'सलाखों' में आंबेडकर की मूर्तियां

तमिलनाडु में अम्बेडकर की मूर्ति
Image caption तमिलनाडु में अम्बेडकर की मूर्ति.

वो हिंदुस्तान के बड़े नेताओं में से एक थे. दुनिया के संभवतः सबसे बड़े संविधान के शिल्पी, क़ानून के बड़े विद्वान, एक आध्यत्मिक नेता, एक योजनाकार और सबसे अहम, उन दलितों के निर्विवादित नेता, जिनकी जगह भारत की कड़वी जातीय व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर है.

महात्मा गांधी के बाद भीमराव रामजी आंबेडकर भारत के निःसंदेह सबसे पूजनीय नेता थे.

उनकी मूर्ति हर कस्बे, गाँव, शहर, चौराहे, रेलवे स्टेशन और पार्कों में भारी संख्या में लगी है.

इस करिश्माई नेता को आमतौर पर पश्चिमी सूट और टाई के साथ सामने वाली जेब में एक कलम और बांहों में भारतीय संविधान की क़िताब लिए और चश्मा लगाए एक गठीले इंसान के रूप में चित्रित किया जाता है.

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इतिहासविद् जानकी नायर के मुताबिक, “यह दलितों की दावेदारी का प्रतीक है.”

इसमें हैरानी की बात नहीं है कि ऊंच नीच और जाति व्यवस्था वाले भारत में आंबेडकर अछूत के रूप में जाने जाने वाले दलितों और उनके विरोधियों के लिए एक मिसाल हैं.

शायद इसीलिए कई राज्यों में प्रशासन इस नेता की मूर्तियों के चारों ओर पिंजरा बनवा रहा है.

ये वही नेता हैं जिन्हें इतिहासविद रामचंद्र गुहा ग़रीबों का मसीहा कहते हैं.

भारत के सबसे विकसित राज्यों में से एक तमिलनाडु में यह समस्या सामने आई है.

इस राज्य की अर्थव्यवस्था भारत में दूसरे नंबर की है और विश्व बैंक के मुताबिक़, मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स के लक्ष्यों को पाने के हिसाब से यह राज्य समय पर चल रहा है.

इस राज्य में दशकों तक तार्किक और जाति विरोध की राजनीति करने वाली पार्टियों ने राज किया है और इस समय वो मुख्य विपक्षी पार्टी हैं.

स्याह पहलू

लेकिन दलितों के ख़िलाफ़ ऊंची जातियों द्वारा दशकों पुराने और लगातार अत्याचारों की सच्चाई पर यह सिर्फ़ पर्दा भर है.

पूरे राज्य की आबादी में 19 प्रतिशत दलित हैं.

अपने हक़ को लेकर दलितों की दावेदारी के विरोधी, सालों से हिंसा और दंगा भड़काने के लिए आंबेडकर की मूर्ति को चप्पलों की माला पहनाकर या उनके हाथ काटकर अपमानित करते रहे हैं.

दबंग जातियों पर काब़ू पाने में विफल रहने वाला भयभीत प्रशासन पूरे राज्य में स्थापित इन मूर्तियों के चारों ओर पिंजरा बनवा रहा है.

राजनीतिक विज्ञान के विद्वान सी लक्ष्मण कहते हैं, “यह तमिलनाडु के लिए सबसे बड़ी शर्मिंदगी है. यह दिखाता है कि दलितों की सुरक्षा करने में राज्य पूरी तरह असफल हो चुका है. राज्य जातिगत बर्बरता के सामने दिनों दिन घुटने टेकता जा रहा है.”

दलितों का विरोध इतना तगड़ा और खुलेआम है कि उन पर अत्याचार के ख़िलाफ़ बने क़ानून को ढीला करने की मांग को लेकर ऊंची जातियों के समूहों ने सार्वजनिक रूप से हाथ मिला लिए हैं.

लक्ष्मण इसे साफ़ तौर पर ‘दलित विरोधी राजनीति’ कहते हैं और यह इसी का एक नमूना है.

‘जातीय फ़ासीवाद’

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अतीत में भी दबंग जातियों ने आंबेडकर के नाम वाली राज्य की सरकारी बसों को अपने गांवों में घुसने से रोक दिया था और प्रशासन को नाम हटाने पर मजबूर किया था.

मेरे गांव में दलितों को अब भी सामुदायिक कुंओं के इस्तेमाल की इजाज़त नहीं है, न ही हिंदू मंदिरों में घुसने और नाई की दुकान में जाने की इजाज़त है.

पिछले साल तमिलनाडु में भीड़ के हमले और आपसी भिड़ंत में बिहार के 70 ग़रीब दलित मारे गए थे.

वर्ष 1956 से अब तक राज्य में दलितों के ख़िलाफ़ अपराध की घटनाओं में कम से कम 15 न्यायिक जांच चल रही है लेकिन एक भी अभियुक्त को सज़ा नहीं हुई है.

घोर जाति विरोधी पार्टी वीसीके (लिबरेशन पैंथर्स पार्टी) के नेता और विधायक एन रविकुमार कहते हैं, “दबंग जातियों में दिनों दिन तनाव बढ़ता जा रहा है. इसलिए दबंग जातियां दलितों के ख़िलाफ़ अपना गुस्सा उतार रही हैं.”

अांबेडकर की मूर्तियों को पिंजड़े में बंद करने की कार्रवाई को राज्य में बहुत से लोग आज के भारत में ‘जातीय फ़ासीवाद’ एक उदाहरण मानते हैं.

इससे यह भी सिद्ध होता है कि देश की जाति आधारित पार्टियां समाज में इंसाफ और अधिकारों के लिए लड़ने की बजाय अपने अपने जातीय समूहों के हित में विशेष लाभ और रियायतें लेने की फिराक में रहती हैं.

अछूत समस्या आज भी

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इसलिए सबसे बुरे और घिनौने रूप में अछूत समस्या तमिलनाडु में न केवल ज़िंदा है बल्कि मजबूत है.

अपने एक ऐतिहासिक भाषण में आंबेडकर ने हैरानी जताई थी कि सामाजिक और आर्थिक घेरे में भारतीय कितने लंबे समय तक बराबरी देने से इनकार करते रहेंगे.

उन्होंने कहा था, “अगर हम बराबरी का अधिकार देने में बहुत देरी करते रहे, तो ऐसा केवल राजनीतिक लोकतंत्र को ख़तरे में डालकर ही कर पाते हैं.”

उन्होंने कहा था कि आज़ाद भारत का अधिकांश विकास गोबर के ढेर पर जाति के निर्माण जैसा है.

बहुत से लोग इसे कड़वा लेकिन दूरदर्शी सच्चाई मानते हैं.

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