कालाधन वापस लाने की स्कीम ढोंग क्यों है?

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नरेंद्र मोदी सरकार ने काला धन की घोषणा के लिए इस साल एक जुलाई से तीन महीनों के लिए एक योजना शुरू की थी.

अघोषित विदेशी आय एवं संपत्ति (कर अधिरोपण अधिनियम) 2015 नाम की इस योजना के तहत 30 सितंबर तक कुल 3770 करोड़ रुपए की 638 घोषणाएं की गईं.

इसके तहत 31 दिसंबर तक 30 फ़ीसद की दर से कर और 30 फ़ीसद की दर से जुर्माना लगेगा. औसतन एक आदमी के डिक्लेरेशन से 6 करोड़ रुपए वापस आएंगे. इसका क़रीब दो तिहाई हिस्सा कर के रूप में सरकारी ख़ज़ाने में आएगा.

इस निहायत ही छोटी सी रक़म से यह साफ़ हो गया कि विदेशों में पैसे रखने वाले ज़्यादातर लोगों ने तीन महीने तक चली इस स्कीम में बहुत अधिक दिलचस्पी नहीं दिखाई.

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नाकाम योजना?

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तमाम प्रचार अभियानों के बावजूद यह योजना अधिक कामयाब नहीं हुई. योजना सितंबर के अंत में ख़त्म हो गई. इसे संसद ने अनडिसक्लोज़्ड फ़ॉरेन इनकम एंड असेट्स (इम्पोज़ीशन ऑफ़ टैक्स) एक्ट के रूप में पारित किया था.

यह पहले से ही तय था कि क़ानून और आय की जानकारी देने से जुड़ी यह स्कीम बहुत ही सीमित प्रभाव छोड़ेगी. दावों के विपरीत स्कीम के अंत में बहुत सारे लोगों ने विदेशों में जमा अपने पैसे का एलान नहीं किया.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस मामले को हल्का करने की कोशिश की.

बेअसर क़ानून

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उन्होंने और उनके मंत्रालय के तमाम अफ़सरों ने लोगों को धमकाने की कोशिश की कि इस स्कीम के तहत विदेशों में जमा पैसे का ऐलान नहीं करने वालों के यहां बड़े पैमाने पर छापे मारे जाएंगे. वित्त सचिव शक्तिकांत दास ने भी लोगों को डराया.

पहला सवाल तो यह है कि यह बेअसर क़ानून पारित ही क्यों किया गया?

साल 2014 के आम चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के दूसरे नेताओं ने कहा था कि उनकी सरकार बनी तो विदेशों में जमा काला धन वापस लाया जाएगा.

उन्होंने यह भी वादा किया था कि इस पैसे से हर ग़रीब आदमी को 15 लाख रुपए मिलेंगे.

'100 दिन में लाएंगे काला धन'

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रामदेव जैसे कुछ मोदी समर्थकों ने तो यह भी दावा किया था कि नई सरकार बनने के 100 दिनों के अंदर ही काला धन विदेशों से आ जाएगा.

उन्होंने कांग्रेस पर यह आरोप बार-बार लगाया था कि विदेश में पैसे रखने वालों के नाम उसने जानबूझ कर उजागर नहीं किए क्योंकि वह कुछ लोगों को बचाना चाहती थी.

पर सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने अपने पांव खींच लिए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो नंवबर को रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में यह मान लिया कि विदेशों में कितने पैसे जमा है, इसकी बिल्कुल सही रक़म किसी को नहीं मालूम.

विदेशों में कितना है काला धन?

उन्होंने कहा, "आज तक न मुझे, न सरकार को, न आपको, न पहले की सरकारों को, किसी को भी यह नहीं मालूम कि विदेशों में कितने पैसे वाक़ई जमा हैं. हर आदमी अपने हिसाब से एक आंकड़ा देता है."

मोदी ने इसके आगे कहा, "ख़ैर, मैं आंकड़ों में फंसना नहीं चाहता. मेरी प्रतिबद्धता है कि चाहे जितना पैसा हो, दो रुपए, पांच रुपए, एक करोड़ रुपए या उससे ज़्यादा, वह पैसा इस देश के ग़रीबों का है, उसे वापस लाया जाना चाहिए. और मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि इसके लिए कोशिश करने में मैं कोई कोताही नहीं करूंगा."

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इस पर विवाद और गहराया जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एबीपी न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में कह दिया कि यह तो महज़ चुनाव पूर्व जुमला था.

इस नए क़ानून और इम्युनिटी स्कीम की क्या समस्याएं हैं? पहली बात तो यह है कि भारतीयों के कालाधन का बड़ा हिस्सा (तक़रीबन 90 फ़ीसद) विदेश में नहीं, देश के अंदर ही है.

दूसरी बात यह है कि विदेशों में ग़ैर क़ानूनी ढंग से जमा किया गया पैसा वहां भी बहुत दिनों तक नहीं रह सकता. उस पैसे को ख़र्च कर दिया गया है या वहां से निकाल लिया गया या उसे 'सफ़ेद' बना कर कहीं और ले जाया गया है.

यह पैसा ख़ास कर मॉरीशस और सिंगापुर जैसे देशों को ले जाया गया जहां कर नहीं चुकाना होता है. इसे 'राउंड ट्रिपिंग' कहते हैं.

स्कीम की ख़ामियां

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Image caption अनिवासी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगो पर यह क़ानून लागू नहीं होगा.

इस स्कीम की तीसरी ख़ामी यह है कि यह अनिवासी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों पर लागू नहीं होता है. विदेशों मे सबसे ज़्यादा पैसा और संपत्ति तो उन्हीं के पास है.

यह स्कीम उन भारतीयों पर ही लागू होता है जो देश में कर चुकाते हैं और साल में कम से कम 182 दिन देश में रहते हों.

भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) विश्वजीत भट्टाचार्य ने कहा है कि यह स्कीम 'हास्यास्पद' इसलिए भी है कि अगर किसी आदमी ने फ़ॉरेन एक्सचेंज एंड रेग्युलेशन एक्ट का उल्लंघन कर ग़ैर क़ानूनी ढंग से विदेशों में पैसा जमा कर रखा भी है तो उस पर यह क़ानून लागू नहीं होगा.

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Image caption विकासशील देशों के पैसे का बड़ा हिस्सा काले धन के रूप मे बाहर चला जाता है.

हालांकि फ़ेमा के अधिकार क्षेत्र में भारतीयों के मालिकाना हक़ वाली कंपनियों का हर दफ़्तर आाता है, यह क़ानून उस पर लागू नहीं होगा.

इस क़ानून में एक और ख़ामी यह है कि विदेशों में जमा काले धन का ऐलान करने वालों को इस बात के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि वह पैसा विदेशी मुद्रा में ही भारत लाएं.

संक्षेप में, यह क़ानून काले धन की बड़ी समस्या से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर अप्रासंगिक है. इसे मोदी सरकार ने राजनीतिक मक़सद से तैयार किया है. यह इसलिए है कि सरकार दावा करे कि उसने विदेशों में पैसा जमा करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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