जेपी, लोहिया से चाहते क्या हैं ये नेता?

  • 8 अक्तूबर 2015
लालू, नीतीश, मोदी इमेज कॉपीरइट AFP PRASHAN RAVI

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर मंच पर डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और स्किल्ड इंडिया जैसे अपने आधुनिक प्रोजेक्ट्स की बातें करते हैं जिन्हें आज की युवा पीढ़ी आसानी से समझती है.

लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान अपने भाषणों में उन्होंने बार-बार समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के नाम लिए हैं.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इन्हीं बड़े नेताओं का नाम लेते हैं. नीतीश कुमार जेपी आंदोलन का एक अटूट हिस्सा थे, इसलिए उनका नाम लेना समझ में आता है.

तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि लोहिया और जेपी आज भी बिहार की राजनीति में प्रासंगिक हैं? क्या आज के बिहार के युवाओं को इन नेताओं के नाम गिनाने से फ़र्क़ पड़ता है?

नैतिक ताकत

Image caption शिवानंद तिवारी लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार दोनों के साथी रहे हैं.

शिवानंद तिवारी भी जेपी आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा थे. सक्रिय राजनीति से उन्होंने अभी हाल ही में संन्यास ले लिया है.

वह कहते हैं बिहार की किसी भी पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं से बात करें तो पता चलेगा कि लोहिया और जेपी के बारे में उन्हें कोई ख़ास जानकारी नहीं.

उनका कहना है कि विधानसभा चुनाव में इनके सिद्धांतों को तलाश करना वक़्त की बर्बादी है, "बिहार की राजनीति में जेपी आंदोलन के उसूलों की तलाश, भूसे के ढेर में सुई की तलाश जैसा है."

राजेंद्र तिवारी बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनके विचार में 1974 का जेपी आंदोलन कई साल पुरानी घटना है, "गंगा में बहुत पानी बह चुका है. समय बदल चुका है."

लेकिन अगर लोहिया का समाजवाद और जेपी की सम्पूर्ण क्रांति पुरानी बातें हो चुकी हैं तो प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक इनके नामों की माला आज भी क्यों जप रहे हैं.

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शिवानंद तिवारी कहते हैं, "इन नामों के पीछे एक नैतिक ताक़त है. आज की पार्टियों और नेताओं में नैतिक बोध नहीं है. ये अपने नैतिक खालीपन को थोड़ा भरने की कोशिश में लोहिया और जेपी का नाम लेते हैं."

'उल्टा काम'

बिहार में युवा पीढ़ी के वोटरों की संख्या बहुत है जिसे जेपी आंदोलन से कोई लगाव नहीं. आज की पीढ़ी में 18 से लेकर 29 साल के वोटरों की संख्या दो करोड़ बताई जाती है.

दिलचस्प बात यह है कि इनका नेतृत्व जिन नेताओं के पास है वह जेपी आंदोलन की पैदावार हैं. वह समाजवाद और सम्पूर्ण क्रांति के उसूलों को ज़रूर भूल गए हैं लेकिन उस ऐतिहासिक समय को भूल नहीं सके हैं. आंदोलन करने का तरीका वही है, अंदाज़ वही है.

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लालू यादव ने मार्च में मोदी के भूमि अधिग्रहण बिल के ख़िलाफ़ पटना में रैलियां की थीं, जिनमें उनका विरोध करने का तरीका उनके जेपी आंदोलन के दिनों से अलग नहीं था. उन्होंने जेपी का नाम भी कई बार लिया.

नीतीश कुमार इस बिल के ख़िलाफ़ धरने पर बैठे और पिछले साल मार्च में उन्होंने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए राज्य भर में थाल पीटने वाले प्रदर्शन का आयोजन किया था, जिससे जेपी आंदोलन के दिनों की याद ताज़ा हो गईं.

शिवानंद तिवारी नीतीश और लालू दोनों की पार्टियों में अहम नेता रह चुके हैं और दोनों के क़रीबी साथी भी रह चुके हैं.

उनका कहना है कि जेपी आंदोलन भ्रष्टाचार और काले धन के ख़िलाफ़ एक मुहिम थी. लोहिया परिवारवाद के ख़िलाफ़ थे.

उनके अनुसार "ये दोनों नेता अब उल्टा काम करते हैं. वह इन सिद्धांतों को भूल चुके हैं"

राजेंद्र तिवारी भी इसी बात पर ज़ोर देते हैं. ये मुद्दे आज भी चुनावी मुद्दे हैं और शायद इसीलिए जेपी आंदोलन की अहमियत बाक़ी है.

सत्ता के गठबंधन

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कम से कम इस विधानसभा तक जेपी आंदोलन से जुड़े नेता अहम भूमिका निभाएंगे. इस चुनाव के प्रमुख चेहरे लालू यादव, नीतीश कुमार और सुशील मोदी 1974 के जेपी आंदोलन की पैदावार हैं.

अगर आपातकाल के दौर का ज़िक्र करें तो इन तीनों नेताओं के साथ रामविलास पासवान का नाम भी जोड़ा जा सकता है.

इन नेताओं ने आपातकाल में जेल की सलाखों के पीछे महीनों गुज़ारे थे. ये कांग्रेस पार्टी के कट्टर विरोधी थे. उस समय जीतन राम मांझी एक गुमनाम कार्यकर्ता थे.

जिसने भी ये कहा है कि सियासत में कोई स्थाई दुश्मन नहीं होता वह बिहार के सन्दर्भ में सोलह आने सही है.

आज 40 साल बाद बिहार के सियासी गठबंधनों पर निगाह डालें तो पता लगेगा कि कल का दुश्मन आज का दोस्त और आज का दुश्मन कल का दोस्त था.

नीतीश, लालू और मोदी एक साथ इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी के ख़िलाफ़ लड़े थे. तब मांझी कांग्रेस में थे. नीतीश और लालू दोस्त से दुश्मन और एक बार फिर दोस्त बने.

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सतही तौर पर एनडीए गठजोड़ और महागठबंधन दो विपरीत विचारधारा के खेमों में बंटे हैं.

जदयू-आरजेडी-कांग्रेस के गठबंधन को धर्मनिरपेक्ष ताकतों का एक गठजोड़ माना जा रहा है जबकि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के गठजोड़ को सांप्रदायिक ताकतों का एक जमावड़ा.

लेकिन गहराई में जाने से समझ में आता है कि विचारधारा, उसूलों पर आधारित राजनीति और मौलिक सिद्धांत के बजाए गठजोड़ बनाने के पीछे केवल सत्ता हासिल करने का प्रयास है.

शिवानंद तिवारी के अनुसार सत्ता हासिल करना सभी पार्टियों का अकेला मक़सद बन गया है.

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