मोदी की विदेश नीति का बुलबुला फूटा?

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी बहुचर्चित अमरीकी यात्रा से लौट आए हैं, जहां उन्होंने कई वैश्विक नेताओं और उद्योग जगत के दिग्गजों से मुलाक़ात की.

साथ ही वो वहां बड़ी संख्या में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों से भी मुख़ातिब हुए.

प्रधानमंत्री की इस यात्रा का सबसे अहम पड़ाव था सिलिकन वैली, जहां कई दशक बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री गया. प्रतीकात्मक रूप से इसे बहुत महत्त्ववपूर्ण माना गया.

सिलिकन वैली अमरीका का वह इलाक़ा है जहां बड़ी तादात में भारतीय अमरीकियों ने अपना पेशेवर क़द और प्रतिष्ठा बढ़ाई है.

इनमें से कुछ तो दुनिया के सबसे बड़े तकनीकी कंपनियों के प्रमुख है.

कहां हुई चूक?

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बेशक प्रधानमंत्री ने अपनी अमरीकी यात्रा से ख़ूब वाहवाही बटोरी हो सकती है लेकिन भारत के पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में सब कुछ ठीक नज़र नहीं आ रहा है.

चीन के साथ भारत के संबंध कभी भी मज़बूत नहीं रहे हैं. मालदीव के साथ भी रिश्ते सहज नहीं हैं. श्रीलंका के साथ संबंध अब जाकर पटरी पर लौटे हैं.

दूसरी तरफ़, पिछले कुछ हफ़्तों में भारत के दो सबसे अहम पड़ोसियों नेपाल और पाकिस्तान के साथ रिश्तों मे बेहद तल्ख़ी आई है.

भारतीय प्रधानमंत्री के लिए यह अच्छी ख़बर नहीं मानी जा सकती.

ज़्यादा दिन नहीं बीते हैं जब प्रधानमंत्री मोदी ने पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बेहतर करने को अपनी विदेश नीति की पहली प्राथमिकता बताया था. तो फिर गड़बड़ कहां हो गई?

नेपाल से तनाव

नेपाल मेें नया संविधान लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच पैदा हुआ तनाव अब एक व्यापक राजनयिक विवाद में तब्दील होता दिख रहा है.

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भारत नेपाल का सबसे ताक़तवर पड़ोसी देश है. लेकिन यही एक देश है जिसने नेपाल में लागू नए संविधान का खुले दिल से स्वागत नहीं किया.

दरअसल भारत से लगने वाले नेपाल के मैदानी इलाक़ों में रहने वाले लोग इस संविधान का विरोध कर रहे हैं.

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प्रदर्शनकारियों ने नेपाल और भारत की मुख्य सीमा को बंद कर दिया जिससे भारत से नेपाल में पहुंचने वाली रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ों की भारी क़िल्लत हो गई.

नेपाल ने विरोध प्रदर्शनों और 'नाकेबंदी' के लिए भारत को ज़िम्मेदार बताया है. हालांकि भारत ने इस आरोप का खंडन किया.

भारत ने कहा कि ट्रक मालिकों ने सुरक्षा कारणों से सीमा पार करने से इनकार कर दिया है.

भारत के साथ नेपाल की इस तल्ख़ी ने सब को हैरत में डाल दिया है. ख़ासकर इसलिए भी कि पिछले साल सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जिन देशों का सबसे पहले दौरा किया, नेपाल भी उन्हीं में से एक था.

नेपाल में प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार वरिष्ठ नेपाली नेता केपी ओली ने मुझे बताया, "मोदी बहुत अच्छे दोस्त हैं और उन्होंने नेपालियों का दिल जीत लिया था."

अब नेपाल में बहुत से लोगों को लगता है कि दोनों देशों के बीच पहले जैसी दोस्ती नहीं रही. भारत में भी कुछ लोग ऐसा ही मानते हैं.

नेपाल मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर एसडी मुनि कहते हैं कि जब नेपाल के संविधान को वहां के सदन ने पारित कर दिया तो इसे लागू करने से रोकने के लिए भारत को अपना दूत भेजने की क्या ज़रूरत थी?

भारत-पाक रिश्ते

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Image caption नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ भी शामिल हुए थे

नेपाल के साथ रिश्ते ख़राब हो रहे हैं, तो पाकिस्तान के साथ भी लगातार भारत का तनाव चल रहा है.

दोनो देशों के बीच सीमा पर तनाव होने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र में भी यह मुद्दा उठा लेकिन शांति वार्ता शुरू करने की दिशा में कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई.

पहले दोनों देशों के विदेश सचिवों की बैठक रद्द हुई तो उसके बाद दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी नहीं मिल पाए.

'द डिप्लोमेट' पत्रिका की सायरा बानो लिखती हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की वार्ताओं के रद्द होने से भारत के साथ रिश्ते सुधारने की नवाज़ शरीफ़ की क्षमता कमज़ोर हुई है.

इस्लामाबाद में रहने वाले एक पश्चिमी राजनयिक का कहना है कि नरेंद्र मोदी ने चुनावों में जिस तरह की बड़ी जीत हासिल की, उससे वो पाकिस्तान के साथ मज़बूती के साथ बात करने की स्थिति में हैं.

ग़ैर अनुभवी सलाहकार

लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि शायद विदेश नीति के मामलों पर मोदी को सलाह देने वाले लोग उतने अनुभवी नहीं है.

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख रहे हैं जिन्होंने पाकिस्तान में काम किया लेकिन वह सख़्त मिजाज माने जाते हैं.

वहीं, विदेश सचिव जयशंकर चीन और अमरीका के मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं लेकिन कभी भारत के पड़ोसी देशों से उनका वैसा वास्ता नहीं पड़ा.

'टेलिग्राफ' अख़बार के सलाहकार संपादक केपी नैय्यर कहते हैं कि मोदी से पहले के प्रधानमंत्री पाकिस्तान मामलों के जानकारों को ही अपना सलाहकार बनाते थे.

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