पंद्रह साल बाद का पटना और एक दुखद याद

  • 1 अक्तूबर 2015
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जैसे जैसे आप शहरों के क़रीब जाते हैं वो बदलने लगते हैं.

एक लंबे समय तक मैं अपने भीतर अपने शहर की यादों को ढोती रही हूँ. मैंने अपना शहर इसलिए छोड़ा क्योंकि इसके अलावा कोई चारा नहीं था.

बड़े होते हुए हम पटना और इसकी सीमित ज़िंदगी से दूर जाना चाहते थे. पिछले 15 सालों से मैं बाहर हूँ और इस दौरान पटना में काफ़ी कुछ बदला है.

अब यहां मॉल, कॉफ़ी शॉप और यहां तक कि डिस्कोथेक भी खुल चुके हैं.

लेकिन छवि बदलने की इन क़वायदों से परे कुछ चीज़ें हैं. नदी सिकुड़ चुकी है और जिस घूमते रेस्तरां को देख स्कूल के दिनों में हम हैरान होते थे वो अब पटना की रात की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है.

यह धीरे धीरे घूमता है और इसके 18वें माले से पूरा शहर एक काल्पनिक दुनिया जैसा लगता है.

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इस शहर से जुड़ी सबसे दुखद याद है, 1999 में शिल्पी जैन के साथ हुआ बलात्कार और हत्या.

इस घटना की यादें सालों तक हमारे ज़हन में बनी रहीं. इस मामले में कोई इंसाफ़ नहीं हुआ और सीबीआई ने इसे बंद कर दिया था.

सेंट जोसफ़ कॉन्वेंट स्कूल और पटना वूमेंस कॉलेज के दिनों में शिल्पी मेरी सीनियर थीं.

जिस दिन गैंग रेप के बाद उनकी हत्या हुई, मैं सुबह उनसे मिली थी.

हम नहीं जान पाए कि उस दिन क्या हुआ था और सालों बाद इस घटना के ख़िलाफ़ होने वाले विरोध प्रदर्शन भी बंद पड़ गए.

मैं अक्सर इस मामले को लेकर सोचती रही हूँ और अब जब मैं पटना आई तो मैंने एक अनजाने दुख से ख़ुद को घिरा पाया.

शायद यह इंसाफ़ की उम्मीद के टुकटे टुकड़े होने और दोषी को सज़ा न मिलने की वजह से था.

सवाल

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सच ये है कि हम कभी उस बलात्कार की घटना को अपनी यादों से मिटा नहीं पाए और इस बारे में लिखना शायद अवसाद से उबरने जैसा है.

साल 2006 में उनके भाई प्रशांत जैन ने मामले को फिर से खोले जाने की कोशिश की थी, लेकिन उनका अपहरण कर लिया गया.

हर चुनाव के साथ एक उम्मीद जगती है कि सालों से जो सवाल घूम रहा है, शायद उसका जवाब तलाशने के लिए कुछ तो किया जाएगा, मसलन वो आत्महत्या क्यों करेगी?

अब फिर से नई सरकार बनने वाली है और बिहार एक और चुनाव से होकर गुज़रने वाला है.

क़ानून व्यवस्था में सुधार हुआ है और एक पत्रकार के रूप में मैंने पूरे बिहार की यात्रा की है और यह अराजकता वाले उन दिनों के मुक़ाबले थोड़ा सुरक्षित लगता है, जब हम दिल्ली जाने के लिए पटना से राजधानी ट्रेन में सवार होने से डरते थे कि कहीं यह अपराधी राजनीतिज्ञों से भरी न हो, जो किसी क़ानून से नहीं डरते.

पंद्रह साल पहले का दौर

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उस दौर में अपरहण और हत्याएं आम थीं और हम राज्य को दिनों दिन और अराजकता की ओर जाते देखते थे. उस दौरान भरोसे की भारी कमी थी. अपराध को क़ाबू करने में क़ानून व्यवस्था विफल हो चुकी थी.

बड़े होते हुए हमारे कई साल सुरक्षित और ख़ुद को बचाते हुए खेलने की कोशिश में बीते. हम अदृश्य महिलाएं थीं, जो न कभी कैफ़े गईं और न ही फ़िल्म देखने या फिर कुछ भी ऐसा करने की हिम्मत नहीं की जिससे हमारी पहचान खुल जाए.

केवल एक बार मैं डिस्कोथेक गई थी, जिसे अली नाम के एक आदमी ने बहुत साल पहले पटना में खोला था.

और यह इसलिए बंद हो गया क्योंकि अली ने कुछ ऐसा करने की हिम्मत जुटाई जिसकी उन दिनों इस शहर में इजाज़त नहीं थी.

पटना में बड़े होते अन्य लोगों की तरह ही मैं भी उन चीजों पर नज़र रखे हुए थी, जो बदली हैं.

एक नया डिस्कोथेक खुल चुका है. हो सकता है कि मेरे लिए ये कोई मामूली घटना हो लेकिन यह एक हिम्मत का काम है और ऐसी चीज़ की दावेदारी है जो कभी हमारी थी ही नहीं.

उत्सुकतावश मैं एक शाम डिस्कोथेक गई. यह एक्ज़ीबिशन रोड पर है और इसका नाम 'डिस्क मैन' रखा गया है.

पहला नाइट क्लब

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लोग कहते हैं कि यह शहर का पहला नाइट क्लब है और उस शाम इसके लकड़ी के फर्श पर नियोन की आड़ी तिरछी रोशनी पड़ रही थी हालांकि वहां कोई भी डांस करता नज़र नहीं आया. मैंने उम्मीद में थोड़ा इंतज़ार किया.

वहां बाउंसर मौजूद थे और इसे ख़ास जगह बनाने के लिए 500 रुपए की बहुत ऊंची एंट्री फ़ीस रखी गई थी.

'डिस्क मैन' कमल खानुजा और उनके भाई का है. वो पटना के सबसे पुराने होटल व्यवसायी हैं और वो एक ऐसे शहर में एक डिस्कोथेक खोलने के सही समय का मौका तलाश रहे थे, जो पिछले 13 साल से इस सपने के साकार होने के इंतज़ार में था.

और मैं उस दिन से आज की गिनती कर रही हूँ जब अली ने पहली बार डिस्कोथेक खोला था.

मैनेजर ने कहा कि वो इसे दिन में भी खोले रखते हैं क्योंकि इस दौरान कॉलेज की लड़कियां और लड़के यहां आते हैं.

एक खास स्टाइल वाले और ढीली ढाली जीन्स पहनने वाले अली का एक सपना था और उसने कैंडी स्टोर के सबसे ऊपरी माले पर डिस्कोथेक चलाने की कोशिश की थी.

बदलाव

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ये भी दिन के समय खुला रहता होगा क्योंकि उसने कहा था कि लड़कियों और लड़कों को एक विशेष समय तक ही बाहर रहने की इजाज़त होती थी.

बाद में और भी डिस्कोथेक खुले होंगे और आख़िरकार 'पैंडोराज़ बॉक्स' की तरह बंद हो गए जो 2001 में खुला था.

मैंने 2001 में ये शहर छोड़ा था और एक बाहरी इंसान की तरह ही यहां लौटी हूँ और बदलावों के संकेतों को पहचनाने की कोशिश की है.

मैंने वहां काफ़ी लंबा वक़्त गुज़ारा. लेकिन एक ऐसे डिस्कोथेक में रुकना अजीब लग रहा था, जहां झाड़ फानूस, संगीत के उपकरण और बेहतरीन साजसज्जा तो थी लेकिन इसके अलावा और कोई नहीं था.

जब मैं वापस लौट रही थी तो मैं नदी के किनारे बने घाटों पर रुक गई और अपने शहर के बारे में सोचते हुए मैं वहां कुछ मिनटों के लिए बैठी रही.

पटना के लिए एक लंबा समय गुजर चुका है. मैं अभी भी एक बाहरी इंसान की तरह बदलाव के संकेतों को तलाश रही हूँ और हमेशा से ही जिस चीज की मुझे तलाश रही है वो है उस हत्या और रेप के मामले का जवाब जो मेरी याद में रेप का पहला मामला था.

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