दादरी से मुसलमानों के लिए क्या है संदेश?

अख़लाक़ की मौत जितनी डरावनी थी, उसके बाद की प्रतिक्रियाएँ भी चिंतित करने वाली हैं.

भाजपा के स्थानीय नेताओं को पुलिस की कार्रवाई पर ऐतराज़ है. उनका कहना है कि यह इरादतन क़त्ल नहीं था, इसलिए हत्या की धाराएँ न लगाकर ग़ैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए.

उनका तर्क यह है कि अख़लाक़ की हत्या की कोई पूर्व योजना न थी, वह तो 'गोवध' और 'गोमांस' खाने की ख़बर से हिंदू ग्रामीणों की धार्मिक भावनाएं भड़क उठीं. उनका मानना है कि लोगों ने 'कुछ कड़े रूप में अपनी भावनाएं व्यक्त कीं', जिसके नतीजे में अख़लाक़ की मौत हो गई.

वे उलटे अख़लाक़ के परिवार पर गोवध और गोमांस भक्षण के लिए आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग कर रहे हैं. धमकी दी जा रही है की अगर ऐसा न किया गया तो महापंचायत की जाएगी.

'पीड़ित ही अपराधी'

भाजपा के कुछ स्थानीय नेता कह रहे हैं कि असल मुजरिम तो ख़ुद अख़लाक़ ही था क्योंकि उसके घर गोमांस होने का शक गाँव वालों को हुआ. जो शिकार है, वही अपराधी साबित किया जा रहा है. अख़लाक़ ने अपनी मौत को दावत दी.

पुलिस ने अख़लाक़ के फ्रिज में रखे मांस को जांच के लिए लिए भेजा है की वह गोमांस तो नहीं था! मानो, यह मालूम हो जाने से इस हत्या की गंभीरता कम हो जाएगी.

गाँव में हत्या को लेकर कोई अफ़सोस नहीं दिखता.

ये हत्या प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़, गाँव के मंदिर से किए गए इस ऐलान के बाद की गई कि अख़लाक़ ने गाय काटी है और गोमांस खाया है.

पहली नज़र में ऐसा लगता है कि लोगों का ग़ुस्सा भड़का और बात हाथ से निकल गई, लेकिन ये ख़ूनी ग़ुस्सा यूँ ही नहीं भड़का है, लंबे हिन्दुत्ववादी प्रचार और मुस्लिम विरोधी ट्रेनिंग के बाद ही नफ़रत सामूहिक हिंसा में बदली है.

अब रिपोर्टरों को यह मालूम हो रहा है कि काफ़ी पहले से इस पूरे इलाक़े में एक मुस्लिम विरोधी माहौल बन रहा था. इसके पहले भी मवेशी लेकर जा रहे तीन मुसलमान व्यापारियों को गाड़ी से खींच कर मार डाला गया था. दुकान खोलने पर एक मुसलमान की पिटाई की गई थी.

मुसलमानों की छोटी-छोटी बात पर पिटाई और उन्हें बेइज्ज़त करने की घटनाओं की ख़बरें भी मिल रही हैं. इससे नतीजा यही निकलता है कि मुसलमानों को आतंकित करने की एक मुहिम-सी छेड़ी गई है.

मुज़फ़्फ़रनगर

यही पैटर्न मुज़फ़्फ़रनगर में भी देखा गया था.

जब हिंसक कांड के बाद वे किसी तरह मुक़दमे में फँस जाते हैं तो इसके लिए वे मुसलमानों को ही जवाबदेह मानते हैं. कहा जाता है, 'अगर उन्होंने उकसाया न होता तो वे उत्तेजित नहीं होते!' 'हम मुसलमानों की तरह हिंसक प्रवृत्ति के नहीं हैं.'

ऐसे मुसलमानों से सहानुभूति क्यों हो जो शांतिप्रिय-सहिष्णु लोगों को क़त्ल के लिए उकसाते हैं? उन्हें यह साफ़ संदेश भी मिल जाता है कि या तो वे गाय की तरह रहें या गाँव छोड़ दें. यह मुज़फ़्फ़रनगर में हो चुका है और अटाली में भी.

अस्करी भी यही करने जा रही है. वह अपना मकान, जो पड़ोस के बिना अब घर नहीं रह गया है, बेचना चाहती हैं.

तो क्या हिंदुओं ने मुसलमानों का पड़ोसी बनने से इनकार कर दिया है? क्या यह मुसलमानों के लिए अलग देस बनाने का संदेश है?

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