पपड़ाती ज़मीन, सूखते होंठ, जर्जर जिस्म

सूखा क्या है, ये आयकुर के मौलाना क़ासिम से पूछिए, जिनकी पांच एकड़ खेत की लाल रेतीली मिट्टी ने कपास के बीजों को भीतर ही मुरझाकर मार दिया है.

सूखा क्या है हंचिनाल की हनुमंती से पूछिए, जिनकी शताब्दी देख चुकी जर्जर काया उस भूख को महसूस करने को ज़िंदा है जिसके बारे में जवान होते हुए उन्होंने सोचा तक न था.

सूखा वो भी है जब कीकर की झाड़ियों की चुभती हरियाली के बीच फैली पथरीली ज़मीन पर क़दम बढ़ाते बासु के पैर अपने कपास के अधखिले पौधों में उलझकर रह जाते हैं.

और सूखा उसे भी कहते हैं जब आसमान की ओर मुंह बाए किसान के बीज पूरित खेत की धरती मॉनसून की फुहारों का इंतज़ार करते-करते फट जाती है, लेकिन फिर भी उसमें सरकार की शर्म समाती नहीं.

भारत के दक्षिणी राज्य कर्नाटक के यादगीर ज़िले से शुरू हुई संवेदना यात्रा के पहले दिन ये अहसास मेरे मन में हैं.

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पहले दिन मैंने यादगीर ज़िले के हंचिनाल और रायचूर ज़िले के मोरानपुर और कड़गमदुड्डी गांवों को देख लिया है. इस यात्रा के अगले पड़ावों में क्या सामने आएगा मैं नहीं जानता.

सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने संवेदना यात्रा की शुरुआत मॉनसून की बेरुखी से पीड़ित सात राज्यों के गांवों का हाल जानने के लिए की है, और बीबीसी इसी के समानांतर तलाश रहा है अकाल के निशान. ये अकाल यात्रा है.

सूखे और भूख से मरने वालों को अख़बारों के पहले पन्ने पर जगह मिलेगी, यह परंपरा है, लेकिन मुख्य धारा का मीडिया फिर भी देश के इस काले धब्बे वाले इलाक़े से नज़र नहीं मिलाता.

इसीलिए शायद महानगरों के एयरकंडिशन कमरों में बैठे लोगों को शायद पता न चले कि भूख और सूखा असल में है क्या?

मगर दक्षिणी राज्य कर्नाटक पहुँचने के बाद इतना तो साफ़ महसूस होता है कि सरकारी फ़ाइलों में दर्ज भूख और पपड़ाती ज़मीन के बीच में हक़ीक़त ने कितना फ़र्क रखा है.

अकाल यात्रा की शुरुआत में ही मुझे ये लगा है कि सूखे से केवल ज़मीन नहीं तड़की है. सूखा पहले अनिश्चितता लाया है, और इस अनिश्चितता ने किसान की ज़िंदगी और सोच को बदल डाला है.

हंचिनाल

Image caption कर्नाटक के सूखाग्रस्त घोषित यादगीर ज़िले के हंचीनाल गांव में ज़मींदार का घर.

पहली गाज गिरी है मवेशियों पर. जब चारा नहीं तो जानवर को रखकर किसान क्या करे.

सूखाग्रस्त यादगीर ज़िले के जिस गांव हंचिनाल से हमारी यात्रा शुरू हुई, वहां मुझे खेती के लिए इस्तेमाल होने वाले जानवर बहुत कम मिले, लेकिन बकरियां बहुतायत में मिलीं.

पता चला कि लगातार तीसरे साल अनपेक्षित बारिश के चलते खेत बर्बाद हो चुके हैं और बहुत से किसान अब चरवाहे बन चुके हैं.

कई घरों पर ताले लटके हैं. क़रीब 3000 की आबादी वाले इस गांव में क़रीब डेढ़ हज़ार लोग मतदाता हैं लेकिन गांव के आधे मर्द काम की तलाश में कर्नाटक के शहरों का रुख कर चुके हैं.

जिन घरों में ताले नहीं तो वहां घर ही नहीं है. घरों के नाम पर जो है उसमें किसी की छत नहीं तो कहीं दीवारें नहीं. किसी का समूचा घर मलबे का ढेर है. क़ुदरत ने अपना चक्र पूरा कर लिया है यहां.

अकाल यात्रा

हंचिनाल और रायचूर में कपास, सेंगा (मूंगफली), तूर और बाजरा की खेती होती है. तीन साल से ठीक से पानी नहीं बरसा. किसान ने कर्ज़ लिया, पर बीज नहीं फला. तो कर्ज़ में दब गया.

मजबूरी में मज़दूरी की पर पेट न भरा तो गांव छोड़ा और जिसने नहीं छोड़ा, उसने जीवन छोड़ दिया. ये कहानी कोई नई नहीं पर इतनी पुरानी भी नहीं कि इसे अनदेखा किया जा सके.

संवेदना यात्रा के साथ-साथ बीबीसी की अकाल यात्रा 15 अक्तूबर तक भारत के दक्षिण से उत्तर तक जाएगी.

इसमें कुल सात राज्यों के 25 ज़िलों में सबसे ज़्यादा सूखा प्रभावित गांवों का हाल आपके सामने आएगा.

इसी के साथ शायद उत्तर कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दक्षिण हरियाणा के किसानों का 'सूखा सच' भी आप तक पहुँचे.

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