बस्तर में पत्रकार की गिरफ़्तारी पर सवाल

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छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित बस्तर ज़िले में एक समाचार पत्र के प्रतिनिधि संतोष यादव की गिरफ़्तारी को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं.

राजस्थान पत्रिका पत्र समूह के दरभा इलाके के प्रतिनिधि को पुलिस ने माओवादियों के साथ कथित संपर्क के आरोप में टाडा और पोटा से भी ख़तरनाक माने जाने वाले 'छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा क़ानून' के तहत गिरफ़्तार किया है.

बस्तर के पुलिस अधीक्षक अजय यादव का कहना है, “संतोष यादव के पत्रकार होने की ज़्यादा जानकारी हमारे पास नहीं है. माओवादियों के साथ उनके संपर्क के कारण संतोष यादव को गिरफ़्तार किया गया है.”

पुलिस अधीक्षक का दावा है कि संतोष पर लगातार नज़र रखी जा रही थी और पुख़्ता प्रमाण के बाद ही उन्हें गिरफ़्तार किया गया है.

हालांकि संतोष के परिजन, स्थानीय पत्रकार और मानवाधिकार संगठन इसे ग़लत बता रहे हैं.

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह का कहना है कि बस्तर जैसे क्षेत्र में पुलिस ऐसे लोगों को निशाना बना रही है, जो ज़मीनी रिपोर्टिंग कर रहे हैं.

प्रताड़ना के आरोप

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उन्होंने आरोप लगाया कि गिरफ़्तार पत्रकार संतोष यादव को पिछले साल भर में कई बार पुलिस ने प्रताड़ित करने की कोशिश की.

दरभा इलाक़े में कुल तीन अख़बारों के प्रतिनिधि हैं और इनमें से दो अब न्यायिक और पुलिस हिरासत में हैं.

दो महीने पहले पुलिस ने सोमारू नाग को माओवादियों के साथ संबंध होने के आरोप में गिरफ़्तार किया था. वे तब से जेल में हैं और अब दूसरी गिरफ़्तारी संतोष यादव की हुई है.

बस्तर के इलाक़े में पुलिस का पत्रकारों को माओवादी समर्थक ठहराना और माओवादियों का पत्रकारों को पुलिस का मुखबिर बताना बेहद आम है.

2013 में बस्तर के एक पत्रकार नेमीचंद जैन को पहले पुलिस ने माओवादी होने के आरोप में गिरफ़्तार कर जेल में डाला और बाद में माओवादियों ने 2013 में पुलिस का मुख़बिर बता कर नेमीचंद जैन की हत्या कर दी.

इसी तरह माओवादियों ने पत्रकार साईं रेड्डी की भी हत्या कर दी थी.

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