अगड़ों का गठबंधन 'जातीय' क्यों नहीं?

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बिहार विधानसभा चुनाव 2015 रोचक होता जा रहा है. कहा जा रहा है कि 'विकास' के बजाय चुनाव की प्रक्रिया में 'जाति' का महत्व बढ़ गया है.

इसके विपरीत 2005 और 2010 के विधानसभा चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़े गए थे. और तो और 2014 के संसदीय चुनाव जाति की फांस से ऊपर उठ गए थे, ख़ासतौर पर हिंदी के इलाक़ों में.

लेकिन बिहार के मौजूदा विधानसभा चुनाव में एक राजनीतिक गठबंधन जाति के एजेंडा को मंडल-2 के नाम पर बढ़ा रहा है.

कुछ महीने पहले इसी समूह ने बार-बार सरकार पर जनसंख्या के जाति आधारित आंकड़ों को सार्वजनिक करने को लेकर दबाव डालकर राज्य में राजनीतिक बहस को दूषित किया था.

इस चुनाव में नीतीश कुमार ने, जो अब तक विकास का चेहरा रहे हैं, 2014 के चुनाव में हार के बाद लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया जो मंडल कमीशन का चेहरा रहे हैं.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते रहे हैं कि मंडल-1 राज्य के विनाश और अराजकता का प्रतीक रहा जिससे 'जंगल राज' आया तो मंडल-2 में अगर राजद, जदयू और कांग्रेस सत्ता में आते हैं तो इससे 'रोजाना जंगल राज का डर' अनिवार्य हो जाएगा.

इससे विकास से ध्यान पूरी तरह हट जाएगा और उसकी जगह आ जाएगी जाति आधारित अराजकता.

सच्ची बात तो यह है कि आज़ादी के बाद से जाति भारत की चुनावी जंग में हमेशा मौजूद रही.

बदला चुनावी परिदृश्य

पहले परंपरागत रूप से कांग्रेस, भारतीय कुलीन वर्ग, ब्राह्मणों, दलितों और मुसलमानों के मजबूत गठजोड़ से चुनावी जीत हासिल करती रही. जवाहरलाल नेहरू के स्वतंत्रता संग्राम की छवि के बावजूद चुनावी सफलता के लिए ज़मीनी स्तर पर जातीय गठजोड़ ज़रूरी था.

जब चुनाव जीतने के लिए मतदाता आधार पर्याप्त नहीं रहा तो इस त्रिमूर्ति में राजपूतों को भी शामिल कर लिया गया. इस चुनावी रणनीति को नेहरू के पोते संजय गांधी ने 1980 के संसदीय चुनाव में तैयार किया था.

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इस तरह जाति ने भारत में हमेशा एक निर्णायक भूमिका निभाई है, लेकिन बिहार में यह एक जाना-माना सच रहा है. हालांकि राज्य में कई किसान, समाजवादी, साम्यवादी और उग्र आंदोलन हुए हैं लेकिन दुर्भाग्य से कोई महत्वपूर्ण बहु-जातीय सामाजिक आंदोलन नहीं हुआ.

दक्षिण और पश्चिमी भारत के कुछ बहु-जातीय आंदोलनों को स्थानीय पहचान और आर्थिक विकास से जोड़ कर देखा गया और इस तरह जातीय पहचान के स्तर तक ले आया गया. हालांकि बिहार में मुख्यतः दो ही पहचान थीं या तो जातीय या राष्ट्रीय, वहां कोई 'बिहारी' पहचान नहीं थी.

इस तरह बिहार में जाति का महत्व हमेशा ज़्यादा रहा है, ख़ासकर चुनावी राजनीति में. हालांकि जब तक पारंपरिक कुलीनों की निर्वाचन में प्रधानता बनी रही तब तक उनके बहुत मेहनत से तैयार जातीय गणित को तिरस्कारपूर्ण नहीं माना जाता था.

लेकिन चुनावी प्रक्रिया में हाशिए पर रहे सामाजिक समूह जब नब्बे के दशक की शुरुआत में तत्कालीन राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में उथल-पुथल मचाते हुए उभरे तो इसे तुरंत गुप्त जातीय सभा करार दे दिया गया. तबसे बिहार के चुनावी परिदृश्य में पूरी तरह बदल गया है.

दोहरा बर्ताव

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जब 2005 में नीतीश कुमार ने 'विरोधी ध्रुवों का गठबंधन' बनाया और उसी गठबंधन के तहत 2010 का चुनाव लड़ा तो तब तक एजेंडा विकास ही माना जाता था.

हालांकि इस पराकाष्ठा के गठबंधन में कई मध्य जातियों को शामिल नहीं किया गया था. एक बार नीतीश ने भाजपा से संबंध तोड़ दिया तो यह गठबंधन टूट गया. इसलिए 2014 में नीतीश कुमार 'गरीबों और वंचितों का गठबंधन' बनाना चाहते थे लेकिन इसे तुरंत ही चुनी हुई जातियों का समायोजन कह दिया गया.

अब लालू प्रसाद के इस गठबंधन, महागठबंधन, में शामिल होने को एक बाहरी और जाति से बाहर का गठबंधन माना जा रहा है. लेकिन कोई भी आसानी से यह देख सकता है कि 2014 के संसदीय चुनाव के बाद से भाजपा बिहार की विभिन्न जातियों को साथ जोड़ने को लेकर अतिसक्रिय है.

हालांकि उन्हें जाति आधारित तिरस्कार से मुक्त कर दिया गया है.

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यकीनन यह अचरज की बात है कि कोई भी ऊंची जातियों का गठबंधन, चाहे वह शुरुआती सालों में कांग्रेस ने किया हो या अब बीजेपी कर रही है, को जाति-केंद्रित गठबंधन नहीं माना जाता लेकिन वंचित और नीची जातियों के इसी काम को, जिसका नेतृत्व नीतीश कुमार और लालू प्रसाद कर रहे हैं, को हमेशा ही जाति आधारित गठबंधन माना जाता है.

यक़ीनन यह ऐसा दोहरा बर्ताव है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.

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