गन्ना किसानः क़र्ज़ में डूबे, जाति में फंसे

  • 8 अक्तूबर 2015
चीनी

चीनी उन कुछेक चीज़ों में से है जिसकी क़ीमत बीते एक साल के दौरान घटी है.

क़ीमत घटने से खाना तो थोड़ा और मीठा हुआ है लेकिन इस कारण गन्ना उपजाने वाले किसान और चीनी मिलें दोनों परेशान हैं.

गन्ना किसान कुमार पणित पश्चिम चंपारण के गांव पिपरा दोन में रहते हैं. वे बिहार उन हज़ारों किसानों में से हैं जिनका छह महीनों से भी अधिक समय से चीनी मिलों पर बक़ाया है.

क़र्ज़ के बोझ तले दब चुके कुमार पणित बताते हैं, ‘‘क़रीब सत्तर हज़ार रुपये चीनी मिल के पास फंसे हैं. मुझे खेती और घरेलू कामों के लिए पांच रुपये सैकड़ा पर क़रीब पचास हज़ार रुपये क़र्ज़ लेना पड़ा है.’’

चीनी मिल की परेशानी

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शीतलबारी गांव के सुरेश यादव के मुताबिक़, गन्ना का पूरा भुगतान नहीं मिलने के कारण उन्हें अपनी बहन की शादी में परेशानियों का सामना करना पड़ा.

चीनी मिलों की अपनी परेशानियां हैं. बिहार शुगर मिल एसोसिएशन के सचिव नरेश भट्ट के मुताबिक़ चीनी उद्योग अभी वैश्विक स्तर पर संकट में है.

इसकी वजह नरेश बताते हैं, ‘‘बीते सात वर्षों से खपत के मुक़ाबले ज़्यादा चीनी का उत्पादन हो रहा है. साथ ही चीनी आयात भी होती रही.’’

ऐसे में चीनी का विशाल स्टॉक मिलों में पड़ा है और उत्पादन लागत के मुक़ाबले क़ीमत बहुत कम मिल रही है.

वह हैरानी जताते हैं कि इतनी कम क़ीमत के बाद भी चीनी के ख़रीददार बहुत कम हैं.

320 करोड़ से बक़ाया

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इस सबका बिहार के किसानों पर यह असर पड़ा है कि 15 सितंबर तक चीनी मिलों पर बिहार के किसानों का 320 करोड़ बक़ाया था.

बक़ाया भुगतान के संबंध में नरेश बताते हैं, "राज्य और केंद्र सरकारें ब्याज रहित क़र्ज़ मुहैया करा रही हैं. नवंबर में गन्ना पेराई का नया मौसम शुरू होने के पहले बक़ाया भुगतान होने की पूरी संभावना है."

लेकिन वे साथ ही यह भी जोड़ते हैं कि चीनी उद्योग में किसी चमत्कार की आशा नहीं की जानी चाहिए.

अभी बिहार में क़रीब चार लाख किसान गन्ने की खेती करते हैं जो कि सूबे की कुल ग्यारह चीनी मिलों की ज़रूरतों को पूरा कर रहे हैं.

तीन साल से समस्या

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नृपेंद्र कुमार राय बिहार राज्य ईख उत्पादक संघ के अध्यक्ष हैं. नृपेंद्र बताते हैं कि बीते तीन सालों से लगातार किसान भुगतान में देरी की समस्या झेल रहे हैं.

वह बताते हैं, ‘‘क़ानून के मुताबिक़ चीनी मिलों को गन्ना ख़रीदने के 15 दिनों के अंदर किसानों को भुगतान कर देना है. लेकिन इस क़ानून को मज़बूती से ज़मीन पर नहीं उतारा जा रहा है.’’

क्या ऐसे में गन्ना किसानों की समस्या चुनावी मुद्दा बनेगी?

इसके जवाब में नृपेंद्र कहते हैं, ‘‘पार्टियों ने यहां के किसानों को जातीय आधार पर बांट रखा है. वे अपने रोज़ी-रोटी समस्याओं को लेकर चीनी मिलों और सरकार के ख़़िलाफ़ एकजुट नहीं होते हैं.’’

वह आगे कहते हैं, ‘‘ऐसे में बकाया भुगतान और गन्ना किसानों के दूसरे सवाल चुनावी मुद्दा नहीं बन पाते हैं. बीते साल आम चुनाव के समय भी यह मुद्दा नहीं बना था और इस बार भी शायद ही ऐसा हो.’’

ज़िक्र नहीं

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नृपेंद्र की आशंका इस मायने में सच होती दिख रही है कि भाजपा ने अपने दृष्टि-पत्र में लगभग हर तबके की बात करने के बावजूद गन्ना किसानों से कोई वादा नहीं किया है.

रत्नेश सिंह भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं. वे मानते हैं कि गन्ना किसानों के मामले में दृष्टि-पत्र में चूक हुई है लेकिन उनकी पार्टी उनकी समस्याओं को मुद्दा बनाएगी.

रत्नेश कहते हैं, ‘‘राज्य सरकार चीनी मिलों पर दवाब नहीं बना रही है. केंद्र सरकार ने बकाया भुगतान करने के लिए राज्य सरकार से किसानों के बकाये और उनके खाते के बारे में जानकारी मांगी थी. राज्य सरकार ने यह विवरण भी उपलब्ध नहीं कराया.’’

रत्नेश के मुताबिक़, भाजपा चुनाव में राज्य सरकार की इस नाकामी को मुद्दा बनाएगी.

सब्सिडी

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वहीं जनता दल यूनाइटेड का कहना है कि उसने गन्ना किसानों से उनकी समस्याएं दूर करने का वादा किया है.

पार्टी के किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह के मुताबिक़, उनकी सरकार फिर से बनी तो आर्थिक रूप से मजबूत कंपनियों पर दवाब बनाकर किसानों की परेशानी दूर की जाएगी.

तो दूसरी ओर आर्थिक संकट से जूझ रहे चीनी मिलों को इसके लिए उनकी सरकार सब्सिडी देगी.

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