मोदी दुखी हैं या नहीं, देश को नहीं पता

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गाय मारी गई या नहीं, मालूम नहीं, ये मालूम है कि अख़लाक़ मारा गया और उसका बेटा मौत से जूझ रहा है.

अमरीका में फ़ेसबुक के हेडक्वार्टर में नरेंद्र मोदी 'अहिंसा परमोधर्म:' लिखकर भारत लौट आए हैं, और बांका की रैली में अपना बांकपन भी दिखा दिया है.

जब अहिंसा के दूत महात्मा गांधी का जन्मदिन स्वच्छता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है, भारत ही नहीं, दुनिया भर के मीडिया में अख़लाक़ की हत्या पर चर्चा हो रही है.

ट्विटर पर सक्रिय प्रधानमंत्री 'बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो' वाली मुद्रा में हैं.

चुप्पी एक राजनीतिक विकल्प

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दिल्ली की सड़कों पर भाजपा नेता विजय गोयल ने पोस्टर लगवाए हैं जिन पर लिखा है-'साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल', इस पोस्टर में साबरमती के दो संत दिख रहे हैं, एक पुराने और एक नए.

पिल्ले के मरने पर भी दुखी होने वाले मोदी अभी दुखी हैं या नहीं, यह देश को पता नहीं चल सका है.

दादरी की दर्दनाक घटना के बाद से प्रधानमंत्री पंकज आडवाणी को बिलियर्ड्स चैम्पियनशिप जीतने पर बधाई दे चुके हैं, वे आशा भोंसले के बेटे के निधन पर दुख भी व्यक्त कर चुके हैं, यानी देश के दुख-सुख में साथ हैं.

मौनमोहन के मुक़ाबले वाकपटुता से वोटरों को मोहने के बाद, अब मोदी चुप रहने के मामले में मनमोहन से नहीं, बल्कि नरसिंहा राव से प्रेरणा लेते दिख रहे हैं जो चुप्पी को राजनीतिक विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करते थे.

मोदी की चुप्पी की आदत डालना इस देश की जनता के लिए बड़ी चुनौती है क्योंकि उसने अब तक गरजते-बरसते, ललकारते-पुकारते मोदी को ही देखा है.

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वैसे ये उनकी चुप्पी 2.0 है. ललित गेट और व्यापमं पर उनकी चुप्पी काफ़ी गहरी थी, इन मुद्दों पर उनके 'मन की बात' कई रेडियो प्रसारण सुनकर भी लोग नहीं जान सके.

प्रधानमंत्री के इस मामले में कुछ न बोलने का मतलब यही है कि हर कोई उनके मन की बात अपने ढंग से पढ़ेगा. क्या इसका ये मतलब निकाला जाए कि मोदी चाहते हैं कि मुसलमान जो समझ रहे हैं, वो समझते रहें और इस मामले में उग्र हिंदुओं को कुछ समझाने की ज़रूरत नहीं है.

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