अब अमरीकी सैटेलाइट लॉंच कर रहा है भारत..

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भारत ने सोमवार को एस्ट्रोनॉमी बेस्ड ‘एस्ट्रोसैट’ पीएसएलवी-सी30 उपग्रह का प्रक्षेपण कर इतिहास रच दिया.

अमरीका, यूरोप और जापान के बाद भारत चौथा देश है जिसका अपना 'एस्ट्रोनॉमी' उपग्रह अंतरिक्ष में है.

हालाँकि अब तक भारत 45 विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण कर चुका है. पीएसएलवी-सी30 का प्रक्षेपण भी काफी ऐतिहासिक रहा, क्योंकि इससे कई छोटे उपग्रह भी अंतरिक्ष में छोड़े गए. इनमें से चार उपग्रह अमरीका के थे, जबकि एक इंडोनेशिया और एक कनाडा का था.

एस्ट्रोसेट को पृथ्वी से 650 किलोमीटर की ऊंचाई पर कक्षा में स्थापित किया गया है.

दुनिया का चक्र घूमा

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कुछ साल पहले तक अमरीका ने भारत पर एक तरह का तकनीकी प्रतिबंध लगा रखा था.

और, अब यह दौर भी है जब अमरीका अपने उपग्रह भारत के सैटेलाइट से भेज रहा है.

मज़ेदार बात यह भी है कि ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सेन फ्रांसिस्को में थे और 'डिजिटल इंडिया' की बात कर रहे थे, उसी समय में हिंदुस्तान के पीएसएलवी ने सेन फ्रांसिस्को की कंपनी का उपग्रह भी अंतरिक्ष में भेजा.

वैसे तो 'टेलिस्कोप' एक जैसे ही होते हैं मगर अमरीका का 'एस्ट्रोनॉमी' उपग्रह 'हब्बल' सिर्फ एक ही 'फ्रीक्वेंसी' में देख सकता है. जबकि भारत का एस्ट्रोनॉमी उपग्रह 'एस्ट्रोसैट' कई 'फ्रीक्वेंसी' और 'वेवलेंथ' पर देख सकता है.

कई रहस्य खुलेंगे

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'हब्बल' बहुत बड़ा टेलिस्कोप है ज़रूर है मगर मैं कहूंगा कि भारत द्वारा लांच किया गया 'एस्ट्रोसैट' उपग्रह 'टर्बो चार्ज्ड मिनी हब्बल टेलिस्कोप' है.

यह उपग्रह एक बार में ही किस तरह से ब्रह्माण्ड को देखेगा वो ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा. वो इस बात की भी जानकारी देगा कि किस तरह तारे बनते हैं और किस तरह वो ख़त्म भी हो जाते हैं.

उसी तरह वो यह भी पता लगाने में मदद करेगा कि ब्लैक होल्स क्या होते हैं और किस तरह 'यूनिवर्स' की उत्पत्ति हुई है.

वो सुदूरवर्ती खगोलीय पिंडों की जानकारी जुटाने में भी मदद करेगा. यह पांच साल तक काम करेगा और भारत के वैज्ञानिकों के लिए नई जानकारियां जुटाएगा.

कनाडा, इंडोनेशिया और अमरीका के सैटेलाइट छोटे हैं और उनका कार्यक्षेत्र सीमित है. इनमें से कोई सिर्फ तस्वीरें भेजेगा, कोई समुद्री जहाज़ों की निगरानी करेगा. यह कम लागत के सैटेलाइट हैं जो 'स्टार्ट-अप' कंपनियां बना रही हैं.

(बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत पर आधारित)

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