'बहुसंख्यकों की भावनाओं का ख़्याल रखें'

  • 3 अक्तूबर 2015
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उत्तर प्रदेश में बिसराड़ा गाँव में अखलाक़ नाम के व्यक्ति की हत्या के बाद प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष सत्यदेव त्रिपाठी ने इसकी तुलना मुज़फ्फरनगर के दंगों से की है.

उन्होंने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन दंगों का पूरा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिला था.

गाँव में एक घर में गोमांस रखने की अफवाह के बाद अखलाक़ की हत्या कर दी गई थी.

वहीं भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी इस हत्या को लेकर एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं और कांग्रेस दोनों ही दलों को इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के लिए दोषी ठहरा रही है.

असुरक्षा की भावना

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेई के मुताबिक ये 'पशुपालक और पशुओं के वध करने वालों के बीच का मामला है'.

उन्होंने कहा, "उत्तर प्रदेश में रोज़ाना ना जाने कितने पशु चोरी होते हैं लेकिन एक आज़म खान के पशुओं को छोड़ दीजिए, बाकी मामलों में पुलिस ने कितने पशु बरामद किए हैं? कितनी एफ़आईआर लिखी जाती हैं और कितने पशु ढूंढें जाते हैं? इस वजह से सभी धर्मों के लोगों में असुरक्षा और भय है."

ये पूछने पर कि लोग क्या खाते हैं क्या नहीं इस पर भाजपा को आपत्ति क्यों होती है, भाजपा के नेता कहते हैं कि "लोगों को भी बहुसंख्यकों की भावनाओं का ख़्याल रखना चाहिए."

'क़ानून व्यवस्था सही है'

बिसराड़ा हत्या कांड के संदर्भ में प्रदेश की कानून व्यवस्था पर उठाए जा रहे सवाल पर प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री आज़म खान कहते हैं, "कौन जुर्म करेगा ये किसी के माथे पर नहीं लिखा होता है.हाँ जुर्म हो जाने के बाद अगर तुरंत कोई कार्रवाई ना हो तो वो गलत है."

उनका कहना था कि फ़ौरन ही पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया इसलिए क़ानून व्यवस्था को कैसे खराब कहा जा सकता है.

आश्चर्य की बात ये है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने इस घटना पर कोई टिप्पणी नहीं की.

तनाव

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उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के लिए ये हत्या चिंता का विषय है.

एक प्रवक्ता का कहना है, "एक तरफ पंचायत चुनाव होने वाले हैं और त्यौहार भी नज़दीक आ गए हैं और दूसरी तरफ 2017 के चुनाव भी बहुत दूर नहीं हैं. साथ ही लोगों में सहनशीलता कम हो रही है, साम्प्रदायिकता बढ़ रही है. ऐसे में लोग माहौल बिगाड़ने की पूरी कोशिश करेंगे. हमारी कोशिश है कि गड़बड़ी को शुरुआत में ही रोक दिया जाए."

गृह विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 2014 से पहले छोटी साम्प्रदायिक घटनाओं का औसत हफ्ते में एक था लेकिन 2014 में चुनाव से पहले अचानक ये औसत बढ़ कर 2.5 हो गया.

ऐसे में आने वाले दिन उत्तर प्रदेश की क़ानून व्यवस्था, साम्प्रदयिक सौहार्द और शांति के लिए निश्चित ही चुनौती से भरे होंगे.

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