क्या सिर्फ़ बदक़िस्मत प्रेमिका थीं रज़िया?

  • 4 अक्तूबर 2015
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भारत की पहली महिला शासक रज़िया सुल्तान के बारे में हेमा मालिनी का ख़्याल आए बिना सोचना बहुत मुश्किल है. कमाल अमरोही की फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' में हेमा मालिनी ने रज़िया का किरदार निभाया था, काले रंग में पुते धर्मेंद्र के साथ.

आजकल रज़िया सुल्तान पर हिंदी में एक धारावाहिक बन रहा है. हालांकि इसकी कल्पना से तथ्यों को परे ही रखा गया है.

दिल्ली के सुल्तान (1210-1236 ईस्वी) इल्तुतमिश की बेटी रज़िया शर्मीली नहीं थीं और परदे में बड़ी नहीं हुई थीं.

वो क़त्तई इस तरह की नहीं थी कि रेत के टीलों में विलाप करें और प्रेम गीत गाएं, चाहे वो गाना शानदार 'ऐ दिले नादां' ही क्यों न हो.

'बीस बेटों के बराबर'

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वो एक निपुण और जोशीली घुड़सवार, तलवारबाज़ और तीरंदाज़ थीं. उनके पिता और उनके भरोसेमंद काले ग़ुलाम जमालुद्दीन याक़ूत ने उन्हें युद्धकला में पारंगत किया था.

उन्हें शासन करने का भी प्रशिक्षण दिया गया था और जब इल्तुतमिश ग्वालियर की ओर एक अभियान पर निकले तो उन्हें सल्तनत की ज़िम्मेदारी सौंप गए थे.

इल्तुतमिश के सबसे बड़े बेटे और उत्तराधिकारी नसीरुद्दीन महमूद 1229 ईस्वी में एक लड़ाई में मारे गए थे और उन्हें अपने छोटे बेटों पर यक़ीन नहीं था क्योंकि वे जवानी के सुख भोगने में डूबे हुए थे.

परंपरा से बिल्कुल हटकर उन्होंने रज़िया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया. कहा जाता है कि वो रज़िया की क्षमता को बीस बेटों के बराबर बताते थे.

सुल्तान की इच्छा के विरुद्ध कुछ प्रभावशाली लोगों ने उनके छोटे और नाक़ाबिल भाई रुकनुद्दीन फ़िरोज़ (अप्रैल 1236- अक्तूबर 1236) को तख़्त पर बैठा दिया.

लेकिन जल्द ही योद्धा रज़िया सुल्तान ने परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ लिया.

'राजा की ख़ूबियां'

इतिहासकार ख़्वाजा अब्दुल्लाह मलिक इसामी अपनी कितानब 'फ़ुतुहात-ए-सलातिन' (1349-50) में लिखते हैं कि रज़िया फटेहाल में, मैले कुचैले कपड़े पहने हुए शुक्रवार की नमाज़ के लिए एकत्र लोगों के सामने आकर अपनी पीड़ा सुनवाई.

रज़िया का कहना था कि उनकी सौतेली मां शाह तुरकान अपने बेटे रुकनुद्दीन फ़िरोज़ के ताज के बहाने राज कर रही हैं.

रज़िया ने वहां मौजूद लोगों से अपनी सौतेली मां की साज़िशों का मुक़ाबला करने में अपने पिता के नाम पर मदद मांगी.

रज़िया को इस हालत में देखकर और उनके प्रभावशाली शब्दों ने मौजूद लोगों पर तगड़ा प्रभाव डाला. इससे एक और आक्रामक क़दम की शुरुआत हुई, यानी दिल्ली के लोगों और रज़िया के बीच एक संबंध की शुरुआत हुई.

इसामी कहते हैं कि इस घटना के बाद रज़िया और आम लोगों के बीच एक और बात पर सहमति बनी, जिसके तहत ''उन्हें अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का मौक़ा मिलना था और अगर वो ख़ुद को आदमियों से बेहतर साबित नहीं कर पातीं, तो उनका सिर क़लम कर दिया जाना था."

जब तक उनका भाई शहर में वापस आया रज़िया का राज्याभिषेक हो चुका था और फिर शाह तुरकान को जेल में डाल दिया गया. मां और बेटे दोनों को 9 नवंबर, सन् 1236 को मार दिया गया.

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अपने भाई की जगह वह सुल्तान जलालुद्दीन रज़िया के नाम से तख़्तनशीं हुईं.

उन्होंने महिलाओं को दी जाने वाली पदवी (जो आमतौर पर शहज़ादियों या पत्नियों के लिए प्रयोग की जाती थी) को नकार दिया था. उनकी नज़र में शासक रज़िया सुल्तान के लिए यह एक कमज़ोर पदवी थी.

उन्होंने अपने ज़नाना कपड़े छोड़कर आदमियों की तरह कुर्ते, लबादे और पगड़ी पहनना शुरू कर दिया, उन्होंने परदा करना भी छोड़ दिया.

इतिहासकार मिन्हाज-उस-सिराज कहते हैं, "सुल्तान रज़िया एक महान शासक थीं. वह समझदार थीं, ईमानदार और उदार, अपने साम्राज्य की संरक्षक, इंसाफ़ देने वाली, अपनी प्रजा की रक्षक और अपनी सेना की सेनापति थीं. उनमें वे सारे गुण थे जो एक राजा में होने चाहिए, लेकिन बस उनकी पैदाइश सही लिंग में नहीं हुई थी. इसलिए पुरुषों के विचार में उनकी ये सारी ख़ूबियां बेकार थीं."

वो राज्य के मामलों को एक खुले दरबार में बड़ी कुशलता के साथ निपटाती थीं.

लेकिन रज़िया के पतन का कारण जमालुद्दीन याक़ूत नाम के एक ग़ुलाम से उनकी कथित दोस्ती की धारणा थी, जिन्हें उन्होंने घुड़साल के मुखिया के पद पर तरक़्क़ी दी थी.

इससे बेहद शक्तिशाली तुर्कों का गुट (जिसे चहालग़नी कहा जाता था) नाराज़ हो गया जिन्हें लगता था कि सभी महत्वपूर्ण पद तुर्कों के पास ही रहने चाहिए.

'प्रेम संबंध?'

आज हम उन्हें कभी भी एक शासक के रूप में याद नहीं करते बल्कि एक बदक़िस्मत औरत के रूप में याद करते हैं जो अपने ग़ुलाम से प्यार करती थी और इत्तेफ़ाक़ से एक शासक भी थी.

लेकिन कोई भी समकालीन इतिहासकार कभी भी किसी प्रेम संबंध की बात नहीं करता, इसके सिवाय कि घोड़े पर चढ़ने के दौरान उन्हें रज़िया को छूने की इजाज़त थी. लेकिन घुड़साल नियंत्रक होने के नाते यह उनका काम था. वो इल्तुतमिश के लिए भी यही करते थे.

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जब हम हर चीज़ को रोमांस के चश्मे से देखते हैं तो ये भूल जाते हैं कि वो मुश्किल परिस्थितियों में राज करने की कोशिश कर रही थीं. और उन हालात में उनके पिता के भरोसेमंद ग़ुलाम और उनके शिक्षक से ज़्यादा भरोसेमंद कौन होता?

जब मैं अपनी बेटी को रज़िया की कहानी सुना रही थी उसने चिल्लाकर कहा, "मां वो उन्हें अपने सलाहकार के रूप में देखती थीं और पिता समान मानती थीं."

सच चाहे कुछ भी हो, शक्तिशाली तुर्कों के गुट ने उनके ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया. याक़ूत की हत्या कर दी गई और रज़िया को क़ैद कर लिया गया.

उनके एक काले ग़ुलाम के साथ कथित प्रेम संबंध के कारण उनके ख़िलाफ़ बग़ावत हुई या इसलिए कि वो अब शक्तिशाली तुर्कों की कठपुतली नहीं रह गई थीं, वो अपने दिमाग़ से काम कर रही थीं और एक ग़ैर-तुर्क को एक महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त कर अपनी ताक़त आज़मा रही थीं.

चहलग़ानी ने फिर उनके भाई मुइज़ुद्दीन बहराम को तख़्त पर बैठाया.

रज़िया वहां से भागकर भटिंडा पहुंचने में सफल रहीं और वहां एक अन्य तुर्क अमीर मलिक अल्तूनिया से हाथ मिला लिया. बाद में उन्होंने उनसे शादी भी कर ली.

दिल्ली के उन लोगों के सुरक्षा घेरे से बाहर जाने के बाद, जिन्होंने उन्हें चुना था, वो उतनी ताक़तवर नहीं रह गई थीं और जल्द ही दिल्ली के तख़्त पर सवार अपने भाई के ख़िलाफ़ एक अभियान का नेतृत्व करते हुए मारी गईं.

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