भांजों के ख़िलाफ़ प्रचार करेंगे लालू के साले?

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पूर्व सांसद और लालू प्रसाद यादव के छोटे साले सुभाष यादव सोमवार को पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी में शामिल हो गए.

राबड़ी देवी जब बिहार की मुख्यमंत्री थीं, तो सुभाष यादव सत्ता के केंद्र माने जाते थे.

सुभाष 2010 में ही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से इस्तीफा देकर लालू से राजनीतिक रूप से अलग हो गए थे. उनका लालू के कट्टर विरोधी पप्पू यादव के साथ जाना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है.

बीबीसी ने जन अधिकार पार्टी में शामिल होने के बाद सुभाष से उनके भविष्य की योजनाओं, लालू यादव के बारे में उनकी राय जानी.

पढ़िए सुभाष यादव से बातचीत के प्रमुख अंश

आप राजनीतिक रूप से गुमनामी में थे. अचानक एक नई पार्टी से आप क्यों जुड़े?

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बिहार में करीब 10 साल से सामाजिक न्याय का वातावरण खत्म हो गया था. पप्पू यादव ने अपनी मेहनत से सामाजिक न्याय के सवाल को फिर से मुख्य मुद्दा बनाया है. दिल को लगा कि पप्पू अच्छे हैं, इनकी पार्टी अच्छी है. इस कारण मैं जन अधिकार पार्टी में शामिल हुआ. मैं पप्पू यादव का हाथ मजबूत करने के लिए उनकी पार्टी में शामिल हुआ हूं. मैं चुनाव नहीं लडूंगा.

आपके कारण भी लालू प्रसाद यादव पर परिवारवाद की राजनीति को बढ़ावा देने के आरोप लगते थे. दूसरी ओर पप्पू यादव लालू के परिवारवाद का विरोध करते हुए ही राजद से बागी हुए. ऐसे में पप्पू की पार्टी में आप कितना सहज महसूस कर रहे हैं?

मैं 'परिवारवाद' के दायरे से बाहर हूं. मैं 1989 से तब से सक्रिय राजनीति में हूं जब मरहूम वीपी सिंह बोफर्स घोटाला सामने आने के बाद पहली बार बिहार आए थे.

जो पार्टी अपने दम पर खड़ी नहीं हो पा रही थी, उस पार्टी का वजूद हमने बना के रखा और उसकी सरकार चलवाने का काम किया. मुझे बैठे-बिठाए कोई चीज हासिल नहीं हो गई. हम जनता के आदमी थे. उनके बीच रहते थे. हम किसी के जेब में रहने वाले आदमी नहीं थे.

आप की नजर में आज लालू यादव और उनकी पार्टी की स्थिति कितनी मजबूत है?

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लालू मेरे राजनीतिक गुरु रहे हैं. लेकिन आज वे बहुत कमजोर हो गए हैं. उनके आस-पास कोई सही आदमी नहीं हैं. उन्हें सही सलाह देने वाला कोई नहीं है. उनके आस-पास झूठ का बाजार सजा हुआ है.

लालू क्यों कमजोर हो गए?

किसी घर में एक मालिक रहे तो सब ठीक रहता है. लेकिन लालू के घर में 'सत्रह मालिक' हो गए हैं. इसलिए सब कुछ बिखर गया है. ऐसे में मिठाई लाने को कहा जाता है तो लोग आम ले आते हैं. सत्रह मालिक कौन हैं, यह सार्वजनिक नहीं करूँगा. बिहार की जनता और कार्यकर्ता यह जानते हैं.

क्या आप अपने भांजों के खिलाफ प्रचार करेंगे? ऐसा करने में किसी उधेड़बुन या धर्मसंकट में तो नहीं घिरेंगे?

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किसी के खिलाफ या समर्थन में प्रचार करने की बात नहीं हैं. पप्पू यादव मेरे नेता हैं. वे मुझे जहां खड़ा रहने को कहेंगे मैं वहां खड़ा रहूंगा. राजनीति में धर्मसंकट जैसी चीज नहीं होती है. मैं पार्टी के लिए काम करुंगा.

आपकी पार्टी को 'वोटकटवा' कहा जा रहा है. अपनी पार्टी की ताकत कितनी आंकते हैं आप?

'वोटकटवा' हम नहीं दूसरी पार्टियां हैं. आठ नवंबर की सुबह पता चल जाएगा कि कौन वोटकटवा है.

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