मिलिए जामा मस्जिद पर बचे अकेले भिश्ती से

  • 11 अक्तूबर 2015
भिश्ती

शकील अहमद यूँ तो अमरोहा, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं लेकिन अब अपने को दिल्ली का ही मानते हैं. सुबह नौ बजे से लेकर शाम चार बजे तक पुरानी दिल्ली स्थित जामा मस्जिद के सामने प्यासों को अपनी मश्क में पानी भर कर पिलाते रहते हैं.

इनकी कई पुश्तें जामा मस्जिद इलाक़े में बतौर भिश्ती काम करती आई हैं.

मध्यकाल से चली आ रहीं भिश्तियों की परंपरा में लोग पानी पिलाने से लेकर सड़कें और मकान धोने तक का काम किया करते थे

पेशे से नाता

लेकिन भारत में अब भिश्तियों की तादाद तेज़ी से गिरती जा रही है और इनके ऊपर लुप्त होने का ख़तरा मंडरा रहा है.

ख़ुद शकील अहमद के मन में अब अपने पेशे को लेकर टीस सी उठने लगी है.

उन्होंने कहा, "हमारा ख़ानदानी काम है जो नबियों के दिनों से चला आ रहा है. सवाब का काम है, लेकिन अब तो सबके यहाँ नल लग गए, पानी की टंकियां लग गईं. मेरे बाद ये काम ख़त्म हो जाएगा इस इलाक़े में क्योंकि मैं आख़िरी भिश्ती बचा हूँ".

शकील के अनुसार उन्होंने तो अपनी ज़िन्दगी मश्क से पानी पिलाकर गुज़ार ली लेकिन उनके बच्चे दूसरे कामों में लग गए हैं.

उन्होंने कहा, "बकरे की खाल से बनने वाली ये मश्क ही तीन हज़ार रुपए की आती है. आमदनी हमारी दो सौ से लेकर चार सौ रुपए तक की होती है और ठंड के दिनों में तो इस पर भी मंदी छाई रहती है. पहले नगर महापालिका में नौकरियां रहतीं थीं अब तो सरकार ने उन्हें भी बंद कर दिया, कोई क्यों जारी रखेगा ये काम".

ख़त्म होते भिश्ती

भिश्ती शब्द का ईजाद फ़ारसी भाषा के 'बहिश्त' शब्द से हुआ है जिसका मतलब जन्नत होता है. मध्यकालीन समय में सैनिकों को पानी पिलाने वालों को भिश्ती के नाम से बुलाया जाने लगा और तभी से ये शब्द पूरे मध्य एशिया और दक्षिण एशिया में प्रचलित है.

कुछ इतिहासकारों के अनुसार भारत में भिश्तियों का आगमन मुग़ल सेनाओं से साथ हुआ था और ये पूरे भारत में फैल गए थे.

हालांकि मौजूदा दौर में भिश्ती समुदाय से जुड़े ज़्यादातर लोगों ने रोज़गार के दूसरे साधन ढूंढ लिए है और ये अब सिर्फ़ गिनी-चुनी जगह ही पाए जाते हैं.

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