हिंदुस्तान में, अफवाहों पे क़त्ल होने लगा!

नरेंद्र मोदी, मार्क ज़करबर्ग, अख़लाक़ अहमद की मां इमेज कॉपीरइट BBC AND AFP

एक तरफ़ तो मोदी सरकार डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं की बातें कर रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ़ेसबुक के मुखिया मार्क ज़करबर्ग से गले मिल रहे हैं.

तो दूसरी तरफ़ देश की राजधानी दिल्ली से सटे दादरी इलाके में महज़ गोमांस खाने की अफ़वाह की वजह से अल्पसंख्यक समुदाय के एक शख़्स को अपनी जान गंवानी पड़ती है.

तो क्या डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया से पहले सरकार को नागरिकों की हिफ़ाज़त के, सांप्रदायिक शक्तियों को रोकने के प्रयास नहीं करने चाहिए?

बीबीसी ने अपने फ़ेसबुक और ट्विटर पेज पर यही सवाल पाठकों से पूछा जिसका बड़ी संख्या में लोगों ने जवाब दिया.

सरकार की आलोचना

मुकेश बंसल इस घटना को शेर के तर्ज पर कुछ यूं व्यक्त करते हैं, "लगाया था जो उसने पेड़ कभी, अब वह फल देने लगा; मुबारक हो हिन्दुस्तान में, अफ़वाहों पे कत्ल होने लगा."

नजीमुद्दीन अंसारी कहते हैं, "अगर गाय के प्रति आस्था का सवाल होता तो किरण रिजीजू जैसे लोग आपके मंत्रिमंडल में नहीं होते. बीफ़ खाने की खुलेआम वकालत करने वाले अभिनेता ऋषि कपूर के ख़िलाफ़ आप प्रदर्शन करते. गाय के प्रति आप ख़ुद ही इतना बुरा बरताव ना करते. यहां बात आस्था की नहीं, नफ़रत की है."

मनीष झा लिखते हैं, "बात, चाय पर चर्चा से शुरू हुई थी और मीट पर मर्डर पर आकर ख़त्म हुई."

जुनैद रज़ा लिखते हैं, "देश का भविष्य भूखा सो रहा है, सुना है मेरा इंडिया डिजिटल हो रहा है."

आसिफ़ ख़ान कहते हैं, "गाय मारना पाप है, कृपया आदमी मारेँ."

दिल है हिंदुस्तानी के नाम से फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल वाले सज्जन लिखते हैं, "बुनियादी सुविधाओं का ठिकाना नहीं और बातें हवाई महलों की."

बचाव

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लेकिन कई लोगों ने मोदी सरकार का बचाव भी किया है.

गौरव लिखते हैं, "इस घटना में अखिलेश सिंह सरकार की ग़लती थी. बेवजह केंद्र सरकार को ना घसीटा जाए."

जितेंद्र कोठारी लिखते हैं, "सारी अफ़वाहें मीडिया वाले फैलाते हैं."

सुधीर शुक्ला कहते हैं, "डिजिटल इंडिया मुहिम में भला क्या ग़लत है. ठीक है, नागरिकों की हिफ़ाज़त होनी चाहिए लेकिन ये काम डिजिटल इंडिया के साथ-साथ भी तो चल सकता है."

किरण लिखते हैं, "कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के साथ भी तो बेइंसाफ़ी हुई. उस पर मीडिया क्यों नहीं ध्यान देता?"

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