं. शशधर बताते हैं कि लड़कियां खूब अच्छा कर रही हैं और बहुत मेहनत भी करती हैं.
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Image caption छउ नृत्य की मुद्राएं पशु-पक्षियों व युद्ध कलाओं से प्रेरित हैं.
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Image caption उनके एक शिष्य सुशांत रात भर मंडी में चाय बेचने के बाद दिन में नृत्य सीखने आते हैं.
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Image caption सराईकेला छउ के मुखौटे विशेष प्रकार के होते हैं जो सराईकेला में ही बनाये जाते हैं.
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Image caption सभी शिष्यों के लिए रोज़ व्यायाम व अभ्यास आवश्यक है. शशधर बताते हैं कि यह अभ्यास शरीर को हल्का करने के लिए होता है.
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Image caption शशधर आचार्य कहते हैं कि हरेक कि क्षमता अलग होती है इसलिए हर विद्यार्थी पर विशेष ध्यान देना पड़ता है.
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Image caption हर कहानी के लिए विशेष मुखौटे होते हैं जो भूमिका के अनुसार इस्तेमाल किए जाते हैं.
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Image caption शशधर आचार्य के बेटे उनकी इस परंपरा को आगे ले जाने की तैयारी कर रहे हैं.

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